homo

डॉ मुहम्मद इमरान

समलैंगिकता निसंदेह अपराध नहीं है, लेकिन समलैंगिकता संतति उत्पन्न करने की प्रक्रिया भी नहीं है, अत समलैंगिकता को बढ़ावा भी नहीं दिया जाना चाहिए, मनोचिकित्सकों के अनुसार किसी का समलैंगिक होना वैसा ही है जैसे किसी को काला रंग पसंद है तो किसी को सफेद अत समलैंगिकता को अपराध नहीं माना जाना चाहिए |

पांच जज जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस चंद्रचूढ़, जस्टिस खानविलकर ओर जस्टिस इंदु मल्होत्रा की संविधान पीठ ने डांसर नवतेज जौहर, जर्नलिस्ट सुनील मेहरा, शेफ रितु डालमिया, होटल कारोबारी अमन नाथ ओर केशव सूरी तथा बिज़नस एक्जीक्यूटिव आएशा कपूर  की याचिका पर सर्व सम्मति से फैसला सुनाते हुए कहा कि अब समलैंगिकता अपराध नहीं है, योंन प्राथमिकता, बायोलॉजिकल ओर प्राकृतिक है, इसमें किसी भी तरह का भेदभाव मोलिक अधिकारों का हनन होगा, निजता किसी की भी व्यक्तिगत पसंद होती है | दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने योंन संबंध पर IPC की धारा 377 संविधान के समानता के अधिकार, यानी अनुच्छेद 14 का हनन करती है. हम सभी भारतीयों के लिए शीर्ष अदालत के द्वारा लिया निर्णय सर्वमान्य है | समलैंगिकता को अपराध मानने वाला कानून लॉर्ड मेंकाले ने 1861 में IPC में लागू करवाया था, तब से लेकर आज तक यह कानून भारत में लागू था |

यह ऐसा कानून था जो हमारे देश में जब लगाया गया तब हम इंग्लैंड के उपनिवेश थे, लेकिन इंग्लैंड खुद इस कानून को अपने यहाँ से कभी का हटा चुका है ओर ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा तक खेद जता चुकी है, ओर हमे इसे हटाने में 158 साल का सफर तय करना पड़ा, अखिरकर देर आये दुरुस्त आये, हमने भी LGBTQ को अन्य विकसित देशों की तरह अन्य नागरिकों के समान ही, हर तरह से समान मानने की कानूनी पहल शुरू कर संवैधानिक परिपक्वता को साबित किया है |

Indian Psychiatric Society (IPS) के अनुसार भी ऐसा कोई वैग्यानिक प्रमाण नहीं है जिससे लैंगिक व्यवहार को किसी इलाज से बदला जा सके, ओर यदि ऐसा प्रयास किया भी जाये तो यह उस समलैंगिक के आत्म सम्मान को आहत करने वाला ओर दोषारोपण करने वाला होगा, तो देखा जाये तो धारा 377 व्यर्थ का कानून था जिसे हम ढोते आ रहे थे इसे बहुत पहले हटा देना चाहिए था | लेकिन क्या भारतीय परिपेक्ष्य में समलैंगिकता को निरपराध घोषित करना योंन अराजकता को बड़ाने वाला नहीं होगा इस पर मंथन भी बहुत जरूरी है |

बेशक हमने समलैंगिकता को निरपराध घोषित कर दिया है लेकिन समलैंगिकता आज भी कल की ही तरह संतान उत्पत्ति की प्रक्रिया नहीं बनी है ओर ना ही कभी बन सकती है | ओर भारत जैसे अध्यात्मिक विकसित देश में सेक्स का प्राथमिक उद्देश्य संतान उत्पत्ति माना गया है, आनंद प्राप्त करना तो द्वितीयक  ही है | यह भी सच है कोई सेक्स किस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कर रहा है यह उसकी निजता है, उसमें दखलअंदाजी किसी भी कीमत पर नहीं की जानी चाहिए, लेकिन हमारे समाज शास्त्रियों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि समलैंगिकता का प्रचार ना हो, क्यूँकि जो प्रकृति से ही समलैंगिक है वोह तो ठीक है लेकिन जो प्रकृति से समलैंगिक नहीं है ओर परिस्थिति वश या किसी अभाव में समलैंगिक बन गया है वोह निश्चित ही महिला पुरुष संबंधो पर अधारित सामाजिक ढांचे को छिन्न भिन्न कर देगा, जरा सोचिए यदि समलैंगिकता प्रचलन में आ जाये ओर लड़के गे बनने लग जाये तो फिर लडकियों से शादी कोन करेगा, ओर यदि लड़किया लेस्बियन बनने लग जाये तो लड़कों से शादी कोन करेगा ?? इससे समाज में कुंठा बडे़गी, कई विसंगतिया पैदा हो जायेगी, परिवार टूटने लगेगे, संयुक्त परिवार हमारे भारतीय समाज की रीढ़ है, ओर परिवार महिला पुरुष से मिलकर ही बनता है, जो संतान उत्पत्ति करके परिवार को संपूर्ण बनाते हैं यही वजह है कि पारंपरिक भारतीय समाज समलैंगिक संबंधों को मान्यता नहीं देता है |

अत समाजशास्त्रीयों को इस बात से सावधान रहना होगा कि निरपराध समलैंगिकता समाज में योंन उत्पीड़न, नैतिक क्षय, कुंठा, अवसाद ओर विकार को बढ़ाने वाली ना हो | समलैंगिकता सामाजिक इकाई परिवार के तंत्र पर गलत प्रभाव डालने वाली ना हो |

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