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माजिद मजाज़

मस्जिद ए क़ुर्तबा मुसलमानों का एक अजीम शाहकार है, तामीर के एतबार से भी और एक एतिहासिक विरासत के तौर पे भी। इस मस्जिद की तामीर दो सौ साल में मुकम्मल हुई थी, जिसमें लगभग एक हज़ार खम्भे हैं, जो 1931 तक दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद हुआ करती थी। इसका आर्किटेक्चर आज भी दुनिया के लिए एक मिसाल है।

क़ुर्तबा शहर अपने ज़माने में दुनिया का सबसे बड़ा शहर था। क़ुर्तबा शहर की शोहरत इसके बड़े होने की वजह से नहीं थी बल्कि ज्ञान का सबसे बड़ा केंद्र होने की वजह से था। क़ुर्तबा मस्जिद, क़ुर्तबा यूनिवर्सिटी का ही एक हिस्सा थी, अब आप इससे समझ सकते हैं कि क़ुर्तबा यूनिवर्सिटी कितनी बड़ी थी। ये यूनिवर्सिटी आठवीं सदी में शुरू हुई थी और दसवीं सदी तक ये दुनिया की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी बन गई थी और तेरहवीं सदी तक ये दुनिया की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी रही थी। इस यूनिवर्सिटी की लाईब्रेरी दुनिया की सबसे बड़ी लाईब्रेरी थी, मेडिकल साइंस के लिए ये पूरी दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र था। इस यूनिवर्सिटी का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि यहाँ लगभग ढाई हज़ार टीचर और बीस हज़ार से अधिक बच्चे पढ़ते थे। उस वक़्त यूरोप और अफ़्रीका यहीं आकर पढ़ता था।

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ये शहर वेस्टर्न वर्ल्ड के अंदर पहला शहर बना जहाँ पहले कुछ नहीं था, इस शहर को बिलकुल नए तरह से बसाया गया था। इस शहर के अंदर सारी सुविधाएँ मौजूद थीं। सीवेज सिस्टम, ड्रिंकिंग वाटर सिस्टम, बाथरूम से लेकर नाली तक का सिस्टम था, जगह जगह स्ट्रीट लाइट थी, विश्वविद्यालय था, लाईब्रेरी था। गरचे कि इंसानों को रहने लायक एक आधुनिक सुविधाओं से भरपूर जगह थी।

यहाँ से जो सभ्यता उभरी उसने दुनिया को एस्ट्रोनोमी, फ़िलास्फी, भूगोलशास्त्र जैसे ज्ञान और विज्ञान दिया। इब्न ए रुश्द, इब्न ए सीना, इमाम कुर्तबी, इब्न उल हज़म जैसे लोग इसी दौर में यहाँ पैदा हुये।  चम्मच एवं फोक से खाना खाना यहीं से शुरू हुआ। ग्लास से पानी पीना यहीं से शुरू हुआ इससे पहले लोग प्यालों में पानी पिया करते थे। चौड़ी सड़कें, नक़्से से बना मकान, पॉर्क, सुव्यवस्थित मोहल्ले इन सबकी शुरूआत यहीं से हुई।

ये सब मुसलमानों की अज़ीम तारीख़ थी जिसने उस वक़्त दुनिया को एक नई तहज़ीब दी थी। इस क़ौम का इतना शानदार माज़ी रहा है पर आज “गँवा दी हमने जो असलाफ़ से मीरास पाई थी… सुरैय्या से ज़मीं पर आसमाँ ने हमको दे मारा”।

अल्लामा इक़बाल ने ताजमहल पे कोई नज़्म नहीं लिखी, मस्जिद-ए-अक़्सा पे कोई नज़्म नहीं लिखी, यहाँ तक कि मस्जिद-ए-नबवी पे भी कोई नज़्म नहीं लिखी, पर इक़बाल ने मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा पे नज़्म लिखी। आख़िर क्यों?

इक़बाल का मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा पे नज़्म लिखने का मक़सद इस मस्जिद के आर्किटेक्चर या इसकी ख़ूबसूरती को बताने के लिए नहीं था बल्कि अल्लामा ने इसे एक सिम्बल के तौर पे लिया जो मुसलमानों के उरूज और ज़वाल की सबसे बड़ी दास्तान है। ये इंसानी तारीख़ की बुलंदी और गिरावट की नक्काशी करती है। और ये जो क़ुर्तुबा है वो मुस्लिम सभ्यता का उरूज था, वो सभ्यता जिसका विस्तार यूरोप से लेकर एशिया तक हो चुका था, जो दुनिया की तारीख़ में कोई भी क़ौम ने आजतक ये मुक़ाम हासिल नहीं कर पाया। क़ुर्तुबा शहर उस वक़्त पूरी दुनिया का केंद्र रहा करता था, नई-नई तहजीबें भी यहीं से जन्म ले रही थीं।

ये मुस्लिम तहज़ीब ओ सकाफत का, मुसलमानों के उलूम-ओ-फुनून का जो एक मेअयार है, इस्लामी तहज़ीब की जो बुलंदी है, उसका ये एक बेहतरीन नमूना है। इसीलिए इक़बाल ने इसे एक सिम्बल बनाकर इस क़ौम को अपना पैग़ाम दिया था। इक़बाल की ये नज़्म कौमों को उनके माज़ी से उनकी हाल और उनकी मुस्तकबिल के दरमियान एक रिश्ता क़ायम करती है।

“जिस में न हो इंक़लाब मौत है वो ज़िंदगी 
रूह-ए-उमम की हयात कश्मकश-ए-इंक़िलाब

सूरत-ए-शमशीर है दस्त-ए-क़ज़ा में वो क़ौम 
करती है जो हर ज़माँ अपने अमल का हिसाब।”

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