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डॉ. शारिक़ अहमद ख़ान

पहले अपना पैजामा उतारो और कुर्ता खूंटी पर टांगो,बाबा रामदेव की तरह कपड़े पहनो–यूपी सरकार का कहना है कि मदरसों में कुर्ता-पाजामा की जगह पैंट शर्ट चलेगी। वजह कि कुर्ता-पाजामा से मदरसे के छात्रों की पहचान एक धर्म विशेष की होती है। आधुनिकीकरण कर सरकार अब पैंट-शर्ट पहनाएगी।

कुर्ता-पाजामा तो है ही मुसलमानों की ड्रेस। मुग़लकाल से ही कुर्ता पाजामा चलन में आया। बाबर ने लिखा है कि हिंदोस्तान के लोग आधी धोती लपेटते हैं और आधी ओढ़ते हैं। इब्नबतूता ने लिखा कि हिंदोस्तान के लोग सिले कपड़े नहीं पहनते हैं। सम्राट तुग़लक भी लुंगी पहनता है और ऊपर झब्बा पहनता है। झब्बे के ऊपर ख़िलअत भी पहनता है। । मिर्ज़ई समेत जितने भी सिले कपड़े हैं सब मुसलमान हिंदोस्तान में लाए। कुछ सल्तनत काल में चलन में आए तो कुछ मुग़ल काल में। यहाँ तो बाबा रामदेव और गांधीजी की तरह आधी धोती पहनने और आधी ओढ़ने का रिवाज था। तो पहले सभी भाजपाई कुर्ता-पाजामा उतार दें। ये म्लेच्छों का परिधान है। मतलब हम मलिच्छों का कपड़ा।  तो मलिच्छ ना बनें। वेदपाठी की तरह कपड़े पहनें। तुलसीदास की तरह रहें।

वैसे आजकल यूपी के विश्वविद्यालयों में डिग्री अवार्ड के वक्त पैंट -शर्ट और गाऊन की जगह धोती-कुर्ता पहनने का रिवाज है। ये कुर्ता तो हमारा है। ईरान से मुसलमान भारत लाए। आप कुर्ता -धोती पहनकर डिग्री लें और मुसलमान मदरसा छात्र कुर्ता-पाजामा भी न पहनें। रामनाईक जी, वही रामनाईक जी जो पिक्चर वाले गोविंदा से चुनाव हार गए थे, अरे भई वही जो गवर्नर साब हैं यूपी के,वो धोती-कुर्ता पहनाकर डिग्री अवार्ड कराते देखे गए। तो कुर्ता क्यों भई।  सिर्फ़ धोती पहनकर ही डिग्री अवार्ड हो। मतलब बिना सिला कपड़ा पहनकर।

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किसी पुराने कहानीकार की एक कहानी याद आई।  जिसमें ब्रिटिश काल में एक सनकी अंग्रेज़ अफ़सर आदेश देता है कि सभी लोग टाई लगाकर आएंगे। आफ़िस के एक हिंदोस्तानी कलर्क धोती-कुर्ता पहनते थे। दूसरे दिन धोती-कुर्ता पर टाई लगाकर आए। अफ़सर ने कुछ यूँ कहा कि ‘ वेल बाबू टुम ये क्या करटा ‘ डांटा बाबू को। अब बाबू अगले दिन पाजामे के अंदर कुर्ता खोंसकर और कुर्ते पर टाई लगाकर आए। तो वही हाल है। धर्मनिरपेक्ष देश में सबको अपनी रवायतों का पालन करने की आज़ादी है। भाषा-कपड़े और धर्म बरतने की स्वतंत्रता है। वैसे इस सरकारी आदेश से होना कुछ नहीं है। बस चर्चा चल जाएगी।  मदरसे वाले तो कुर्ता -पाजामा पहनते ही रहेंगे। बहुत हुआ तो अनुदानित मदरसे वाले कुछ दिन ड्रामा करके पैंट-शर्ट पहनेंगे और मज़ा लेंगे।

वैसे अंग्रेज़ों से पैंट-हाफ़पैंट और शर्ट समर्थकों का बड़ा याराना लगता है। कहते कि आधी धोती ओढ़कर और आधी लपेटकर आओ गांधीजी की तरह और हज के एहराम की तरह तो समझ में आता। लेकिन पैंट-शर्ट जैसी अंग्रेज़ी ड्रेस पहनने को कहा। अंग्रेज़ों से छनती जो गाढ़ी थी।

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