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प्रशांत टंडन

रवीश का हावर्ड में दिया हुआ भाषण सुना. उनसे सहमत हूँ कि एक डरा हुआ पत्रकार एक मरा हुआ नागरिक पैदा करता है. यही बात वो पहले भी कह चुके हैं. अंधकारमय समय में बेशक रवीश सराहनीय काम कर रहे हैं – हिम्मत है उनमें. इस दौर में एक दो नहीं कई रवीश की ज़रूरत है.

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लेकिन इस दौर के सवाल भी बहुत जटिल हैं और हर मर्ज की दवा रवीश के पास होनी चाहिए ये अपेक्षा भी ठीक नहीं है. रवीश ने कहा की पत्रकार डरा हुआ है. पर किससे डर गया है पत्रकार? मोदी से? क्या वो वाकई डर भी गया है. क्या संपादकों के ऊपर पहले मालिकों का दबाव नहीं था या अब बढ़ गया है.

मेरा भी मानना है कि पत्रकार डर गया है. पर वो मोदी से नहीं डरा है और न ही अपने मालिक या संपादक से. डर कहीं और है जिसकी बात नहीं हो रही है.

बचपन में सर्कस का एक खेल देखा था. एक घूमते हुये चक्के पर लड़की लटकी हुई है और एक आदमी आँखों में पट्टी बांध कर चक्के की तरफ एक के बाद एक चाकू फेंक रहा है. चाकू लकड़ी के चक्के में इधर उधर गड़ जाते हैं और लड़की जिस्म को एक भी नहीं छूता है. गजब का हुनर और अभ्यास चाहिये इस खेल में. चाकू भी चले, सबकी साँसे भी अटकी रहें और लड़की को खँरोच भी न आये. बिलकुल अलग तरह की निशानेबाजी है ये.

कुछ ऐसा ही हुनर देखने को मिल रहा है आरएसएस\बीजेपी और मोदी पर हमला करने वाले बहुत से लोगो में. हमले दनादन हो रहे हैं पर चोट किसी को नहीं लग रही है. सारे चाकू इधर उधर लग रहे हैं.

मुद्दे पर आते हैं – डर अकेले मीडिया का नहीं है – ये डर अधिकांश उस समाज का है जो सभी इदारों पर सैकड़ो साल से चौकड़ी मारे बैठा है – मीडिया समेत. इसी समाज ने (मीडिया भी) नरेंद्र मोदी को 2002 के दंगो के बाद ज़रा भी नहीं बख्शा. प्रधानमंत्री तो दूर उन्हे गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुये भी नाक में दम कर के रखा. फिर इन कुछ एक सालों में ऐसा क्या हो गया कि वही मीडिया मोदी का भक्त हो गया.

इसका जवाब आपको अपने आस पास नज़र दौड़ाने से मिल जायेगा. SC\ST आरक्षण के बाद चौथी और मंडल के बाद दूसरी पीढ़ी तेज़ी से वहाँ पहुचने लगी जहां पहले कुछ ही लोगों का एकाधिकार था. लाल झंडे तेज़ी से नीले होते गये, ग्रेट चमार के पोस्टर लग गए. मनरेगा जैसी योजनाओं ने गांवों में भी जींस, मोबाइल और मोटरसाइकिल पहुंचा दी. डिजिटल और सोशल मीडिया ने वो दरवाजे खोल दिये जिसे सिर्फ अपनों के लिए ही खोला जाता था. लालू, मुलायम, मायावती को मुकदमो में फसाया गया, नीतीश और पासवान जैसों को लालच में अपनी तरफ किया पर बात बन नही रही है.

अंबेडकर का लिखा आज सबसे ज्यादा पढ़ा जा रहा है. अंबेडकरवादी बुद्धिजीवियों की एक पूरी कतार खड़ी है आज अपने समाज को रास्ता दिखने के लिए. गूगल अगर सावित्री बाई फुले का डूडल लगा रहा है तो ये कोई उसकी इंक्लूसिव पॉलिसी नहीं है – गूगल data और analytics देख कर फैसले करता है.

कुल मिला कर देश एक सामाजिक बादलाव के लिए तैयार हो गया है. फ़ौजे किले के द्वार तक पहुँच गई है. सारी बौखलाहट इसी बात की है. सांप्रदायिकता तो वो लकड़ी का चक्का है जिस पर बाजीगर के चाकू गड़ रहे हैं और लोग तालियाँ बजा रहे हैं.

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