Thursday, August 5, 2021

 

 

 

‘मुस्लिम जज्बातों को भड़काकर जेब गर्म करने वाले शायर यशभारती लिए बैठे है’

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मोहम्मद अनस

बाबरी मस्जिद- राम मंदिर का दौर चल रहा था। देश भर में लाल कृष्ण अडवाणी रथ यात्रा लेकर निकले हुए होते हैं। भय और आतंक का माहौल था। हिंदी भाषी मुसलमानों को लग रहा था कि अब बर्बाद हो जाएंगे या बर्बाद कर देंगे। इसी बीच मौके का फायदा उठाया एक शायर ने। नाम था मंज़र भोपाली।

मंज़र भोपाली उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, जैसे मुस्लिम बाहुल्य राज्यों में मुशायरे पढ़ने जाते। मंज़र, मंच पर खड़े होते। चीख चीख कर मुसलमानों के दिलों में उबाल पैदा कर देते। उस दौर में यूट्यूब नहीं था। मंज़र भोपाली के ऑडियो कैसेट्स लखनऊ, मुरादाबाद, रामपुर के बाज़ारों में ठेलों और खोमचे में बिकने लगे। सरकारी मुशायरों में मंज़र को बुलाया जाता तो वह वहां भी जज़्बाती काव्य पाठ करने लगते। बवाल मचता। आयोजक कहते कि हमें क्या पता कि मंज़र ऐसी शायरी पढ़ने वाले थे। मुशायरों के मंच पर बवाल मचता उधर सुबह के ऊर्दू अख़बार मंज़र को हीरो के तौर पर पेश कर देते। बाबरी विध्वंस की बैसाखी के सहारे अपनी नैय्या पार लगाने वाले मंज़र , बाबरी मुद्दे के कमज़ोर होते ही नेपथ्य में चले गए। अब बहुत मुश्किल से मंज़र भोपाली साहब किसी मुशायरे वगैरह में दिखते हैं। ऐसा नहीं है कि मंज़र के पास सिर्फ जज्बाती शायरी ही थी, उनके पास अदबी खज़ाना भी है लेकिन जो ऊरूज़ और मशहूरियत उन्हें बाबरी के कंधों की वजह से मिली वह फिर दुबारा हासिल नहीं हो सकी।

फिर दौर आया मदरसों के नाम पर मुस्लिम नौजवानों को उठाने का, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने का, जेएनयू के छात्र नजीब के गायब हो जाने का, दादरी के अख़लाक का और जज़्बात भड़काया इमरान प्रतापगढ़ी ने। इमरान प्रतापगढ़ी, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी के उन मुस्लिम नेताओं के बुलावे पर जाने लगे जिन्हें चुनाव लड़ना होता था। जब पहली बार मुंब्रा के मुशायरे में इमरान ने ‘मत जोड़ो आतंकवाद से नाम मदरसों का’ पढ़ा तो वह दौर था बेहुनाह मुस्लिम युवाओं को उठाए जाने का। इमरान को मुस्लिम नेता मंच देते और इमरान वहां पर इसका पाठ करते लेकिन न तो इमरान ने कभी मंच से उन नेताओं से यह अपील कि की आप उन बेबस परिवारों की मदद करें जिनके बच्चे बंद है। न तो इमरान ने कभी सत्ता पक्ष से कहा कि आप अपने किए वादे पूरा कीजिए। सपा का मेनफेस्टो कहता था कि हम सरकार में आएंगे तो बेगुनाहों को छोड़ेंगे लेकिन बीते पांच साल तक इमरान प्रतापगढ़ी समाजवादी पार्टी के मुखिया के लेकर मुख्यमंत्री के सामने काव्य पाठ कर चुके परंतु उन्होंने कभी उनको अपना किया वादा याद नहीं कराया। जहां ज़रूरत थी इंक़लाब की , सवालों के बौछार की , वहां इमरान ने मेरे प्यारे टीपू , हिंदुस्तान के सरताज़ कहते हुए पंक्तियां पढ़ी।

बात यहीं खत्म नहीं होती है। जेएनयू के गायब छात्र नजीब को लेकर पढ़ी गई उनकी नज़्म बहुत पापुरल हुई। जिस भी मुस्लिम नेता द्वारा हाल फिलहाल में उनको बुलाया जाता वे वहां जा कर यह नज़्म पढ़ते और आवाम की आँखों से आँसू निकाल देते। मज़ाल है कि इमरान प्रतापगढ़ी समाज के उन खेवनहारों को ज़रा सा कुछ बोल देते जिनके बुलावे पर ने जनता के सीने में उबाल पैदा कर देते हैं। जिस समाज का नेतृत्वकर्ता मंच पर बैठा खद्दरधारी हो इमरान उस खद्दरधारी से यह अपील नहीं करते कि आप आगे बढ़िए, नजीब के लिए अपने तहसील , अपने जिला में प्रदर्शन कीजिए बल्कि इमरान प्रतापगढ़ी वहां बैठी बेबस, कमज़ोर, मज़लूम आवाम से अपील करते कि,’ चुप बैठोगे तो वे कल आपकी भी बारी आएगी।’
जनता डर जाती, डर के रो देती। और मंच पर बैठा सफेद खद्दरधारी भीतर ही भीतर खुश हो जाता कि चलो अब इनका वोट तो पक्का जो यहां आकर मुशायरा सुन रहे हैं। दादरी में अख़लाक की हत्या हुई। इमरान ने उस पर भी काव्य पाठ कर डाला। सारे सियासी मुशायरों के मंच से इमरान दादरी को पढ़ते और उसी सरकार से यश भारती उठा लेते है। दादरी के अख़लाक के लिए इमरान ने जिन मंचों का इस्तेमाल किया यदि उन मुशायरों की भीड़ से मुखातिब होने के बजाए मंच पर बैठे वादाखोर और मक्कार नेताओं को मुखातिब होकर कुछ अपील करते तो शायद बात कुछ और होती लेकिन उनमें इतनी हिम्मत कहां कि वे जिनके बुलावे पर गए हैं उनकी आँख में आँख डालकर उन्हें उनकी गलतियां गिना सकते।

मुजफ्फरनगर में दुर्दांत दंगे होते हैं। लोग ठंड में विस्थापित हो रहे होते हैं दूसरी तरफ इमरान प्रतापगढ़ी काले रंग की शॉल ओढ़े सैफई महोत्सव में अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव की शान में उनके सामने बैठ कर कसीदे पढ़ रहे होते हैं। वहां से बाहर निकल कर वे दंगों के लिए तैयार दूसरी कविता पढ़ने लग जाते। हर मंच , हर माहौल के हिसाब से इमरान प्रतापगढ़ी के पास कविताएं हैं। इमरान को जितनी रक़म मुस्लिम सियासी लोग एक मुशायरे के लिए देते हैं उतने में पांच बड़े शायरों की फीस बन जाए। क्यों बढ़ा दाम इमरान की? सिर्फ इसलिए क्योंकि इमरान द्वारा पढ़ी जाने वाली शायरी से लाभ नेताओं को होता। चुनाव जीतने के लिए जज्बात भड़काने की ज़रूरत पड़ती और इमरान वह बाखूबी कर देते।

क्या आप एक ऐसे व्यक्ति को यूथ ऑयकन या फिर अपना हीरो बनाएंगे जो आपको झूठी शान और झूठी ताकत में झूमते रहने का आदि बना दे। क्या आप एक सियासी शायर को अपने बच्चों का भविष्य तय करने देंगे? यदि हां, तो आपको पूरी आज़ादी है। आवाम ही किसी को बनाती और बिगाड़ती है, मैं इमरान का कुछ बिगाड़ना नहीं चाहता, मेरी क्या बिसात और औकात। लेकिन मैं चाहता हूं कि इमरान प्रतापगढ़ी सरीखे सियासी शायरों को जो कि सामाजिक बनने का ढोंग करते हैं उनकी सच्चाई के रूबरू हो जाएं। कुछ बेहद कम उम्र के बच्चे भी इस तरह की सियासी शायरी करने लगे हैं और सामने बैठे लोग उनके घर वालों की रटाई पंक्तियों पर तालियां बजाते दिख रहे हैं। पैसों के लिए नौनिहालों को नरक में झोंक रहे वालिदैन की इसमें कम गलती और उन नेताओं की ज्यादा है जो चुनाव लड़ने से पहले ऐसे मंच तैयार करते हैं। मुसलमानों, इस ढोंग से बचो। तुम्हारी नस्लें बर्बाद हो जाएंगी। ये सियासत की पैदावर हैं, ये फसल जहरीली है जो अपनी ही नस्लों की सोच और समझ को खत्म करेगी।

  • लेखक जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार है

नोट – उपरोक्त लेख, लेखक के निजी विचार है कोहराम न्यूज़ लेखक द्वारा कही किसी भी बात की ज़िम्मेदारी  नही लेता है

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