Sunday, August 1, 2021

 

 

 

ख़ालिद अयूब मिस्बाही: नबी सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम की तारीख़े पैदाइश 8 या 12?

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ख़ालिद अयूब मिस्बाही

जैसे ही मीलादुन्नबी का मौसम आता है बरसाती मख़लूक़ की तरह एक मख़सूस तबक़ा अपनी अ़ादत के मुताबिक़ ग़रीब अहले सुन्नत पर चंद घिसे-पिटे पुराने ऐतिराज़ों की तौमार करना शुरू कर देता है और इस तरह हर बार इस मौसम में सोशल मीडिया पर वो चंद ऐतिराज़ गर्दिश करने लगते हैं, जिनसे मुसलमानों का ज़हन ख़राब हो, नबी से उम्मत की दूरी बने और एक बे-गुनाह मुसलमान को यह बावर करवाने की कोशिश की जाती है, गोया मीलाद और मीलाद से मुतअ़ल्लिक़ काम करके उसने अपनी ज़िंदगी का बड़ा पाप किया है।

आइये! इस मुख़्तसर सी तहरीर में ऐसे ही बे-तुके, ज़बरदस्ती उलझन पैदा करने वाले और मुसलमानों में इंतिशार पैदा करने वाले एक ऐतिराज़ का जवाब जानने की कोशिश करें ताकि हमारे दिल को इतमीनान हासिल हो, क्योंकि जो यह ऐतिराज़ करते हैं, वो कभी मुसलमानों को नबी ए करीम सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम की मुहब्बत पर जमा नहीं होने देंगे और सब कुछ जानते-बूझते हुए भी अपनी रज़ील हरकतों से बाज़ नहीं आ सकते।

ऐतिराजः- ‘‘अ़ाला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान अ़लैहिर्रहमा ने नबी ए करीम सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम की तारीख़े पैदाइश 8 और तारीख़े वफ़ात 12 रबीउल अव्वल लिखी है, फिर आप लोग बारहवीं को मीलाद क्यों मनाते हैं, यह तो वफ़ात की तारीख़ है?’’

जवाबः- ‘‘नुत्क़ुल हिलाल’’ अ़ाला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान अ़लैहिर्रहमा का एक तारीख़ी और तहक़ीक़ी रिसाला है जिसमें आपने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम की पैदाइश की तारीख़, पैदाइश के दिन, पैदाइश के महीने और शम्सी तारीख़ वग़ैरह की तफ़सील बयान की है।
किसी मसअले में इख़्तिलाफ़े राय होना या एक से ज़्यादा रिवायतें मंक़ूल होना, जाहिलों के लिए भले कोई बड़ी बात हो लेकिन अहले इल्म के लिए यह ना कोई नई बात है और ना अनोखी। बल्कि तफ़सीरी रिवायात, ज़ख़ीर ए हदीस, इस्लामी तारीख़ और फ़िक़्ही जुज़इयात में हज़ारों-हजार ऐसे मसाइल मिलते हैं जिनमें एक ही मसअले में कई-कई रिवायात मंक़ूल होती हैं।

हुज़ूर नबी ए करीम सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम की पैदाइश की तारीख़, दिन और महीने के सिलसिले में भी अहले इल्म के बीच इसी क़िस्म के नाजु़क इख़्तिलाफ़ रहे हैं लेकिन कभी उन इख़्तिलाफ़ात की बुनियाद पर ना तो किसी सुलझे हुए दिमाग़ ने ऐतिराज़ जताया और ना किसी को शक में मुब्तला करने की कोशिश की। लेकिन बुरा हो उस फ़ितना परवर तअ़स्सुब का जो ऐसे इल्मी इख़्तिलाफ़ात को भी मख़लूक़े ख़ुदा के बीच ज़हनी इंतिशार का सबब बनाता है।

इसी क़िस्म के तअ़स्सुब का शिकार एक मख़सूस तबक़ा अहले हदीस और देवबंदी मकतबे फ़िक्र का है जो किसी भी मोड़ पर अहले सुन्नत पर हमला करने का मौक़ा हाथ से नहीं जाने देता।
लेकिन जब यह तबक़ा अहले इल्म की ज़द में आता है तो इसके तमाम ऐतिराज़ात की बड़ी आसानी से हवा निकल जाती है। इस ऐतिराज़ के गु़ब्बारे की भी इससे ज़्यादा हक़ीक़त नहीं, जिसकी तफ़सील कुछ यूँ हैः

अ़ाला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान अ़लैहिर्रहमा ने अपने इस रिसाले में हुज़ूर नबी ए करीम सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम की पैदाइश के तअ़ल्लुक़ से कुल सात तारीख़ें जमा की हैंः दो, आठ, दस, बारह, सतरह, अठारह और बाईस। लेकिन इन सातों तारीख़ों को नक़ल करने के बाद आपने यह लिखा है कि इन सात में से सबसे ज़्यादा मोअ़तबर और सबसे ज़्यादा मशहूर 12 तारीख़ है क्योंकि नबी ए करीम सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम के शहर , शहरे मक्का मोअ़ज़्ज़मा के रहने वाले हमेशा से इसी तारीख़ को नबी करीम सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम की पाक पैदाइश गाह की ज़ियारत करते रहे हैं और ख़ास बारह तारीख़ को ही मीलाद मनाते रहे हैं। (ख़ुलासाः नुत्क़ुल हिलाल)

इस तफ़सील के बाद आपने 12 तारीख़ की पैदाइश पर बहुत से हवाले पेश किए,हैं और आखि़र में अपने इल्मी मिज़ाज के मुताबिक़ इंसाफ़ व दयानत के साथ लिखाः

अगरचे ज़्यादातर मुहद्दिसीन और मोअर्रिख़ीन का यह मानना है कि विलादत 8 तारीख़ को हुई, इल्मे ज़ीजात के जानने वालों का भी इसी पर इजमा है लेकिन सहीह इल्म अल्लाह तअ़ाला के पास है। (ख़ुलासाः नुत्क़ुल हिलाल)

इस फ़सादी तबक़े ने इसी आखि़री हिस्से को लिया और फ़साद मचाना शुरू कर दिया लेकिन ज़रा इंसाफ़ से बताऐं! यह किस क़द्र बे-ईमानी की बात है कि इस फ़सादी तबक़े ने जिस तरह ऊपर वाले हिस्से को नक्शे से ग़ाइब किया, उसी तरह इस हिस्से के तुरंत बाद वाले हिस्से को भी ऐसा ग़ाइब कर दिया जैसे किताब यहीं पर ख़त्म हो चुकी हो और आगे कुछ लिखा ही ना हो, जबकि इमाम अहमद रज़ा ख़ान अ़लैहिर्रहमा ने जिस तरह इस ख़ास हिस्से से पहले बारह को तर्जीह दी, उसी तरह आठ तारीख़ की बात लिखने के बाद फिर दो-दो चार की तरह बारह के राजेह होने पर वज़ाहत की और साफ़-साफ़ लिखाः

इसमें कोई शक नहीं कि उम्मत जिस काम को क़ुबूल करके अपना लेती है, इस्लाम में उसका बड़ा मक़ाम होता है। हज़रत अ़ाइशा सिद्दीक़ा रज़ियल्लाहु तअ़ाला अ़न्हा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तअ़ाला अ़लैहि वसल्लम फ़रमाते हैंः

ईदुल फ़ित्र उस दिन है जिस दिन लोग ईद करें और बक़रईद उस दिन है, जिस दिन लोग ईद समझें। (तिर्मिज़ी, रोज़ों का बयान)

इसी मफ़हूम की एक और हदीस नक़ल करने के बाद इमामे अहले सुन्नत अ़लैहिर्रहमा फ़रमाते हैंः

यानी मुसलमानों की ईदुल फ़ित्र, बक़रईद और अ़रफ़ा वग़ैरह के दिन वो दिन होंगे जिन दिनों को तमाम मुसलमान मान लें, अगरचे वो हक़ीक़त के मुताबिक़ ना भी हों, वैसे ही जैसे क़िबले के सिलसिले में शक पैदा होने की सूरत में यह होता है कि जिस तरफ़ दिल जम जाए, क़िबला मान लिया जाता है। इस लिए ईद मीलादुन्नबी जो बड़ी ईद है, वह भी तमाम मुसलमानों के कहने और करने के मुताबिक़ ही बेहतर है। (नुत्क़ुल हिलाल)

यानी इमाम अहले सुन्नत अ़लैहिर्रहमा ने पूरी वज़ाहत के साथ बारह तारीख़ को पूरी उम्मत का अ़मल क़रार दिया और इस पर हवाले भी नक़ल किए जबकि वैसे भी यह कोई फ़र्ज़ या वाजिब की बात नहीं कि इसमें इख़्तिलाफ़ किया जाए या एक ही तारीख़ या वक़्त पर इसरार किया जाए।

अब अगर यह तबक़ा वाकई फ़साद मचाना नहीं चाहता और इसकी निय्यत में सच-मुच कोई फ़ुतूर नहीं बल्कि इंसाफ़ के साथ आठ तारीख़ को तारीख़े पैदाइश मानता है तो इस तबक़े से हमारा मुतालबा यह है कि यह आठ तारीख़ को ही जश्ने मीलाद मनाए और उम्मत के जिस तबक़े के नज़दीक बारह तारीख़, तारीख़े पैदाइश है, वह बारह को मनाता है तो उसे ना रोके ताकि यह साबित हो, यह इल्म पसंद तबक़ा है, फ़सादी नहीं, लेकिन शायद ऐसा ना हो पाए क्योंकि अहले इल्म ख़ूब जानते हैं कि यह तबक़ा तारीख़ का वह फ़सादी गिरोह है, जिसे किसी पहलू चैन नहीं और ना यह मुसलमानों को चैन से रहने देना चाहता है।

यह वही गिरोह है जो क़ुर्बानी में यह साबित करने की कोशिश करता है कि क़ुर्बानी 4 दिन होनी चाहिए जबकि पूरी दुनिया का मुसलमान हमेशा से 3 दिन क़ुर्बानी करता और समझता रहा है।

शबे क़द्र और शबे बराअत में जब मुसलमान नफ़्ल नमाज़ें पढ़ते हैं, यह तबक़ा उन नफ़्लों को बिदअ़त साबित करने पर अपना पूरा ज़ोर लगा देता है, जबिक कौन नहीं जानता कि नफ़्ल नमाज़ें, चाहे किसी बहाने पढ़ी जाऐं, बहरहाल अच्छा काम और अल्लाह तअ़ाला की इबादत है।

कौन नहीं जानता कि अज़ान, ज़िक्रे इलाही है, लेकिन जब क़ब्र पर अज़ान कही जाती है तो यह तबक़ा उसे भी ना-जाइज़ ठहराने पर तुल जाता है। यानी यूँ कहा जा सकता है कि यहूदियों के ख़्वाबों को पूरा करने के लिए इस तबक़े का अव्वल व आखि़र मिशन मुसलमानों को सिर्फ़ कंफ्यूज करना है और बस, वरना ना इसे मज़हब से मतलब है और ना मुसलमानों की ख़ैर-ख़्वाही से तअ़ल्लुक़।

अगर इस सच्चाई को ज़मीनी तौर पर जानना हो तो आप इस तबक़े से आठ तारीख़ को तारीख़े पैदाइश मान कर मीलाद मनाने का मुतालबा करें और देखें फिर कैसे रंग बदलता है।

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