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जिन पत्रकारों ने साथ काम किया है वो जानते हैं कि एक समय के बाद कैलाश सत्यार्थी के बचपन बचाओ आंदोलन के पुलिस के साथ छापों और कार्यक्रमों में कैमरा भेजना बंद कर दिया था. नब्बे और दो हज़ार के दशक के शुरुआती दिनों में अक्सर मीडिया और पुलिस दल लेकर उन फैक्ट्रियों में रेड डालते थे जहां बाल मज़दूर काम करते थे. उद्देश्य बाल मजदूरों की मुक्ति और पुनर्वास कम और दूसरे ज्यादा थे.

हार्किन अमेंडमेंट की वजह से कैलाश सत्यार्थी पर लगाई थी रोक:

पश्चिम के देशों में भारत के बने कालीन, कांच और पीतल के हस्तशिल्प का अच्छा खासा बाज़ार था जिसकी बराबरी वहां का स्थानीय उद्योग नहीं कर पाता था. इसी तरह बांगलादेश का रेडीमेड गारमेंट उद्योग भी अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में छाया हुआ था. इन दो वजहों से पश्चिम के देशों का स्थानीय उद्योग तो प्रभावित था ही और साथ ही वहां बेरोजगारी भी बढ़ रही थी.

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फिर अमेरिकी संसद में आया हार्किन अमेंडमेंट जिसने नब्बे के दशक की शुरुआत में बाल मजदूर निरोधक कानून को जन्म दिया. इस कानून के बनने के बाद उन उत्पादों के आयात पर रोक लग गई जिसे बनाने में बाल मजदूर लगे हों. यूरोप के देशों ने भी अपने उद्योग और रोजगार बचाने के लिये ऐसे ही कानून बनाये. बांगलादेश के रेडीमेड गारमेंट उद्योग की रीढ़ एक झटके में टूट गई. भारत में भदोही कालीन उद्योग, फिरोज़ाबाद के काँच और मुरादाबाद के पीतल हस्तशिल्प उद्योग का भी वही हाल हुआ.

यही वो दौर था जब कैलाश सत्यार्थी तेजी से उभरे, उनके बचपन बचाओ आन्दोलन को बड़ी बड़ी इमदाद मिलने लगी. दरअसल वो रेड डलवा कर भारत के हस्तशिल्प उद्योग को पश्चिम के देशों में ब्लैकलिस्ट करा रहे थे.

भारत में भी बाल मजदूर प्रतिबंधित है लेकिन ये बहस का विषय है. बाल मजदूर कानून या रेड डाल कर नहीं खत्म होगा बल्कि बाल मजदूरों का पुनर्वास और सोशल सिक्यूरिटी से बंद होगा. कानून के बावजूद कई जगह बाल मजदूर को काम करते देखना आम बात है.

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