Friday, July 1, 2022

इमरान खान का पाक का पीएम बनना भारत के हित में नहीं

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डॉ. शारिक़ अहमद ख़ान

अकबर से लड़े योद्धा और सूफ़ी पीर रोशन के वंशज इमरान ख़ान के पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनने पर कबायली पश्तून कबीलों के हाथ पाकिस्तान चला जाएगा। पाकिस्तानी सेना में पश्तून हावी हैं लिहाज़ा ये एक प्रकार का मिलिट्री राज ही होगा और भारतीय उपमहाद्वीप में अशांति पैदा करेगा। इमरान ख़ान के पीएम बनने से कट्टरपंथी हावी हो जाएंगे और इसका प्रभाव भारत-पाक रिश्तों पर पड़ेगा। पड़ोस में सेना और पश्तून कबीलों की कठपुतली सरकार का होना ख़तरे की घंटी है।

नवाज़ शरीफ़ एक नेता थे। आमतौर पर नेता सबकुछ भुगता हुआ आदमी होता है। जनता के बीच का होता है और सबको साथ लेकर किसी तरह सरकार चलाता है। मौके पर दब भी जाता है। जनता के प्रति जवाबदेह होता है। लेकिन अविभाजित भारत के पख़्तून कबीले किसी सरकार के कानून को नहीं मानते और दबाव में नहीं आते।

इमरान ख़ान उन्हीं पख़्तूनों के बीच से हैं। माता की तरफ़ से पीर रोशन के वंशज हैं और पख़्तून प्रभाव उनके ऊपर गहरा है। वो चाहे दबाव में या फिर चाहे अपने मन से पख़्तूनों की गिरफ़्त में हैं। पख़्तून योद्धा पीर रोशन ने अकबर के दीन-ए-इलाही का विरोध किया। विरोध चरमसीमा पर पहुंचा और अकबर की सत्ता पख़्तून कबीलों के इलाके से ख़त्म हो गई। पीर रोशन का अकबर की मुग़ल सेना से युद्ध हुआ और पीर रोशन युद्ध में मारे गए। अकबर ने पीर रोशन के पूरे परिवार के पुरूषों को मृत्युदंड दिया। केवल पीर रोशन के पुत्र चौदह वर्ष के पीर जालाला को छोड़ दिया।

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पीर जलाला ने अकबर को चुनौती दे दी और अपना पख़्तून इलाका फिर आज़ाद करा लिया। मुग़लों ने भारत की सत्ता लोदी-सूरी जैसे पख़्तूनों से ली थी और पख़्तून मतलब पठान उसे पुन: वापस प्राप्त करना चाहते थे। अकबर ने पीर जलाला के विरोध को दबाने के लिए अपने प्रिय राजा बीरबल के नेतृत्व में सेना भेजी। पीर जलाला से युद्ध हुअा जहाँ बीरबल को पीर जलाला ने युद्ध में मार डाला। अकबर अपने प्रिय बीरबल की मौत से बहुत दुखी हुआ। उसने फिर सेना भेजी और अकबर के जीवनकाल तक ये युद्ध चलता रहा। जब पीर जलाला की युद्ध में मौत हुई तो भतीजे अहदाद ख़ान ने मुग़लों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला और मुग़ल सेनापतियों मानसिंह और महावत ख़ान से युद्ध होता रहा। ये जंग पूरी रौ में क़रीब सौ साल तक चली और औरंगज़ेब तक को पख़्तूनों ने स्वीकार नहीं किया। मुग़लों के बाद जब अंग्रेज़ों की सत्ता आयी तो पख़्तूनों ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया। अंग्रेज़ों से जंगें होती रहीं। ग़ुलामी उन्हें पसंद नहीं थी।

अविभाजित भारत के उस वज़ीरिस्तान और ख़ैबर पख़्तूनख्वा के इलाके में कभी अंग्रेज़ वास्तविक सत्ता नहीं कायम कर पाए। बस काग़ज़ी सत्ता रही। उस इलाके में पख़्तूनों की समानांतर सत्ता चलती रही। पख़्तून अपनी आज़ादी में सरकार का दख़ल पसंद नहीं करते। जब देश का बंटवारा हुआ तो वो इलाके पाकिस्तान में चले गए। जब से पाकिस्तान बना तब से आज तक पाकिस्तानी सरकार का नियंत्रण उस इलाके में नहीं कायम हो पाया ना ही कानून लागू हो पाया। सब बस नाममात्र का है।

आज भी वहाँ पख़्तून कबीलों की अपनी समानांतर सरकार चलती है और अपने कानून हैं। पीर जलाला और पीर रोशन के विचारों को पख़्तून सिर-आँखों पर रखते हैं और उनके वंशज ऑक्सफ़ोर्ड से पढ़े पूर्व क्रिकेटर इमरान अहमद ख़ान नियाज़ी पर पख़्तूनों का गहरा प्रभाव है। अब पाकिस्तान में कट्टरपंथ और बढ़ेगा,कश्मीर के मुद्दे पर पाक-भारत संबंध और ख़राब हो सकते हैं। इमरान ख़ान का पाक की पीएम बनना भारतीय उपमहाद्वीप के हित में नहीं है।

(ये लेखक के निजी विचार है)

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