इस्लामोफ़ोबिया अर्थात मुसलमानों के ख़िलाफ़ और उनके प्रति तर्कहीन भय या घृणा का पूर्वाग्रह है। परन्तु बात इतनी सीधी भी नही है इसे हम दो हिस्सों में बाँट सकते है :

१) Behaviour अर्थात व्यवहार
२) Attitude अर्थात रवैया या मनोदृष्टि

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इस्लामोफ़ोबिया व्यवहार में जब होता है तो स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है । यह अधिकांश उन लोगों के व्यवहार में होता है जो किसी रूप से इसका सामना या पीड़ित होते है । परन्तु इस्लामोफ़ोबिया जब एटीटूड में होता है तब वह दिखाई नही पड़ता है । एटीडूड में समाहित इस्लामोफ़ोबिया जब व्यवहार में परिलक्षित होता है तब वो बेहद घातक रूप ले लेता है ।

दुनिया में ज़्यादातर देशों में और विशेषकर पश्चिमी देशों में इस्लामोफ़ोबिया मनोदृष्टि में ही पाया जाता है और अत्याधिक मीडिया के नकारात्मक प्रचार ने हालात पूरी दुनिया में ख़राब किए है । यह स्थिति सकारात्मक बातों से ही बदली जा सकती है या यू कहे बदल रही है, न्यूज़ीलैंड की जनता का हादसे के बाद का व्यवहार ताजा उदाहरण है ।

एक ब्रिटिश सैनिक क्रिश हर्बर्ट की एक पोस्ट इन दिनों चर्चा में है । वे इराक़ युद्ध में बुरी तरह ज़ख़्मी हुए थे। वह अपनी एक टाँग गवाँ दिए थे । उनकी पोस्ट का संक्षेप में हिन्दी अनुवाद निम्न है :

चिढ़ होती है मुझे यह देखकर कि लोग मुझसे Racism की उम्मीद रखते है क्योंकि मुझे बम से उड़ा दिया गया था । यह उनके लिए :

हाँ एक मुसलमान लड़के ने मुझे बम से उड़ा दिया था और मेरी टाँग कट गई ।
पर उस दिन एक और मुस्लिम व्यक्ति ने अपना हाथ गँवाया था मेरे साथ और वह ब्रिटिश सैनिक वर्दी में था ।
उस हेलीकाप्टर में एक मुस्लिम मेडिकल स्टाफ़ था जो मुझे युद्ध भूमि से उठा कर ले गया ।
एक मुस्लिम सर्जन ने आपरेशन कर मेरी जान बचाई थी और मेरी देखभाल करने वाली टीम में एक मुस्लिम नर्स थी , जब मैं वापस इंग्लैंड पहुँचा ।
एक मुस्लिम टैक्सी ड्राइवर ने मुझे व मेरे पिता को पहली बार फ़्री में लिफ़्ट दी जब मैं अपने पिता के साथ स्वस्थ्य होने पर पहली बार बाहर निकला था ।
एक मुस्लिम डाक्टर ने मेरे पिता की मदद की थी जब वे मेरी दवाइयों और उसके प्रभावों से जूझ रहे थे ।

इसके विपरीत :

एक श्वेत व्यक्ति मेरे सामने मेरी प्रेमिका से लड़ा था ।
एक श्वेत व्यक्ति ने मेरी व्हीलचेयर को धक्का मारा था ताकि वह पहले लिफ़्ट पर चढ़ सके ।
एक श्वेत व्यक्ति मेरे पिता से लड़ा था जब वे विकलांगों के लिए बनी पार्किंग में मेरी कार पार्क कर रहे थे ।

कुछ सिरफिरों की वजह से यदि आप एक क़ौम के सभी स्त्री व पुरूषों से नफ़रत करते है तो करिए परन्तु अपने विचार मुझ पर मत थोपिए , यह सोच कर कि मैं एक आसान शिकार हूँ क्योंकि उस दिन एक सिरफिरे ने सोचा था कि वो मेरा अाखिरी दिन है ।

पूरी मुस्लिम क़ौम को कुछ जिहादी समूहों की वजह से क़सूरवार मानना वैसा ही है जैसे सभी ईसाइयों को Westboro baptist church के क्रियाकलापों के लिए दोषी मानना । अपनी जिदंगी को अपनी पकड़ में रखिए , परिवारवालों के गले लगिए और अपने काम पर लग जाइए।

सरताज खान की कलम से…

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