Tuesday, October 26, 2021

 

 

 

उर्दू ज़बान अपनी तारीखी हकीकत खोती हुई.

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उर्दू लफ्ज़ का इस्तेमाल सबसे पहले तेहरवी सदी में ग़ुलाम हमदानी मुशाफी ने किया था. उर्दू ज़बान की पाकीजगी को कौन नहीं जनता इसके तलफ्फुज नजाकत का हर वो शख्स कायल होगा जिसने मीर से फ़राज़ की गज़ले और सूफियाना कलाम सुने हैं. इस ज़बान को पसंद करने वाले सिर्फ हिन्दुस्तान पकिस्तान में नहीं बल्के पूरी दुनिया में हैं, बावजूद इसके ये ज़बान आज वक़्त की तारीकियो में गुम होने की कगार पर है.

ज़बान उर्दू को ज़्यादातर लोग शायरों के मुखातिब भी जानते हैं, जिन्होंने अपनी ग़ज़ल और शायरियो में उर्दू ज़बान को एक ख़ास एहमियत दी है या यूँ कह सकते हैं के इन शायरी और ग़ज़लों की जान उर्दू के तलफ्फुज में ही है. अमीर खुसरो, मीरा, मुहम्मद कुली क़ुतुब शाह, अल्लामा इकबाल, नवाब सादुल्लाह खां, मीर तारिक मीर और काफी सारे शायर हैं जिन्होंने उर्दू को लोगो तक पहुँचाने का एक बड़ा खूबसूरत जरिया बनाया जो थी उनकी ग़ज़ल और कलाम. उर्दू के सूफियाना कलाम का कायल कौन नहीं.

आज हम कहते हैं के हम इक्कीसवी सदी में हैं, लेकिन क्या इसका ये मतलब है के हम उन सब चीजों और बातो को पीछे छोड़ आये जिसने शुरुआत की एक अलग ही ज़बान की, नहीं बिलकुल नहीं. उर्दू की जो पहचान है उसे बनाये रखने के लिए हमें ही आगे आकर कुछ करना होगा. मुसलमानों में तालीम की जो कमी है उसे पूरा करने के लिए हमें ही क़दम बढ़ाने होंगे. ताकि आज के दौर का मुसलमान फख्र करे मुसलमान होने पर और अपनी कौमी ज़बान पर भी.

उर्दू ज़बान को फ़रोघ देने और उसे रोज़गार से जोड़ने के लिए कंप्यूटर, कैलीग्राफी, उर्दू अरबी डिप्लोमा कोर्स चलाये जाते हैं, लेकिन उनका फायदा उन बच्चो को नहीं मिल पाता जिन्हें ज़रुरत है. गावों में रहने वाले लोग इन सब चीजों से महरूम रहते हैं यहाँ तक के कितने ऐसे लोग हैं जिन्हें पता ही नहीं है अपनी कौमी जुबांन के बारे में भी. ज़रुरत मंद लोगो को अगर हम इन कोर्स की जानिब से कुछ मदद पहुंचा सके तो ये एक बहुत अच्छा ज़रिया बनेगा उर्दू ज़बान की तरक्की का.

मुआशरे की तरक्की उसके बाशिंदों के हाथ में होती है, और हमें इस ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाना होगा. उर्दू ज़बान और उसकी एहमियत को एक बार फिर उजागर करना होगा.

आखिर में निशात पैकर इलाबादी के कुछ अशार-

तहज़ीब का जहां है उर्दू ज़बान हमारी धरती पे आसमां है उर्दू ज़बान हमारी

संगम है ये दिलो का लहरें हैं इसके परचम गहवा रहनुमा है उर्दू ज़बान हमारी.

 कोहराम के लिए एक पाठक द्वारा भेजा गया 

 

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