सेक्युलरिज़्म के अलमबरदार अपूर्वानंद ने द वायर में एक लेख लिखा है। जिसका शीर्षक है। के “जामिया मिल्लिया इस्लामिया एक विश्वविद्यालय है। इस्लाम के प्रचार का केंद्र नहीं है।”

मैं अपूर्वानंद और द वायर से पूछना चाहूंगा के वो जेएनयू के बारे में कब ऐसा लेख लिखने वाले हैं। “जेएनयू एक विश्वविद्यालय है। कम्युनिज्म के प्रचार का केन्द्र नहीं है।”

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जेएनयू में पूंजीवाद के विरोध के नाम पर वहां के छात्र संघ किसी प्राइवेट टेलीकॉम ऑपरेटर को टावर लगाने के लिए ज़मीन नहीं देने देते थे,पूंजीवाद के विरोध के नाम पर कैफ़े कॉफी डे और मैक्डोनाल्ड जैसे किसी फॉरेन ब्रांड का आउटलेट नहीं खुल सकता था, इस तरह के कई मामले हैं।

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Students gather in front of JNU Administration block on Friday. Express photo by Oinam Anand. 19 February 2016

कभी अपूर्वानंद ने ये नहीं लिखा के जेएनयू वामपंथ का प्रचार केंद्र नहीं है। बल्कि एक विश्वविद्यालय है। दिन-रात पूंजीवाद का विरोध करने वाले लोग फैशन शो जैसे एक पूंजीवादी समारोह के आयोजन के समर्थन में सिर्फ इसलिए खड़े हैं। क्योंकि इसका विरोध करने वाले मुसलमान हैं। लिबरलों अपनी हिप्पोक्रेसी से बाहर निकलो

लिबरलों और सेकुलरो की ये हिप्पोक्रेसी आख़िर कब तक चलेगी ? अपनी दही को खट्टा कब कहेंगे ? जामिया और अलीगढ की मुस्लिम शिनाख्त इन लिबरलों के निशाने पर है। ये अपनी लिबरल हिप्पोक्रेसी के ज़रिए इस्लाम और मुसलमानो की शिनाख्त को हर पब्लिक स्फीयर से खुरच देना चाहते हैं।

द वायर को तो मैं हमेशा से इस्लामोफोबिक मानता रहा हूँ अब अपूर्वानंद का इस्लामोफोबिक चेहरा भी सामने आ चुका है।

मुहम्मद इकबाल की कलम से निजी विचार…

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