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ज़ैग़म मुर्तज़ा

मोदी जी ‘मैं आज़ाद हूं’ फिल्म वाले अमिताभ बच्चन बन चुके हैं। अख़बार वालो ने उन्हें भ्रष्टाचार और महंगाई के ख़िलाफ योद्धा के रूप में पेश किया। एक काल्पनिक आभा क्षेत्र गढ़ा गया जिसमें तमाम विफलताएं छिप गईं। लोग भूल गए कि ये शख़्स भीषण दंगे संभालना तो दूर, गोधरा में 20-30 लोगों को हिंसा करने से नहीं रोक पाया था।

गुजरात के विकास का टीवी और अख़बार ने ऐसा चित्रण किया मानो धरती पर कहीं स्वर्ग है तो सवा छह करोड़ की आबादी वाले इसी ग्रह पर है। देश की बाक़ी सवा सौ करोड़ आबादी शिकागो, शंघाई और अफ्रीका के फोटो और फोटोशाॅप में उलझ गई।

अन्ना हज़ारे और रामदेव देश को बता रहे थे कि देश बस बर्बाद होने वाला है। सारा पैसा स्विस बैंक और सारा सोना इटली चला गया है। इधर अंबानी और सुभाष चंद्रा के बुद्धू बक्से लोगों को बता रहे थे कि एक मसीहा ने जन्म लिया है। इस काल्पनिक मसीहा के आते ही डाॅलर को रुपये के चरणों में लोटना था। महंगाई को पाताल लोक में वराह अवतार की मेहमान बननी थी और घर की टंकी से पानी की जगह पेट्रोल डीज़ल बहना था।

आख़िरकार कीनिया के उस कोच को टीम इंडिया की कमान मिल गई जिसने 20-20 मैच में एक दो बार ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसी टीमों को ढेर कर दिया था। बहरहाल, गाइड के देव आनंद, मैं आज़ाद हूं के अमिताभ बच्चन और 2014 के नरेंद्र मोदी में कई समानताएं हैं। जनता चमत्कार की आस में इनके इर्द गिर्द जुटी।

चमत्कार अब हुआ, तब हुआ और बस हो ही गया… और अगर नहीं हुआ तो? तो दो ही रास्ते हैं। या तो आज़ाद की तरह तीसवीं मंज़िल से कूद जाइए वर्ना जनता लिंचिंग के लिए तैयार बैठी है। हे प्रभु! चमत्कार दिखाइए वर्ना तमाशा बनने को तैयार रहिए। इट्स आलवेज़ नाॅट वेल दैट एंड्स वेल

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