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सरकार हमारे रेलवे स्टेशनों को एअरपोर्ट के तर्ज पर विकसित करना चाहती है. हाल ही में वित्त मंत्रालय ने रेलवे स्टेशनों को इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा देने की स्वीकृति दी है जिसके तहत रेलवे स्टेशनों का व्यावसायिक व रिहायशी उपयोग भी किया जा सकेगा. इस व्यवस्था के तहत रेल मंत्रालय अपने आप को यातायात व्यवस्था यानी ट्रेन चलाने तक ही सीमित कर लेगा जबकि एयरपोर्ट की तर्ज पर रेलवे स्टेशनों पर भी निजी कम्पनियां यात्री सुविधायें उपलब्ध करायेंगी. इसे इंटिग्रेटेड मैनेजमेंट सिस्टम कहा जा रहा है जिसमें रेल संचालन का जिम्मा तो रेलवे के पास रहेगा, लेकिन ट्रेन टिकट, प्लेटफार्म टिकट जारी करने स्टेशन पर खाने-पीने की व्यवस्था, डिस्प्ले बोर्ड जैसी अन्य यात्री सुविधायें प्राइवेट कंपनियों के जिम्मे होगा. इसके लिये बतौर पायलट प्रोजेक्ट पांच स्टेशनों का चुनाव भी कर लिया गया है जिसमें आनंद विहार, चंडीगढ़, पुणे, सिकंदराबाद, बंगलूरू के स्टेशन शामिल हैं.

लेकिन हबीबगंज का हालिया अनुभव बताता है कि इससे एअरपोर्ट की तरह हमारे रेलवे स्टेशन भी खासे महंगे और आम आदमी की पहुँच से दूर हो जायेंगीं. कल्पना कीजिये कि आप ने अपनी मोटरसाइकिल रेलवे स्टेशन पर पार्किंग की है और जब वापस आते हैं तो दो दिनों के पार्किंग चार्ज के रूप में आपको 60 रू. की जगह 480 रूपये का बिल थमा दिया जाता है, पिछले दिनों भोपाल स्थित हबीबगंज रेलवे स्टेशन पर यात्रियों ने अपने आपको इसी स्थिति में पाया जिसके बाद पाँव के नीचे से जमीन खिसकनी ही थी. दरअसल बंसल पाथवे हबीबगंज प्राइवेट लिमिटेड ने हबीबगंज स्टेशन पर पार्किंग शुल्क कई गुना बढ़ा दिया था जिसके बाद अचानक इस तरह से रेट बढ़ने से काफी विवाद हुआ और नागरिकों की तरफ से इसका कड़ा विरोध किया गया. इस पूरे मामले में देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक उपक्रम भारतीय रेलवे बहुत बेचारा नजर आया, उसके अधिकारी बस यही कह पा रहे थे कि प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए मिली ताकतों का दुरूपयोग कर रहा है. पहले तो रेलवे के अधिकारियों के हस्तक्षेप के बावजूद कंपनी ने पार्किंग चार्ज घटाने से साफ इंकार कर दिया हालांकि बाद में इसमें थोड़ी कमी कर दी गयी, लेकिन पार्किंग फीस अभी भी पहले के मुकाबले 10 गुना ज्यादा है. ऊपर से कंपनी के अधिकारियों की तरह से यह साफ़ कर दिया गया है कि बढ़े हुये पार्किंग शुल्क में जितनी कमी हो सकती थी कर दी गयी है अब और कोई बदलाव नहीं किया जाएगा.

दरअसल 1 फरवरी से कंपनी ने जिस तरह से पार्किंग शुल्क बढ़ाया था वो आम आदमी के लिये रूह कंपा देने वाला है, बढ़ोतरी के तहत दुपहिया वाहनों के लिए मासिक पास शुल्क 5,000 रुपए महीना और चार पहिया गाड़ियों के लिये 16,000 रुपए कर दिया गया था.  इसी तरह से दो घंटे के लिए दो पहिया वाहन खड़ा करने पर 5 रूपये की जगह 15 रुपए व चार पहिया वाहन के 10 की जगह 40 रूपये कर दिया गया था. यही नही हर दो घंटे बाद चार्ज बढ़ता जाएगा और इस तरह से 24 घंटे के लिए दोपहिया वाहन का चार्ज 235 रूपये और चार पहिया का चार्ज 590 रुपए कर दिया गया था. इसी के साथ ही पार्किंग में यह सूचना भी लगा दी गयी कि पार्किंग में खड़ी वाहनों की सुरक्षा के लिये कंपनी जिम्मेदार नहीं है और पार्किंग के दौरान गाड़ी में कोई डेंट आने पर, कोई सामान चोरी होने पर कंपनी जवाबदार नही होगी.

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विरोध के बाद इसमें कमी की गयी है लेकिन अभी भी रेट सर चकरा देने वाला है, अब दुपहिया वाहनों के लिए मासिक पास शुल्क 4,000 रुपए महीना और चार पहिया गाड़ियों के लिये 12,000 महिना रुपए कर दिया गया है. इसी तरह से हबीबगंज स्टेशन पर अब दुपहिया वाहन के लिये एक दिन का पार्किंग चार्ज 175 रूपये और चार पहिया वाहनों के लिये 460 रूपये चुकाने होंगें.

हबीबगंज पहले से ही आईएसओ प्रमाणित रेलवे स्टेशन है, लेकिन पिछले साल मार्च में सरकार द्वारा इसके पुनर्विकास व आधुनिकीकरण का फैसला किया गया. रेलवे स्टेशन को आधुनिक बनाने के लिए बंसल ग्रुप को ठेका दिया गया और इस तरह से भारतीय रेल स्टेशन विकास निगम लिमिटेड (आईआरएसडीसी) और बंसल ग्रुप के बीच समझौते पर हस्ताक्षर के बाद से यह देश का पहला प्राइवेट रेलवे स्टेशन बन गया है. समझौते के तहत रेलवे ने अपने आपको केवल गाड़ियों के संचालन तक ही सीमित कर लिया है जबकि कंपनी स्टेशन का संचालन करेगी जिसमें स्टेशन पर पॉर्किंग, खानपान आदि का एकाअधिकार तो कंपनी के पास रहेगा ही इसके अलावा कंपनी स्टेशन पर एस्केलेटर, शॉपिंग के लिए दुकानें, फूड कोर्ट और अन्य सुविधाओं का विस्तार भी करेगी.

इससे पहले भी बंसल कंपनी का एक और कारनामा सामने आ चूका है, पिछले साल मई में भोपाल से प्रकाशित समाचारपत्रों में एक खबर प्रकाशित हुई थी जिसके अनुसार “बंसल पाथवे हबीबगंज लिमिटेड” द्वारा हबीबगंज स्टेशन परिसर में कमर्शियल कॉम्प्लेक्स के बेसमेंट निर्माण के लिए मंजूरी से अधिक खुदाई की जा रही थी. इस मामले में जब शिकायत पर खनिज विभाग द्वारा जांच किया गया तो पाया गया कि कंपनी के पास 2 हजार घनफीट के खुदाई की मंजूरी की तुलना में 10 गुना अधिक खुदाई की गयी थी, यही नहीं इस खुदाई से निकले खनिज को बाद में रेलवे के निर्माण कार्य में इस्तेमाल करना था लेकिन इसे बाजार में बेचा जा रहा है.

पिछले डेढ़ सदी के दौरान रेलवे ने भारतीयों के मोबिलिटी में क्रांतिकारी रूप से बदलाव लाने का काम किया है. एक तरह से यह हमारे राष्ट्रीय अखंडता की सबसे बड़ी प्रतीक है. रेलवे ने इस महादेश के विभिन्न प्रान्तों, लोगों, स्थानों को जोड़ने का काम किया है. रेल आम भारतीयों की सवारी है और साथ है सबसे बड़ा सावर्जनिक उपक्रम भी, यह अन्य परिवहन साधनों की तुलना में किफायती भी है. आज करीब ढाई करोड़ लोग प्रतिदिन ट्रेनों से यात्रा करते हैं जो की रेलवे के बिना संभव नहीं है. यह पर्यावरण बचाती है और साथ ही करीब 14 लाख लोगों को नौकरी देने का काम करती है. रेल हमारे लिये यातायात का मुख्य साधन तो है ही साथ इसका जुड़ाव हमारे जज़्बातों से भी रहा है. पीढ़ियों से यह हमारे जीवन का एक जरूरी हिस्सा बन चुकी है. हम सब की रेलवे से जुड़ी कोई ना कोई कहानी जरूर है लेकिन हबीबगंज के शुरूआती अनुभव बताते हैं कि रेलवे के निजीकरण के कितने व्यापक प्रभाव पड़ने वाले हैं. इसे देख सुन कर छत्तीसगढ़ के शिवनाथ नदी की कहानी याद आ गयी, 1998 में इसका निजीकरण कर दिया गया जिसके बाद नदी पर सदियों से चला आ रहा सामुदायिक अधिकार भी खत्म हो गया था. हबीबगंज जंक्शन के साथ भी यही हुआ है, स्टेशन का संचालन एक निजी कंपनी के हाथ में चले जाने के बाद इस पर से भी सामुदायिक अधिकार खत्म हो गया है.

लेकिन यह कहानी महज हबीबगंज तक सीमित नहीं रहने वाली है, गौरतलब है कि सरकारें बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से धीरे-धीरे और टुकड़ों में रेलवे का निजीकरण करती जा रही हैं जिसके तहत शुरूआती दौर में खान-पान सेवाओं सहित साफ़ सफाई का निजीकरण काफी हद तक किया जा चूका है. अब रेलवे स्टेशनों के निजीकरण की दिशा में बहुत ही सधे तरीके से काम किया जा रहा है. सत्ताग्रहण के तुरंत बाद मोदी सरकार ने एक मुश्त 14 प्रतिशत रेल किराया बढ़ा दिया था और साथ ही “भारतीय रेल की वित्तीय हालत एवं कामकाज को सुधारने” के लिए सुझाव देने के लिये बिबेक देबराय समिति का गठन भी किया गया था जिसके बाद कमेटी ने रेलवे को ‘प्रतियोगिता की एक ख़ुराक’ की वकालत करते हुए रेलवे के कॉर्पोरेटाइजेशन और रेल मंत्रालय को केवल नीति बनाने तक सीमित रखने की सिफारिश की थी लेकिन रेल यूनियनों के कड़े विरोध के बाद मोदी सरकार इस दिशा में सीधे तौर पर आगे नहीं बढ़ सकी और सरकार को यह घोषणा करनी पड़ी कि “हम स्वामित्व नहीं बदलना चाहते”.

इसके बाद 2017 में मोदी सरकार द्वारा रेल डेवलपमेंट अथॉरिटी(आरडीए) का गठन किया गया जो कि एक स्वायत्त संस्था है और रेल मंत्रालय के लिए काम करती है. आरडीए को मुख्य रूप से तीन कामों की जिम्मेदारी सौंपी गयी है, रेलवे का यात्री किराया और मालभाड़ा तय करना, निवेशको के लिए आदर्श माहौल तैयार करना और रेलवे की तरफ से मिलने वाली बाकी सुविधाओं की गुणवत्ता में सुधार करना. मोदी सरकार के इस फैसले को रेलवे के किश्तों में निजीकरण के दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

दरअसल मोदी सरकार भारतीय रेलवे के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा निजी हस्तक्षेप करने के प्रति प्रतिबद्ध नजर आ रही है, मौजूदा बजट में 600 स्टेशनों को विकसित करने की घोषणा की गई है.

देश का यह पहला तथाकथित मॉडल स्टेशन के शुरूआती अनुभव आम रेल यात्रियों के लिए डराने वाले हैं. हबीबगंज रेलवे स्टेशन को वर्ल्ड क्लास बनने में अभी समय है. काम भी शुरुआती दौर में ही है लेकिन कंपनी द्वारा पार्किंग रेट को कई गुना बढ़ा दिया जाना ही जाहिर करता है कि उनका पूरा फोकस मुनाफे पर है उन्हें यात्रियों की सुविधा या क्षमताओं से कोई सरोकार नहीं है.

जावेद अनीस

निजीकरण के पीछे सबसे बड़ा तर्क यह दिया जाता है कि  इससे निजी लाभ और प्रतिस्पर्धा की भावना बढ़ेगी और फिर “ग्राहकों” को सुविधाएं बेहतर मिलेंगी लेकिन हबीबगंज का अनुभव बताता है कि रेलवे का किसी भी तरह का निजीकरण करोड़ों यात्रियों के लिए घातक साबित हो सकता है. आम आदमी के लिये रेलवे जैसा सुलभ साधन उनके हाथ से बाहर निकल जाएगा. हबीबगंज जंक्शन के प्राइवेट लिमिटेड बनने का फायदा सिर्फ एक कंपनी को होगा लेकिन इसका खामियाजा लाखों यात्रियों को उठाना पड़ेगा. इसे निजी क्षेत्र को बहुत ही सस्ते दामों पर भारतीय रेल का बुनियादी ढ़ांचा तो मिल जाएगा लेकिन आम यात्री से उनकी सबसे सुलभ और किफायती सवारी छिन सकती है.