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पुष्पिता अवस्थी को एक प्रवासी प्रतिष्ठित साहित्यकार माना जाता है लेकिन वे भारतवंशियों की व्यथा- कथा लिखने वाली प्रथम साहित्यकार है जिन्होंने कैरिबियाई देशों में रह रहे भारतवंशियों को अपनी कथा का आधार बनाकर उनको नई संजीवनी देने का एक पुण्य कार्य किया है। जिसको आज भारतीय साहित्य के उत्थान और सम्मान के लिए सक्रिय गैर सरकारी संस्था कुसुमांजलि फाउंडेशन ने सम्मान दिया है यह सम्मान साहित्यकार डॉ. कुसुम अंसल द्वारा शुरू किया गया है दरअसल यह सम्मान हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में लिखने वाले उत्कृष्ट रचनाकारों को दिया जाता है।

कुसुमांजलि सम्मान की शुरुआत 2012 में हुई थी जिसके अंतर्गत अनेक साहित्यकारों को यह सम्मान दिया गया है यह ऐसी संस्था है जो उत्कृष्ट साहित्यकारों को उनकी बेजोड़ और अद्वितीय रचना को सम्मानित करके उनका उत्साहवर्धन करती है बहुत ही सुधी और प्रखर समिति के सदस्यों द्वारा इसका चयन होता है, जो किसी भी रचना को उसके अनेक मापदंडों पर तौल कर उसको पुरुस्कृत करती है। इस बार हिंदी और जो अन्य भारतीय भाषा के रचनाकारों को चुना गया है उसमें आसामी भाषा के डॉ. डेका और हिंदी भाषा की मर्मज्ञ, भाषाविद्, प्रेम की कवयित्री प्रोफ़ेसर पुष्पिता अवस्थी के ‘छिन्नमूल’ नामक उपन्यास को चुना गया है ।

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इस उपन्यास की खूबसूरती यह है कि यह प्रोफ़ेसर पुष्पिता अवस्थी के पन्द्रह सालों की तपस्या है जिसको उनको 2001 से 2016 तक सूरीनाम के अपने और नीदरलैंड में रहकर स्वयं अपनी आंखों से देखा है उसका एहसास किया है तथा उसको मानवतावादी दृष्टिकोण से अपनी कलम से उकेरने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। जिसमे गिरमिटिया मज़दूरों की व्यथा तो है ही उसके अलावा भारतवंशियों के द्वारा अपनी भाषा, संस्कार, संस्कृति को भी बचाये रखने और उसको संजोए रखने का अनहद नाद भी है। इस उपन्यास में ऐतिहासिक दृष्टिकोण तो है ही उसके अलावा संस्कृति, संस्कार, परम्पराएँ, तुलसीदास की रामचरित मानस, और कबीर के बीजक का भी पुट देखने को मिलता है। जिसको कोई भी पाठक पढ़ता है तो उसका विश्लेषण अवश्य करता है और वो 5 जून 1873 की गिरमिटिया मजदूरों की कथा को देखता है जिसमे कॉलोनाइजरो द्वारा भारतीय गिरमिटिया मज़दूरों के साथ हुई बर्बरता, दुराचार और उनको वर्षो तक शिक्षा से दूर रखने के छल प्रपंच को भी समझता है जिससे उसको मालूम होता है कि आखिर किस प्रकार उनके खून- पसीने को कॉलोनाइजर ने अपने लाभ के ख़ातिर गिरमिटिया मज़दूरों का दोहन किया है।

इस उपन्यास में संवेदना के अभिव्यक्ति का स्तर बहुत उच्च कोटि का है जिसको एक आम पाठक पढ़ते हुए अनेक बार अपनी आंखें नम होते हुए अनुभव करता है। उन्ही नम आंखों, संवेदनाओं, गिरमिटिया मज़दूरों, भारतवंशियों के दर्द को भलीभांति समझकर आज कुसुमांजलि फाउंडेशन की ज्यूरी टीम ने इस उपन्यास को सम्मानित किया है जिससे सूरीनाम, नीदरलैंड और कैरिबियाई देशों में रह रहे भारतवंशियों की पीढ़ियों को सम्मान है। जो डच भाषा को छोड़कर विश्व की किसी भी भाषा को ध्यान में रखते हुए हिंदी भाषा मे पहला उपन्यास है जो कन्त्राकी बागान ( कॉन्ट्रैक्ट प्लांटेशन के तहत ले जाये गए हिंदुस्तानियों के दारुण संघर्ष का जीवित दस्तावेज़ी आख्यान है.

(लेखक परिचय: यह आर्टिकल पत्रकार अकरम हुसैन द्वारा लिखा गया है.)

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