मेनका गाँधी ने लड़कियों से छेड़खानी को लेकर बयान दिया है की छेड़छाड़ की घटनाओं के लिए फ़िल्में ज़िम्मेदार है, वैसे तो यह बयान इतना ताज़ा है की इस पर अभी तक किसी की प्रतिक्रिया नही आये है लेकिन ज़ाहिर सी बात है बॉलीवुड के कुछ लोग इस बयान के खिलाफ आ सकते है. यह भी मुमकिन है की इस तरह के बयान को लेकर मेनका गाँधी को सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जाये.

वैसे अगर देखा जाए तो पहली बार में यह बयान हास्यपद लगता है की सड़क चलती लड़की को फब्तियां कसने वाले कहाँ ये सोचते है लड़की को छेड़ने का तरीका फ़िल्मी हो लेकिन जब इस बात की गहराई में जाते है तो मामला काफी गंभीर हो जाता है.

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आमतौर पर यह कहा जाता है की फिल्मे समाज का आइना होती है लेकिन यह बात भी तब तक सही थी जब तक फ़िल्में सामाजिक मुद्दों पर बनती थी दिलीप कुमार की नया दौर हो या मदर इंडिया. इन फिल्मों में सामाजिक सद्भाव से लेकर मजदूरों की हालत पर प्रकाश डालते हुए बहुत खूबसूरती से समाज को उसका सही आइना दिखाया गया था. ध्यान देने वाली बात यह है की तब की फ़िल्में कमर्शियल सिनेमा का हिस्सा ना के बराबर थी लेकिन इस माहौल में जहाँ कलाकार से अधिक ब्रांड की वैल्यू हो, जब की सिनेमा पूरी तरह कमर्शियल हो चूका हो तो ऐसे में उसे आइना कहना मात्र खुद को किसी मुगालते में कैद करने से अधिक कुछ नही है.

आप इस लेख को पढ़ रहे है जरा दिमाग पर जोर डालकर एक ऐसा विज्ञापन बताएं जिसमे लड़की को सेक्स सिंबल, प्रोडक्ट, उपभोग वस्तु के तौर पर पेश ना किया गया हो. अक्षय कुमार वो बनियान का वो विज्ञापन जिसमे वो लड़की के सीने की तरफ इशारा करते हुए कहते है की ‘बटन खुले है तुम्हारे”. बाइक का वो विज्ञापन जिसमे तेज़ रफ़्तार से आती बाइक की हवा

से लड़की का स्कर्ट उड़ जाता है, या डियोद्रेंट का वो विज्ञापन जिसमे खुशबु लगाते ही लड़कियां खिंची चली आती है. ऐसे माहौल में समाज सिनेमा का आइना बनता जा रहा है. बहुत आसान उदहारण लेकर अगर समझाया जाए तो सोसाइटी में फैशन तब आता है जब युवक-युवतियां पर्दें पर सितारों को वैसे कपड़े पहने हुए देखते है और उसी का अनुसरण करना शुरू कर देते है.

कैसे फ़िल्में बनाती है ईव टीज़र ?

“लड़की है क्या ..रे बाबा .. इसकी अदा ..रे बाबा ” .. ऑफिस जाती लड़की को सड़क पर छेड़ते हुए अनिल कपूर सड़क-छाप गुंडों के साथ यह गाना गा रहे हैः, और इस छेड़खानी की प्रक्रिया को इतने सहज ढंग से दिखाया जाता है जैसे यह सब समाज में आम बात है. ” आज न छोड़ेंगे इसे दम दमा दम.. दिल में है तूफ़ान भरा.. दम दमा दम”.. 90 के दशक में तो समझो लड़की पटाने का एक ही तरीका था की पहले अपने गुंडों के साथ जाकर उसे छेड़ो, सड़क पर उसके कपडें खींचो और लड़की है तो उसे छिड़ना तो   उसे छिड़ना तो अच्छा लगताi होगा और अंत में पट जाएगी .. यह पूरी तरह पुरुषवादी सोच जो विपरीत लिंगी को ज़रूरत   के सामान से अधिक सोचने का मौका नही दे पाती वह 90 के दशक में जोरो पर थी.

इसमें सबसे ज़रूरी बात होती है दर्शाने की, किस तरह किसी सीन का फिल्मांकन किया जाता है हीरो कभी गलत नही दिखाया जाता , वो ऑफिस में काम करने वाली महिला के कूल्हों पर चटाक से मारता है (अक्षय कुमार – ऐतराज़ -फिल्म), कॉलेज जाने वाली लड़की को फब्तियां कसता है लेकिन बहुत सहज दिखाया जाता है अभिनेत्री के कपडें फाड़कर ज़बरदस्ती नचाकर उसकी मांग में सिन्दूर भरता है (फिल्म बाहुबली ) लेकिन उसे गलत नही माना जाता.

कैसे माइंड प्रोग्रामिंग करती है फ़िल्में.

जब भी कोई कंपनी हमे अपना प्रोडक्ट बेचना चाहती है तो उससे पहले वो पूरी तैय्यारी के साथ मार्किट में उतरती है, अपनी टारगेट ऑडियंस को set करती है की किसे यह माल बेचना है, उनके बारे में जानकारी जुटाई जाती है, और खासतौर पर उनकी उस अभिलाषाओं का ख़ास तौर पर ध्यान रखा जाता है जिसका वो सोती-या जागती आँखों से सपना देखते है. हमें पता है की डियोड्रेनट इस्तेमाल करने वाले अधिकतर कॉलेज गोइंग और ऑफिस गोइंग लोग होते है और उनमे भी अधिकतर लड़के और उसमे भी फ़िल्टर करके देखते है तो कुंवारों की संख्या अधिक निकलती है तो इन लोगो के दिमाग पर शातिराना हमला करने के लिए इनके सपनो को पूरा होते हुए दिखाया जाता है जैसे की डियो लगाते हुए लड़कियों की झुण्ड आ गया और इन लड़कों को घेरकर जगह की किस करने शुरू कर दिए, जहाँ से यह निकल रहे है वहां लड़कियां हवस में अंधी होकर इनकी तरफ खिंची चली आ रही है.

यही स्ट्रेटेजी फ़िल्में, विज्ञापन और नेता और अभिनेताओं को पब्लिसिटी दिलवाने वाली एजेंसीयां इस्तेमाल करती है, मसलम के तौर पर ईद पर सलमान खान की फिल्म रिलीज़ करनी है तो उसमे एक सीन ऐसा डाला जायेगा जिसमे या तो सलमान खान के सर पर टोपी लगी है या उनके बराबर में कोई टोपी लगाकर या काँधे पर अरबी रुमाल डालकर कोई मुस्लिम खड़ा है, चाहे उस सीन का फिल्म से कोई मतलब ना हो लेकिन मुख्य बात होती है अपनी टारगेट ऑडियंस के माइंड प्रोग्रामिंग की. बिलकुल इसी तरह जब दर्शक फिल्मों के हीरो को किसी लड़की को छेड़ते हुए दिखते है तो यह बात बिना कहें उनके दिमाग पर असर करती चली जाती है की यह तो नार्मल है, और सबसे मजे की बात एक फिल्म में देखा .. दूसरी में देखा .. तीसरी में देखा …लेकिन यहाँ तो देखते देखते 60 वर्ष से अधिक का समय गुजर चूका है ” याद कीजिये वो गाने जिसमे ” तौबा यह मतवाली चाल…” और सड़क पर लड़कियों का रास्ता रोककर “ये दिल ना होता आवारा …” गाते हुए देवानंद. भारतीय दर्शक तो यह सब तब से देख रहा है जब से सिनेमा ने सही से खड़ा होना भी नही सीखा था.

क्या किसी फिल्म में यह दिखाया गया की हीरो को सड़क पर लड़की छेड़ने के जुर्म में सज़ा हुई यह कपडें फाड़ने पर पुलिस ने उसे धरा, हाँ यह सब ज़रूर देखा होगा की हीरो ने कानून की परवाह किये बैगर अपने निजी दुश्मनों को मार गिराया, ना ही पुलिस ने उसे पकड़ा और ना ही क़ानून ने उसे सज़ा दी .. हाँ अगर अदालत जाना भी पड़ा तो जज के सामने भावुक भाषण से मीलॉर्ड का दिल पिघल गया और उन्होंने जनभावनाओं का ध्यान रखते हुए फैसला सुना दिया.

(कोहराम न्यूज़ के लिए लिखा गया रमेश कुमार का लेख )

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