पुण्य प्रसून बाजपेयी

केसरिया रंग देश के राजनीतिक सत्ता की हकीकत हो चुकी है। 19 राज्य केसरिया रंग में रंगे जा चुके हैं। पर इसी केसरिया रंग की प्रयोगशाला गुजरात में सात जिले मोरबी , गिर , सोमनाथ , अमरेली , नर्मादा , तापी , डांग , अरवल्ली  में तो एक भी सीट बीजेपी को नहीं मिली । जबकि सुरेन्द्र नगर , पोरबंदर , जूनागढ , बोटाड , द्वारका , पाटण , महिसागर और छोटा उदयपुर में सिर्फ 8 सीटें ही जीत पायी। यानी गुजरात के 15 ग्रामीण जिले में बीजेपी को सिर्फ 8 सीट मीली। तो  क्या गुजरात एक ऐसा अक्स है, जिसमें बीजेपी का सियासी उफान संघ परिवार का सामाजिक ढलान हो चला है।

ये सवाल इसलिये क्योंकि ग्रामीण भारत में जड जमाये आरएसएस के ज्यादातर संगठनों को समझ नहीं आ रहा है कि उनकी संघ की उपयोगिता सरकार की चुनावी सफलता पर टिकी है या फिर खुद के कार्यों पर। और इसकी सबसे बडी वजह तो यही है कि  मोदी सरकार की नीतियों से संघ परिवार के पांच संगठनों में तालमेल नहीं है। मसलन -बीएमएस, किसान संघ, स्वदेशी जागरण मंच, विहिप और बजरंग दल खुद को ठगे महसूस कर रहे हैं। और ऐसा भी नहीं है कि इन संगठनों का अपना कोई आधार नहीं है। बीएमएस के देशभर में 1 करोड 12 लाख सदस्य हैं। किसान संघ के 18 लाख सदस्य हैं। स्वदेशी जागरण मंच के 5 हजार पदाधिकारी हैं। जिनका दावा है कि डेढ करोड़ लोगों पर सीधा प्रभाव है। वही आर्थिक नीतियों पर बंटते शहरी और ग्रामीण भारत से परेशान संघ के इन संगठनों से इतर हिन्दुत्व के नाम पर विहिप-बंजरग दल को लगता है कि उन्हें ठगा जा रहा है। और  विहिप-बजरंग दल के देशभर में 40 लाख सदस्य है । और संयोग से 24 से 30 दिसबंर तक भुवनेश्वर में होनी वाली विहिप की बैठक में इन्हीं मुद्दों पर चर्चा होगी। जिसमें संघ के तमाम महत्वपूर्ण पदाधिकारियों की मौजूदगी होगी  ।

और 2014 के बाद पहली बार गुजरात चुनाव ने संघ के भीतर ही इस सवाल को जन्म दे दिया है कि बीजेपी की कमजोर जीत के पीछे मोदी सरकार की आर्थिक नीतियो को देखें या संघ के आंख मूंद लेने को। और ये सवाल बीजेपी के लिये भी महत्वपूर्ण है कि अगर ग्रामीण गुजरात की तर्ज पर देश का ग्रामीण समाज  भी बीजेपी से बिफरा तो 2019 में होगा क्या। क्योंकि देश में 26 करोड 11 लाख ग्रामीण किसान – मजदूर हैं। और 2014 के लोकसभा चुनाव का सच यही है कि 83 करोड वोटरों में से 2014 में बीजेपी को कुल वोट 17,14,36,400 मिले। यानी देश अगर राजनीतिक तौर पर ग्रामीण और शहरी मतदाता में बंट गया तो फिर ये बीजेपी के लिये ही नहीं बल्कि संघ परिवार के लिये भी खतरे की घंटी होगी। क्योंकि संघ की साख बीजेपी की चुनावी जीत-हार पर नहीं टिकी है और ये बात 2004 में शाइनिंग इंडिया तले वाजपेयी की हार के बाद भी उभरा था।

पर अगला सवाल तो यही है कि क्या ग्रामीण भारत की तरफ मोदी सरकार की नीतियां देख भी रही है। क्योंकि ग्रामीण भारत को सिर्फ किसानों के नजरिये सेदेखने की भूल कमोवेश हर सरकार ने किया है जबकि सच तो यही है कि देश की इक्नामी में ग्रमीण बारत का योगदान करीब 48 फिसदी है। नेशनल अकाउंट स्टेटिक्स ने इसी बरस जो आंकडे जारी किये उसके मुताबिक खेती [96 फिसदी], पशुधन [ 95 फिसदी ] , खनन [53 फिसदी ], उत्पादन [51 फिसदी ], निर्माण [47 फिसदी ], गोदाम [ 40 पिसदी], रियल इस्टेट-रोजगार [39 फिसदी ], बिजली-पानी-गैस [33 फिसदी ], व्यापार- होटल [28 फिसदी],प्रशासन-डिफेन्स [19 फिसदी ], वित्तीय सेवा [13 फिसदी ] । ये ग्रामीण भारत का ऐसा सच है जो अक्सर सिर्फ किसानों तक ही गांव को सीमित कर छुपा दिया जाता है । नेशनल अंकाउंट स्टेटिक्स ने इसी बरस ग्रामीम भारत के इन आंकडों को जारी किया जो साफ तौर पर बताता है कि देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान करीब 48 फिसदी है।

ग्रामीण भारत की लूट पर शहरी विकास का मॉडल जा टिका है जो बाजारवाद को बढावा दे रहा है और लगातार शहरी व ग्रामीण जीवन में अंतर बढ़ता ही जा रहा है। तो सवाल तीन हैं। पहला, सिर्फ किसानों की दुगनी आय के नारे से ग्रामीणों की गरीबी दूर नहीं होगी । दूसरा, ग्रामीण भारत को ध्यान में रखकर नीतियां नहीं बनायी गई तो देश और गरीब होगा । तीसरा , ग्रामीण भारत की लूट पर विकास की थ्योरी चल रही है । ये तीनो सवाल ही देश के हकीकत है । क्योंकि एक तरफ देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान 50 फिसदी है। दूसरी तरफ ग्रमीण भारत में प्रति व्यक्ति आय शहरी भारत से आधे से भी कम है । आलम है कितने बुरे ये इससे भी समझा जा सकता है कि शहर में प्रति दिन प्रति व्यक्ति आय 281 रुपये है। गांव में प्रति व्यक्ति प्रति आय 113 रुपये है। यानी गांव में प्रति व्यक्ति आय मनरेगा में मिलने वाली मजदूरी से भी कम है। कागजों पर ही सही पर मनरेगा में सबसे कम 168 रुपये मजदूरी बिहार-झारखंड में मिलती है। तो हरियाणा में सबसे ज्यादा 277 रुपये मिलते है। तो कल्पना कीजिये ग्रामीण भारत से फलती बढती इक्नामी से ग्रामीण भारत को ही कौन अनदेखा कर रहा है।

पर सवाल सिर्फ कम आय का नहीं है बल्कि ग्रामीण भारत की लूट का है, जो बाजार के जरीये देश की इक्नामी में चाहे चार चांद लगाती हो पर असल सच तो यही है कि खनिज संसाधनों से लेकर अनाज और बाकि माद्यमों से ग्रामीण भारत की इके्नामी पर ही देश की आधी भागेदारी टिकी है। और उसी तरफ किसी का ध्यान नहीं है। फसल-ग्रमीण और शहरी सोशल इंडक्स में अंतर क्योंकि खुद सरकार की ही रिपोर्ट बताती है कि जबकि इन आंकडो का सच तो यही है कि कि देश की इक्नामी में ग्रामीण भारत का योगदान करीब 48 फिसदी है। तो क्या गरीब गुरबों और गांव-खेत का जिक्र करते करते ही मोदी सरकार इन्हीं के कटघरे में जा खड़ी हुई है। या फिर चुनावी जीत के चक्कर में खामोश संघ परिवार के भीतर की कुलबुलाहट पहली बार बताने लगी है कि अगर वह भी खामोश रही तो आरएसएस के शताब्दी बरस 2025 तक उसकी साख का बांटाधार हो जायेगा।

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