kejriwal modi

दिल्ली का मुसलमान हर चुनाव में कांग्रेस को एकमुश्त वोट देता था लेकिन बीते विधानसभा चुनाव में उनका वोट आम आदमी पार्टी को शिफ्ट हो गया। इसके बदले में पार्टी ने मुसलमानों के सवाल पर शर्मनाक चुप्पी साधकर अपनी घटिया राजनीति उजागर कर दी है। इसे चांद बाग़ प्रकरण से समझिए।

पार्टी का कोई विधायक या मंत्री चांद बाग़ का मुद्दा इसलिए नहीं उठा रहा है क्योंकि उनपर ‘आतंकियों’ के पक्ष में बोलने का ठप्पा लग सकता है। उन्हें डर है कि कहीं मुसलमानों के लिए न्याय की आवाज़ उठाने पर पार्टी की राष्ट्रवादी छवि ख़तरे में ना पड़ जाए।

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मुसीबत की इस घड़ी में चांद बाग़ के मुसलमान सोच रहे होंगे कि क्या सोचकर इस पार्टी को वोट दिया था। कोई दरवाज़े पर झांकने तक नहीं आया। एक शब्द नहीं बोला इस पार्टी का कोई। अपने न्याय के लिए मुसलमानों को खुद लड़ना पड़ रहा है।

गृह मंत्रालय भी स्पेशल सेल की कार्रवाई पर सवाल उठा चुका है, फिर भी आम आदमी पार्टी इतनी डिफेंसिव क्यों है? क्या मुसलमान उसके अजेंडा में नहीं हैं? उनका करियर, जीना-मरना इस पार्टी के लिए कोई मुद्दा नहीं है?

रोहित वेमुला के लिए केजरीवाल हैदराबाद गए थे लेकिन मुसलमानों के लिए अपने दफ्तर से 20 किलोमीटर तक नहीं खिसके। क्यों? क्योंकि वो मुसलमान हैं?

कपिल मिश्रा, कुमार विश्वास समेत पार्टी के तमाम नेताओं के बयान और लपकने वाले मुद्दों पर ग़ौर कीजिए, ज़्यादातर में राष्ट्रवाद की बदबू आती है। वो राष्ट्रवाद जो मुसलमानों से घृणा की ज़मीन तैयार करता है, आम आदमी पार्टी उसमे जीतने के लिए बीजेपी से कॉम्पटीशन कर रही है।

इनकी पार्टी के ओखला से विधायक अमानतुल्लाह ख़ान हैं। वो बेशक गए थे लेकिन किस हैसियत से गए थे? मुसलमान होने के नाते गए तो अलग मामला है। ऐसे बहुत सारे मुसलमान जा रहे हैं लेकिन पार्टी विधायक के नाते गए तो अमानत को क्यों जाना पड़ा? चांद बाग़ से लगने वाली तमाम विधानसभाओं के विधायक क्या कर रहे हैं?

मुझे तो लगता है कि जैसे सभी पार्टियों ने अपने-अपने दल में एक मुस्लिम पोस्टर ब्वाय खड़ा कर लिया है, केजरीवाल भी अमानत के बहाने वही कर रहे हैं। फिर दूसरी पार्टियों से अलग कैसे हुए भाई?

मोहम्मद अनस लेखक जाने माने पत्रकार है
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