बड़ा सवाल: बाजारू शिक्षा के लिए क्या बच्चों के दुश्मन बन बैठें खुद मां-बाप ?

7:59 pm Published by:-Hindi News

ताबिश सिद्दीकी

जब मेरा बेटा 3rd में था तो एक दिन गर्मियों में मैं उसके स्कूल गया उसकी टीचर और प्रिंसिपल से मिलने.. ये कहने के लिए कि कम से कम गर्मियों की छुट्टियां थोड़ी जल्दी कर दिया कीजिये.. क्यूंकि जब डीएम का आदेश आता है कि “अब लू चलने लगी है इसलिए स्कूल बंद कर दिए जाएं” तब आप लोग स्कूल बंद करते हैं.. क्या स्कूल प्रशासन को इतनी समझ नहीं होती है कि बच्चे बीमार हो सकते हैं इसलिए स्कूल बंद कर दें?

और मैंने उनसे ये मांग भी रखी कि इतने छोटे बच्चों के लिए हफ़्ते में दो दिन, शनिवार और रविवार को छुट्टी होनी ही चाहिये, जैसा कई स्कूलों में होती है

स्कूल प्रशासन मेरी मांग सुनकर ऐसा अचंभित हो गया कि जैसे मैं कोई एलियन हूँ और अजीब सी दूसरे ग्रह की कोई मांग ले कर आ गया हूँ.. स्कूल वालों ने कहा कि “साहब, आप पहले आदमी हैं जो ये कहने आये हैं कि बच्चों को छुट्टियां ज़्यादा दिया कीजिये.. यहां तो ये हाल है कि ज़्यादातर मां बाप को ये लगता है कि अगर उनका बच्चा गर्मी की छुट्टी में भी स्कूल आये तो शायद वो ज़्यादा क़ाबिल बन जायेगा.. और उन्हें ये लगता है कि गर्मी की छुट्टी की स्कूल फ़ीस तो बेकार ही चली जाती है क्यूंकि बच्चा पढ़ नहीं सकता है”

प्रशासन ने मुझे बताया कि उन पर दबाव होता है कि कम से कम छुट्टी की जाय और बच्चों को पढ़ा पढा कर गधा बना दिया जाय करे.. हर मध्यम वर्गीय माँ बाप को लगता है कि उनका बच्चा जितना ज्यादा देर स्कूल में रहेगा, वो उतना ही समझदार और बड़ा आदमी बनेगा

मुझे सच मे ये सुन कर ताज्जुब हुवा कि ये दरअसल माँ बाप होते हैं जो चाहते हैं कि उनका बच्चा संडे को भी स्कूल में जाए तो अच्छा है.. ये किस तरह के लोग होते हैं और जीवन को लेकर इनके भीतर किस तरह की समझ होती है जिन्हें ये लगता है कि सेकंड और थर्ड में पढ़ने वाला उनका बच्चा बस एक दो साल में ही आईएस बन जायेगा.. इसलिए वो उसको आईएस लेवल की पढ़ाई करवाने को आतुर रहते हैं?

फिर मैंने अपने आसपास के कुछ लोगों से बात की तो पता चला कि ये सही है.. क्यूंकि कई लोगों ने ये बताया कि उन्होंने अपने बच्चे का नाम उस स्कूल से कटवा लिया क्यूंकि वहां ज़्यादा छुट्टी होती थी और उन्हें अपने पड़ोसी के लड़के की “रट्टू तोता” जैसी समझ देखकर आत्मग्लानि हो जाती थी कि उनका बेटा तो इस स्कूल में पीछे ही रह जाएगा जबकि पड़ोसी का लड़का कक्षा तीन में वर्ड्सवर्थ की पोयम सुना रहा है.. तो उन्होंने उसे वहां डाल दिया जहां वो कक्षा तीन में वर्ड्सवर्थ को पढ़ सके

मैं बड़ी सोच में पड़ गया कि मेरे आसपास किस तरह और समझ के लोग हैं जिनके बीच मैं बिल्कुल मिसफ़िट हूँ.. ये किस तरह के माँ बाप होते हैं जिन्हें ये लगता है कि उनका बच्चा बस स्कूल जाने के लिए पैदा हुआ है.. ये किस तरह के रोबोटिक मध्यम वर्गीय लोग होते हैं आख़िर?

मध्यम वर्गीय मैं इस लिए कह रहा हूँ क्यूंकि भारत जैसे देशों में बच्चों से लेकर समाज मे जीने के ढंग का जो प्रेशर होता है, वो यही वर्ग “क्रिएट” करता है या बनाता है.. जीवन कैसे जीना है, लड़का लड़की को कैसे रहना है, कितना पढ़ना है, कितना घूमना है, कितने मारुति कार टाइप संस्कार होने चाहिए, ये सब यही “मध्यम वर्ग” बनाता है.. मतलब जितनी भी थोथी और बेकार की चीजें हैं इस समाज मे वो सब इसी वर्ग की देन है

भारत का मध्यम वर्ग एक “बीच” की ज़िंदगी जीता है.. जो ये तो जान जाता है कि जीवन मे आगे बढ़ने के लिए शिक्षा की ज़रूरत होती है.. मगर वो ये नहीं जान पाता है कि कितनी शिक्षा और कैसी शिक्षा चाहिए.. उच्च वर्ग को देखकर ये तो समझ जाते हैं कि फ़लाने लड़का या लड़की पढ़ के आगे बढ़ गया.. मगर वो ये कभी देख ही नहीं पाते हैं कि उच्च वर्ग अपने बच्चों की सेहत का कितना ख़याल रखता है और उनका बच्चा तैराकी से लेकर गोल्फ़ तक खेलता है तब वो जीवन के हर आयाम में एक सभ्य और सफ़ल इंसान बन पाता है.. यहां इन्हें बच्चों की सेहत से कोई लेना देना नहीं होता है.. बुख़ार होगा तब भी स्कूल भेज देंगे ताकि कहीं इनका बच्चा पीछे न रह जाए

भारत के इस वर्ग को बच्चों की आज़ादी और विचारों के स्वतंत्रता की कोई क़ीमत नहीं पता होती है.. ये करण जौहर की पिक्चर देखकर टनों आंसू बहा देंगे और कहेंगे कि देखो “फ़लाने लड़के/लड़की को उसका प्यार मिल गया.. कितना समझदार मां बाप दिखाया है पिक्चर में”.. ये फ़िल्मी विलेन, जो कि प्यार का दुश्मन होता है, उसे ख़ूब कोसेंगे.. मगर जब बात अपने बेटे/बेटी के प्यार की आये, तो इनसे बड़ा विलेन कोई नहीं निकलता है.. ये वर्ग पूरी तरह से नकली ज़िन्दगी जीता है.. चाहेगा कुछ और मगर करेगा कुछ और

ये एक नकलची वर्ग है.. जिनकी अपनी कोई सोच समझ और विचारधारा नहीं होती है.. ये “फ़लाने का बेटा डॉक्टर” है, देखकर अपने बेटे की ज़िंदगी नर्क बना देते हैं और फ़लाने ने आईएस निकाल लिया ये कह कह कर अपने मासूम बच्चे को ख़ुदकुशी करवा देते हैं या उसे डिप्रेशन का मरीज़ बना देते हैं

मैं अपने बच्चे से हमेशा कहता हूँ कि बेटा कभी स्ट्रेस लेकर पढ़ाई न करना और न ही किसी मैडल के लिए पढ़ना.. एग्जाम पीरियड में मैं उसे रिलैक्स करने की कोशिश करता हूँ और ये कहता हूँ कि “तुम्हें मेरे सामने कुछ भी प्रूव नहीं करना है.. और जब मेरे सामने नहीं करना है तो दुनिया की फ़िक्र ही छोड़ो”.. पढ़ो तो अपने लिए और ज्ञान अर्जित करो तो अपने लिए.. किसी और के लिए कुछ नहीं करना है तुम्हें कभी

हमारे बच्चे इस संसार मे स्कूल जाने के लिए नहीं आये हैं.. स्कूल प्राकृतिक व्यवस्था नहीं है.. ये बाज़ार की व्यवस्था है.. ये ज़रूरी है मगर ये जीवन नहीं है.. जीवन स्कूल से परे है.. और यक़ीन मानिए हमारे समाज की स्कूल की ये व्यवस्था “अमानवीय” है.. एक पशु अगर आप देखते हैं जिस पर उसके मालिक ने उसकी औक़ात से ज़्यादा बोझा लाद दिया होता है, तो आप जाने क्या क्या बोल देते हैं उस पशु के मालिक को.. मगर अपने नन्हें बच्चों का बोझ दिखता है कभी आपको? कभी आप सोच भी पाते हैं कि आपका पांच साल का बच्चा आपके अमानवीय स्कूलों की “टेस्ट” की वजह से कितना मानसिक दबाव में होता है??

मेरा बस चले तो हफ़्ते में चार दिन से ज़्यादा बच्चों का स्कूल न खोलूं.. मेरा बस चले तो गर्मी और सर्दी में कम से कम दो दो महीने की छुट्टी बच्चों को दूं.. मेरा बस चले तो बच्चों को सिर्फ़ एक या दो सब्जेक्ट ही पढ़ने को दूं जिनमे उनकी रुचि हो.. मेरा बस चले तो घर में स्कूल की कोई किताबें न रहने दूं और स्कूल की किताबों को स्कूल तक ही सीमित कर दूं.. मेरा बस चले तो घर मे बच्चों को बस जीवन जीना सिखाऊं.. और कुछ नहीं

मगर मेरा बस चले तब न..

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