is muslim writer is really support muslims

क्या यह एक सुखद , गौरवमयी परिघटना नहीं है …..
कि मोहम्मद अख़लाक़ नाम के मुसलमान कि नृशंस हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी अवार्ड लौटने वाले अधिकतर लेखक हिन्दू हैं ??
.
और क्या यह एक अनोखी .दुखद , त्रासदीपूर्ण आश्चर्यजनक बात नहीं है कि इनके पुरस्कार-लौटाने का विरोध करने वाले अधिकतर लेखक , साहित्यकर , शायर लोग मुसलमान हैं ! ! !

.
मुनव्वर राना , असगर वजाहत , मंज़र भोपाली जैसे मुस्लिम बुद्धिजीवी जिस तरह अगर-मगर करते हुए इस पुरस्कार लौटने के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं , वह बात इनकी साहित्य और मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता को कटघरे में खड़ा करती है ! ! !
.
आपको याद होगा , मशहूर शायर बशीर बद्र , जिन्होंने यह शेर लिख कर गुजरात को जलाने वालों को कटघरे में खड़ा किया था —
” लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में ,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में .”
उन्ही बशीर बद्र ने अचानक भाजपा की शान में कसीदे पढ़ने शुरू किये थे और अपनी तमाम साहित्य साधना पर पानी फेर कर अपनी छवि को ख़राब कर दिया था ,
.
आज मुनव्वर राना साहब को देख रहा हूँ , जिन्होंने लिखा है —
” अगर दंगाइयों पर तेरा कोई बस नहीं चलता ,
तो सुन ले ऐ हुकुमत , हम तुझे नामर्द कहते हैं ”
.
दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि आज श्री मुनव्वर राना भी उसी राह पर चल पड़े हैं , जिस राह पर चल कर बशीर बद्र बदनाम हुए थे ! ! !

आरिफ दगिया


शादीे करने के इच्छुक है तो अभी फोटो देखकर अपना जीवन साथी चुने (फ्री)- क्लिक करें 

Loading...

कोहराम न्यूज़ की एंड्राइड ऐप इनस्टॉल करें