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“वो हर आलम की रहमत हैं, किसी आलम में रह जाते,
ये अपनी खुश नसीबी है कि ये आलम पसंद आया.”

अल्लाह के रसूल हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम की विलादते-पाक की तारीख 12 रबी-उल-अव्वल है. इस दिन दुनिया के हर खित्ते में रहने वाला मुसलमान ईद-मिलादुन्नबी मना कर अपनी अकीदतो-मोहब्बत और ख़ुशी का इज़हार करता है. इस्लाम के कुछ ऐसे पंथ भी हैं जो ईद-मिलादुन्नबी मनाने का विरोध करते हैं और इसकी दलील यह देते हैं कि ऐसा करना कुरानो-हदीस से साबित नहीं है. उनका यह भी कहना है कि जो चीज़ कुरानो- हदीस से साबित न हो वह बिदअत और गुमराही है. लिहाज़ा मैंने ज़रूरी समझा कि इस विषय पर कलम चला कर उनके शको-शुबहात दूर किये जाएँ ताकि वे भी इस्लाम की मुख्यधारा में आ जाएँ और उस इत्तेहाद का एक हिस्सा बन जाएँ जो कुछ दिनों पूर्व पूरे देश के मुसलमानों में नज़र आया था.

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कुरान मजीद में इर्शादे बारी तआला है –

“व ज़क्किरहुम बे अय्यामिल्लाह” (सुरे इब्राहीम, आयत-12)

इस आयत में रब तआला ने मूसा अलैहिस्सलाम को हुक्म दिया कि – बनी इस्राएल को” वह दिन” याद दिलाओ जिनमे अल्लाह ने उन पर” नेमतें” नाजिल फ़रमाई. मालूम हुआ कि नेमतें मिलने के दिनों को यादगार के तौर पर मनाना हुक्मे -खुदावन्दी है.

कोई भी शख्स इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि अल्लाह के रसूल हुजुर पाक सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम अल्लाह की सबसे बड़ी नेअमत और रहमत हैं. जैसा कि सुरे अम्बिया, आयत नम्बर 107 में उल्लेख किया गया है – “और नहीं भेजा हमने आप को मगर तमाम जहानों के लिए रहमत बना कर.”

आप के नेमत होने की दलील सुरे इब्राहीम की आयत नम्बर 2 है जिसमे कहा गया है – “क्या आप ने उन लोगों को नहीं देखा जिन्होंने बदला अल्लाह की नेमतों को कुफ्र करते हुए.”

इसी आयत की तफ्सीर में हजरत इब्ने अब्बास रज़ी अल्लाहो अन्हो फरमाते हैं कि अल्लाह की नेमत से मुराद हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम हैं”.
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तो अब जब कि कुरान से साबित हो गया कि आप सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम अल्लाह की नेमत भी हैं और रहमत भी, और यह भी साबित हो गया कि उस नेमत के हुसूल पर अल्लाह का शुक्र करना, याद करना और खुशियाँ मनाना भी कुरान की ही आयतों से साबित है तो 12 रबी उल अव्वल को जश्ने विलादते-पाक मनाना, इस दिन की अजमत से लोगों को आगाह करना और ख़ुशी का इज़हार करना ऐन कुरान से साबित हुआ या नहीं ???

बुखारी शरीफ में जिल्द 2, पेज नम्बर 764 में यह मशहूर हदीस है कि अबू लहब के मरने के बाद लोगों ने उसे बहुत बुरी हालत में ख्वाब में देखा. पूछा गया कि तुझ पर क्या गुजरी ? उसने जवाब दिया _”तुम लोगों से जुदा हो कर कोई खैर नहीं मिली, मगर हाँ,पीर के दिन याने सोमवार को मैं अपने हाथ की इस ऊँगली से सैराब किया जाता हूँ जिस ऊँगली को उठा कर मैंने अपनी लौंडी सुवैबा को इस ख़ुशी में आज़ाद किया था कि उसने मुझे मेरे भतीजे हजरत मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम) के पैदा होने की खुश खबरी सुनाई थी.”

ध्यान दीजिये कि अबू लहब ने” रसूल” के नाम से ख़ुशी ज़ाहिर नहीं की थी, भतीजे के नाम से ख़ुशी ज़ाहिर की थी जिसका उसे यह सिला मिला कि उसके अजाब में कमी हो जाती है तो अगर रसूल के उम्मती अगर इस दिन ख़ुशी मानते हैं, इजहारे शुक्र के लिए अपना माल खर्च करते हैं (इसे गुलाम आज़ाद करने से तस्बीह दे सकते हैं) तो हमें इस ख़ुशी पर कितना अज्र मिलेगा,इस बात का अन्दाज़ा कोई साहबे-ईमान आसानी से लगा सकता है.इसके अलावा हजरत शेख
शहाबुद्दीन अहमद कस्तलानी (शारेह बुखारी) मवाहिबुललदुनिया, जिल्द 2 पेज 26 में तहरीर फरमाते हैं -” हुजुर पाक
सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम की विलादते-पाक की ख़ुशी में अलहे- इस्लाम हमेशा से महफिले-मिलाद मूनअकिद करते चले आये हैं”.

शाह अब्दुल हक मुहद्दिस देहलवी (रहमतुल्लाह अलैह) फरमाते हैं – “अहले इस्लाम हमेशा मिलाद के महीने में महफिलें मुनअकिद करते रहे हैं”. (मा सबता बिस्सुन्नते, पेज 79) मदरिज़ुन नबूवा, जिल्द 2 में अबू लहब का किस्सा बयान करते हुए फरमाते हैं कि यह वाकिया मिलाद मनाने वालों के लिए सनद और दलील है जो कि हुजुर पाक सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम की शबे- विलादत, यौमे-विलादत में खुशियाँ मनाते और माल खर्च करते हैं.

लेखक: मुहम्मद आरिफ दागिया

इस तरह हम देखते हैं कि मिलाद शरीफ की शरई हैसियत कुरानो- हदीस, सुन्नते सहाबा और अक्वाले-सल्फे-सालिहीन से साबित हो जाती है.कोई भी मकतबे-फ़िक्र अब इन हवालाजात और दलाइल की तरदीद नहीं कर सकता बशर्ते वह हठधर्मी पे न अड़ जाये. यह बात वाजेह हो जाती है कि रहमतों और नेमतों के मिलने के दिन अल्लाह के ख़ास दिन हैं लिहाज़ा इन दिनों की याद करना, खुशियाँ मनाना हुक्मे-इलाही के ऐन मुताबिक है, चूँकि आका सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम खुद अल्लाह की तमाम नेमतों और रहमतों से बड़ी और आलातरीन नेमत हैं. इसलिए आमदे महबूबे खुदा और जुहूरे ज़ाते-मुस्तफा (सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम) पर जितनी भी खुशियाँ मनाई जाये, कम है. ऐसा करना कुरान और हदीस के अहकाम के ऐन मुताबिक है और कुरानो-हदीस पर अमल करना बिदअत नहीं, बल्कि बाईसे-बरकत, बाईसे रहमत और बाईसे निजात है.

“शब्बे-असरा के दूल्हा पे दायम दरूद,
नौशा-ए-बज्मे-जन्नत पे लाखों सलाम.
शहरे-यारे इरम, ताजदारे हरम,
नौ बहारे शफाअत पे लाखों सलाम.