मैं उस शख्स का बहुत अहसानमंद हूं जिसके दिमाग में सबसे पहले डिक्शनरी बनाने का खयाल आया। डिक्शनरी सिर्फ दो ज़बानों को ही नहीं जोड़ती, यह दो दिलों और देशों को भी जोड़ती है। मैं इस मामले में बहुत खुशनसीब रहा कि मुझे इनाम में डिक्शनरी बहुत मिलीं। इतनी कि उनसे मेरी छोटी अलमारी का एक हिस्सा पूरा भर गया।

वे मेरे लिए बहुत मददगार साबित हुईं। आज भी जब मुझे किसी शब्द का अर्थ जानना होता है तो मैं उन्हीं पुरानी डिक्शनरी की मदद लेता हूं। जब उनके कागज को छूता हूं तो मैं खुद को एक बच्चे जैसा महसूस करता हूं जिसे अभी-अभी इनाम मिला है। उन किताबों के कागज में आज भी वही खुशबू है जो पहले हुआ करती थी। विद्यार्थियों को स्कूलों में बतौर इनाम डिक्शनरी जरूर देनी चाहिए।

एक विद्यार्थी के लिए किताब से बढ़कर कोई इनाम नहीं हो सकता और एक फौजी के लिए वह तमगा जो उसकी बहादुरी के लिए दिया जाता है। हमारे मुल्क हिंदुस्तान की धरती ने तो कई जांबाज पैदा किए हैं। उनकी बहादुरी, दिलेरी के किस्से आज भी पढ़े-सुने जाते हैं।

बात जब इनाम और सम्मान की हो रही है तो आपसे एक सवाल पूछ लेता हूं- क्या आपने विक्टोरिया क्राॅस का नाम सुना है? शायद सुना हो। यह ब्रिटिश सैनिकों को बहुत बहादुरी और अद्भुत पराक्रम के लिए दिया जाने वाला सम्मान है। इंटरनेट पर इसके बारे में काफी जानकारी उपलब्ध है।

विक्टोरिया क्राॅस का इतिहास 150 साल से ज्यादा पुराना है। साल 1856 में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने हुक्म देकर विक्टोरिया क्राॅस का निर्माण करवाया था। इसे बनाने में रूस की दो तोपों से निकली धातु का इस्तेमाल किया गया था। वे तोपें 1854 में क्रीमिया की लड़ाई में ब्रिटेन के हाथ लगी थीं।

इस तरह विक्टोरिया क्राॅस की रस्म शुरू हुई। जिन बहादुरों को इससे नवाजा जाता था, वे इसे सीने पर लगाकर शान से चलते। उनके लिए यह बहुत फख्र की बात होती और उनकी पीढ़ियां इसे संभालकर रखतीं।

पहले यह सिर्फ ब्रिटिश सैनिकों को ही दिया जाता था। फिर जब भारत में ब्रिटिश हुकूमत मजबूत हुई तो उसे खयाल आया कि हिंदुस्तानी सैनिकों को भी उनकी दिलेरी के लिए विक्टोरिया क्राॅस दिया जाए। जल्द ही इस पर मुहर लग गई।

जमाना बदला और साल आ गया 1914 का। यूरोप में बहुत दिनों से लड़ाई का माहौल बन रहा था। जल्द ही पहला महायुद्ध शुरू हो गया। अब ब्रिटेन को जरूरत थी ऐसे बहादुरों की जो अपनी जान पर खेलकर उसकी हिफाजत कर सकें। लंदन के फव्वारे, खूबसूरत बगीचे, टोपी लगाकर बग्घी में घूमते भद्र लोग, चमकतीं सड़कें और महारानी का महल – हर किसी को हिफाजत की जरूरत थी।

तब पूरे हिंदुस्तान में ऐसे नौजवानों की खोज शुरू हुई जो फौरन लड़ाई के लिए कूच करें। गांव के मुखिया को खासतौर पर ऐसे नौजवानों की खोज का जिम्मा सौंपा गया जो तंदुरुस्त हों और लड़ाई में काम आ सकें।

यह मुहिम कामयाब हुई। कुछ ही दिनों बाद करीब 4 लाख से ज्यादा जवान यूरोप के लिए रवाना हुए। उन्होंने यह सफर पानी के जहाज से पूरा किया।

लड़ाई शुरू हो चुकी थी। यूरोप में सुलगती आग एक देश से दूसरे देश की ओर बढ़ रही थी। 31 अक्टूबर 1914 को भारत से यूरोप गए कुछ सैनिकों की टुकड़ी पर जर्मन का हमला हुआ। मौके पर मौजूद हमारे पांच सैनिक कुर्बान हो गए। सिर्फ एक जांबाज बचा, जिसका नाम था- ख़ुदादाद ख़ान। वह बहुत बहादुरी के साथ लड़ा।

इस पराक्रम और साहस के लिए बाद में ख़ुदादाद को विक्टोरिया क्राॅस से सम्मानित किया गया। यह भारत को मिला सबसे पहला विक्टोरिया क्राॅस था।

लड़ाई के बाद ख़ुदादाद ख़ान घर लौटे। वे अविभाजित भारत के डब गांव में जन्मे थे जो जिला झेलम, पंजाब में आता था। यह जगह अब पाकिस्तान में है। यहीं 20 अक्टूबर 1888 को ख़ुदादाद का जन्म हुआ था।

1947 में जब भारत-पाक विभाजन हुआ तो कई चीजें बहुत तेजी से बदलीं। ख़ुदादाद का घर अब भारत में नहीं, पाकिस्तान में था।

1956 में ख़ुदादाद को ब्रिटेन से न्योता मिला। मौका था – महारानी की ताजपोशी। ख़ुदादाद लंदन गए। वहां लाॅर्ड माउंटबेटन भी मौजूद था। साथ ही वे बहादुर सैनिक जिन्हें विक्टोरिया क्राॅस मिला था।

जब खाने का वक्त हुआ तो वहां मौजूद हर शख्स अपने नसीब पर गर्व कर रहा था कि महारानी ने उन्हें इस मौके पर शिरकत करने के लिए न्योता भेजा, लेकिन एक व्यक्ति उस भीड़ से गायब था। उसका नाम था ख़ुदादाद ख़ान। माउंटबेटन को देखकर उसके दिल में 1947 की वो यादें फिर ताजा हो गईं जब मुल्क बांट दिया गया।

ख़ुदादाद ने वहां यह कहकर खाना खाने से इन्कार कर दिया कि माउंटबेटन ने जिस बेदर्दी से हिंदुस्तान को बांटा, उस नाइन्साफी के बाद इस शख्स का खाना मुझ पर एक बोझ की तरह होगा।

यह कहकर वो अपने मुल्क लौट गए। 8 मार्च 1971 को उनका इंतिकाल हो गया। बंटवारे की एक कहानी यह भी थी, पर इसे उन किताबों में दर्ज नहीं किया गया जो हमें पढ़ाई जाती हैं। हकीकत यह है कि 1947 में जिन मुट्ठी भर मुसलमानों ने बंटवारे का समर्थन किया, उससे बहुत ज्यादा मुसलमानों ने बंटवारे का विरोध किया था। उन्होंने जिन्ना को नहीं महात्मा गांधी को अपना नेता माना था।

हिंदू और मुसलमान इस मुल्क की दो ऐसी मज़बूत बाजू हैं जो अगर एक मकसद के लिए एक ताकत के साथ जुट जाएं तो दुनिया में कोई रुकावट नहीं जो इनका रास्ता रोक पाए।

– राजीव शर्मा (कोलसिया) –

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