मेरी श्रीमती धर्मपत्नी जी, टीवी न्यूँज़ चैनलों पर समाचार कभी नहीं देखतीं, कहतीं हैं कि शोर बहुत करते हैं यह सब। हाँ समाचार पत्र पढ़ती हैं, मेरा हाकर “अमर उजाला” समाचार पत्र दे रहा है आज कल कुछ दिन पहले तक “दैनिक जागरण” देता था।

मैने उससे कहा है कि तुम्हारा जब जो दिल करे वह समाचार पत्र दे जाया करो, मेरी नज़र में सब एक ही हैं “भाँड मीडिया।

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कल श्रीमती पत्नी जी ने मुझसे कहा कि योगी जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद लोग इतना तलाक क्युँ देनें लगे हैं ? मैं चौंका , कहा कि योगी जी के मुख्यमंत्री बनने से तलाक का क्या संबन्ध ? उन्होंने अमर उजाला के पिछले 5-7 दिन के अंक लाकर सामने रख दिया कि देखिए, हर अंक में “कहीं ना कहीं” तलाक की दो एक घटनाओं का अवश्य ज़िक्र है जो योगी के मुख्यमंत्री बनने से पहले नहीं छपती थीं।

मैंने कहा कि उत्तर प्रदेश की 5 करोड़ और देश के 20-22 करोड़ के मुसलमानों में दो चार होती पति-पत्नी से अलगाव की घटनाएँ ही तो भारत की “राष्ट्रीय आपदा” है।

यह दो चार लोगों का वैवाहिक जीवन से संतुष्ट ना होने से पत्नी से अलग हो जाना ही भारत की डीजीपी में गिरावट का कारण है, विकास दर रुक जाती है, आयात निर्यात का प्रतिशत और संतुलन गड़बड़ा जाता है, डालर के मुकाबले रूपये की कीमत घट जाती है, क्रूड आयल की दर बढ़ जाती है, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की कूटनीति प्रभावित होती है, सार्क से लेकर जी-20 तक के देशों के सामने भारत कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहता इत्यादि इत्यादि, इसलिए यह गहन चिंता का विषय है ही। और हमारी मीडिया तो है ही देशभक्त, इसलिए सब एक दो होते “तलाक” की घटनाओं को ढूँढ ढूँढ कर छाप रहे हैं, देश के प्रति अपने कर्तव्य को निभा रहे हैं।

श्रीमती जी ने कहा कि हद है “मेरे जीवन में आज तक मैंने केवल एक तलाक की घटना देखी वह भी लड़की ने खुद ली, पति तो इस संबन्ध को निभाना चाहता था” और यहाँ तो राष्ट्रीय आपदा ही बना दिया गया, मैंने कहा कि मैंने भी अपने जीवन में मात्र दो तलाक देखे हैं, तलाक एक हो या दो, यही तो “राष्ट्रीय विपदा” है।

हेडिंग देखिएगा,

“फोन पर पत्नी को तलाक दिया”

“पत्र लिख कर तलाक दे दिया”

“एसएमएस से तलाक दे दिया , पत्नी रेल पटरी पर लेटी”

“फेसबुक पर तलाक दे दिया”

“ट्विटर पर तलाक दे दिया , पत्नी द्वारा 1 बच्चे के साथ आत्महत्या की कोशिश।”

हद है उजड्डपने की, किसी को अपने वैवाहिक जीवन को समाप्त करने के लिए अपनी पत्नी को “तलाक” देना या कहना एक “संदेश” मात्र है और उसके लिए दुनिया के बदल गये संचार माध्यम का प्रयोग कोई कर रहा है तो उसमें भी आपति, ऊपर से आरोप भी लगता है कि मुस्लिम अपने धर्म को लेकर बदलाव नहीं चाहते, कहीं कहीं बदले तो गालियाँ भी खा रहे हैं। हद है, इस्लाम में निकाह हो या तलाक, सिर्फ़ कबूल करने और संदेश देने से ही होता है, सबमे 5 मिनट लगते हैं, 6 घंटे का कर्मकांड नहीं होता।

22 करोड़ लोगों में यदि मान भी लिया कि किसी 2-4 ने “तलाक” व्यवस्था का दुरुपयोग भी किया तो उच्चतम न्यायलय उसे न्याय का अंतिम अध्याय समझ कर सुबह शाम पैरवी करता है और बाकी 22 करोड़ लोग उसी इस्लामिक व्यवस्था में सफल वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रहे हैं तो कानून की देवी फट से आँखों पर पट्टी बाँध लेती हैं।

यह हो रहा है इस देश में, देश की सारी व्यवस्थाएँ ” 2-4 हुए तलाक के कारण ध्वस्त होने के डर से इस मामले के विरुद्ध मोर्चा खोले हुए हैं जैसे तलाक के अतिरिक्त इस देश में और कोई समस्या ही नहीं।

कभी किसी “मांगलिक” लड़की का दर्द सुनिए , आखों से आँसू आ जाएँगे , यह तलाक से अधिक विभत्स स्थिति है।

वैवाहिक जीवन को सफल बनाने की ज़िम्मेदारी केवल पुरुष की ही नहीं महिला की भी उतनी ही होती है, कोई भी अपना वैवाहिक जीवन समाप्त करना नहीं चाहता क्युँकि यह बहुत अधिक मानसिक प्रताड़ना देता है परन्तु यदि वैवाहिक जीवन ही इस मानसिक प्रताड़ना से अधिक भय॓कर रूप ले ले और अलगाव ही एक अंतिम विकल्प हो तो इस्लाम में “तलाक” एक बेहद आसान प्रक्रिया है, इसी कारण मुसलमानों में बहुओं को जलाया नहीं जाता, बहुएँ आत्महत्या नहीं करतीं, बहुएँ प्रताड़ित होकर मायके बिना अलगाव किए ही आकर बैठ जाती हैं।

इस्लामिक व्यवस्था में पति और पत्नी यदि एक दूसरे से संतुष्ट नहीं हैं तो एक बिल्कुल सरल प्रक्रिया “तलाक और खुला” के तहत अलग होकर कैसी और से नया विवाह कर सकते हैं और 99% मामलों में वह ऐसा ही करते हैं।

वैवाहिक संबन्थ टूटने का ज़िम्मेदार केवल पुरुष ही नहीं होता, महिलाएँ भी होतीं हैं, महिला यदि अपने पति की इच्छा के अनुसार नहीं रहती तो यह उस महिला का दोष ही है ऐसे ही पुरुष भी यदि अपनी पत्नी की इच्छा के विपरीत रहता है तो पुरूष दोषी है। दोनों में किसी एक का असंतुष्ट होना ही अलगाव की प्रक्रिया को जन्म देता है।

कहने का अर्थ मात्र इतना है कि एक सरल प्रक्रिया के तहत अवगाव के ज़िम्मेदार पति और पत्नी दोनों हैं परन्तु जैसे महिला आज के युग में सदैव एक एज लिए होती है और लोगों से मनोवैज्ञानिक लाभ और संवेदना लिए आगे रहती है इस कारण से उसका दोष छुप जाता है और पुरुष तो फिर है ही निरंकुश आत्याचारी इत्यादी इत्यादि।

एक अंतिम स्थिति देखिए, जिस तलाक या अलगाव के कारण महिला समान रूप से दोषी है वह “तलाक” राष्ट्रीय विपदा है और जन्म के समय ग्रह और नक्षत्र के आधार पर पंडित जी द्वारा बना दी गयी कुंडली से एक लड़की “कुत्ते से लेकर बरगद” तक विवाह करती है, माँगलिक होने के कारण मनपसंद वर नहीं चुन पाती, अपने स्तर से बहुत नीचे स्तर में अपने मन को मार कर वह विवाह करती है और अधिकांश का विवाह तमाम अड़चनों के बाद बहुत देरी में होता है जिसमें उसका कोई दोष नहीं फिर भी यह “राष्ट्रीय आपदा” तो छोड़िए चर्चा के योग्य भी नहीं होती। भाँड मीडिया सुबह शाम माँगलिक से लेकर तमाम दोष दूर कराने का उपाय बताती दिखेंगी।

मोहम्मद जाहिद की कलम से…

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