Sunday, June 13, 2021

 

 

 

अगर हजरत मुहम्मद (सल्ल.) की पैदाइश इस जमाने में होती तो आप डिजीटल क्रांति के महानायक होते

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क्या आप ऐसी दावत में शामिल होना चाहेंगे जिसका बुलावा आपको भेजा ही न गया हो? कौन चाहेगा कि जब लड्डू का स्वाद चखने के बाद पूड़ी-सब्जी का निवाला मुंह में डालने ही वाले हों, तभी आकर कोई कह दे- हुजूर! आपको तो यहां बुलाया ही न था। फिर आने की जहमत क्यों उठाई? इसलिए बिन बुलाई बारातों में नही जाना चाहिए। मुझे याद है, 1996 में जब मैं नवलगढ़ के एक हाॅस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहा था, तब एक शाम विद्यालय के प्रधानाध्यापकजी ने मुझे कहा- आज फलां आदमी की बेटी की शादी है। इसलिए रात को कन्यादान के ये 100 रुपए जरूर लिखवा देना। चाहो तो हाॅस्टल के किसी लड़के को साथ ले जाना।
वे बहुत जल्दी में थे। शायद उन्हें कहीं जाना था, इसलिए वे पैसे मुझे थमाकर चले गए। वे मुझ पर बहुत भरोसा करते थे। मैंने उनकी आज्ञा का पालन किया। रात को शादी वाले घर गए और कन्यादान लिखवा दिया। जब वापस आना चाहा तो मेरे साथ गया लड़का बोला- यार, इतनी दूर आए हैं। अब क्यों न पकवानों का लुत्फ उठाया जाए! मैंने उसे मना कर दिया, क्योंकि मुझे सिर्फ पैसे लिखवाने की ही जिम्मेदारी सौंपी गई थी, पकवान खाने की नहीं। मैंने उससे कहा, अगर तुम्हारा दिल चाहे तो जाओ, मेरी ओर से मनाही नहीं है। मैं बाहर बैठकर तुम्हारा इंतजार कर लूंगा। वह मुझे अंदर ले जाने की जिद करने लगा, मैं अपनी जिद पर अड़ा रहा। आखिरकार वह अंदर चला गया और बोला- तुम्हारे साथ किसी शादी में नहीं जाना चाहिए।
करीब आधा घंटे बाद वह आया। वह एक-एक मिठाई का आंखों देखा हाल बता रहा था, लेकिन मुझे मेरे फैसले पर खुशी थी। जहां से खाने का बुलावा न आए, वहां यूं ही जाकर पंगत में बैठ जाना मुझे ठीक नहीं लगता। आज भी मुझे यह पसंद नहीं है। जो न बुलाए, जबर्दस्ती उसके गले पड़ना कहां का इन्साफ है! आप सोच रहे होंगे, आज मैं यह दावत पुराण क्यों सुनाने लगा! शायद किसी ने मुझे शादी में नहीं बुलाया, इसलिए? तो समझ लीजिए हुजूर, ऐसी कोई बात नहीं है। मुझे तो वैसे भी दावतों में जाना का कोई शौक नहीं है।
मैंने इसका जिक्र करना इसलिए जरूरी समझा क्योंकि मेरे कुछ साथियों को ऐसी ही एक दावत की फिक्र सता रही है। मेजबान कहता है कि मेरे खाने पर पहला हक मेरे घर के सदस्यों का है। पहले वे खाएंगे। उनका पेट भर जाए तो हम दुनिया की फिक्र करेंगे। मगर मेरे कुछ दोस्त मान न मान, मैं तेरा मेहमान बनना चाहते हैं। दरअसल मैं ट्रंप साहब की बात कर रहा हूं, जो चुनावी रणभूमि में महाविजय प्राप्त कर अमरीका के राष्ट्रपति पद को सुशोभित करने वाले हैं। आप फरमाते हैं कि अमरीका अमरीका वालों के लिए है। हमने दुनिया का ठेका नहीं लिया। हम हमारी फिक्र करेंगे और आप अपनी फिक्र कीजिए।
ठीक ही है, पहले अपने देश की फिक्र करना जरूरी है। हम ट्रंप पर बोझ क्यों बनना चाहते हैं? क्यों चाहते हैं कि वे हमें शिक्षा, नौकरी और रोटी दें? ये चीजें हमें अपने हुक्मरान से मांगनी चाहिए। हम क्यों चाहते हैं कि ट्रंप हमारे लिए वहां जाने के नियम आसान कर दे? इसमें कोई शक नहीं कि अमरीका एक महाशक्ति है, मजबूत लोकतंत्र है। यह महान वैज्ञानिकों तथा वीरों की भूमि है। इसकी दुनिया में धाक है। आज वह जो भी है, आपके या मेरे आशीर्वाद से नहीं, अपने दम से है। उस देश पर पहला हक अमरीका वालों का है। दुनिया में करोड़ों लोग वहां रहने का ख्वाब देखते हैं। चाहे अपने देश में वे राजा या नवाब बनकर घूमते हों लेकिन अमरीका उन्हें कोई अहमियत नहीं देता। जरूरत पड़ने पर वह कपड़े उतारकर भी तलाशी ले लेता है। वह अपनी सुरक्षा के लिए ऐसा करता है, चाहे किसी को पसंद हो या नापसंद। मगर हमें यह भी सौ बार कबूल है।
आज मैं दुनिया की बात नहीं करूंगा। मैं मेरे मुल्क और मेरे हमवतनों की बात करूंगा। मुझे ताज्जुब होता है इस हिंदुस्तानी कौम की किस्मत पर। इस पर हंसा जाए या रोया जाए? यह कैसी कौम है जो बड़ी उम्मीदों के साथ दूसरों के घर की ओर देखती है? वह दूसरों के घर में बेइज्जती, फजीहत और हिकारत सहन कर सकती है पर फिर भी उसी के यहां मेहमान बनना चाहती है! आखिर हम अमरीका से क्यों नहीं सीखते, हम उससे अच्छा मुल्क क्यों नहीं बन सकते? सवा सौ करोड़ का मुल्क है, पर हमें अपनी अक्ल और हिम्मत पर भरोसा ही नहीं रहा।
हम चाहें तो क्या नहीं कर सकते? इस कौम की बदकिस्मती देखिए, दुनिया का बड़ा बाजार इनके पास है, मगर ये इंतजार करते हैं कि बाहर से कोई आए और यहां माल बेचे। खुद तो कुछ बनाना ही नहीं चाहते। सभी मौसम इस मुल्क में आते हैं, पानी खूब है, धरती खूब है, धूप खूब है, पहाड़ खूब हैं, जंगल खूब हैं, आबादी खूब है, मांग खूब है, भाषाएं खूब हैं, नौजवान खूब हैं। खुदा ने तो हमें बहुत कुछ दिया है। हम बदकिस्मत कतई नहीं हैं। बस हासिल करने भर की देरी है। दुनिया को देखिए, कई देश ऐसी दौलत पाने को तरसते होंगे जो सिर्फ हमारे पास है। हमें इस दौलत की परवाह ही नहीं। आज ज्यादातर नौजवानों का सपना यह रह गया है कि कोई एक सरकारी नौकरी मिल जाए, ताकि दफ्तर में आराम कर सकूं। ऊपर की कमाई हो जाए। एक खूबसूरत लड़की से शादी कर लूं जिसका रंग गोरा हो और गाल पर काला तिल। दहेज में ढेर सारी दौलत मिल जाए। दो बच्चे हों। पहला बच्चा लड़का हो। एक अच्छा सा घर हो। इतना मिल जाए तो काफी है। ऐसी ही सोच इस मुल्क की ताकत को तोड़ रही है। हम आगे बढ़ना चाहते ही नहीं, सिर्फ दूसरों के भरोसे बैठे रहना पसंद करते हैं।
अगर आज का नौजवान यह तय कर ले कि मैं बेमतलब के कामों में वक्त बर्बाद नहीं करूंगा, मैं पूरा ध्यान पढ़ाई में और नए प्रयोगों में लगाऊंगा, मैं रोज 16 घंटे से ज्यादा काम करूंगा, मैं मेरे कर्मक्षेत्र में मेरी काबिलियत से आगे बढूंगा। अगर नौजवान इतना ही कर लें तो कोई आश्चर्य नहीं कि अगला गूगल, फेसबुक, माइक्रोसाॅफ्ट, अमेजाॅन, अलीबाबा (कहानी वाले नहीं चीन वाले) हमारी ही धरती से पैदा होंगे। बस संकल्प होना चाहिए। हमारे देश में संभावनाएं खूब हैं। कोई कोशिश तो करे। हम बहुत किस्मत वाले हैं। हम तो सदियों से उन श्रीकृष्ण का कलाम पढ़ते आए हैं जिन्होंने हिम्मत न हारने और मेहनत करते जाने पैगाम दिया था। अगर श्रीकृष्ण इस युग में पैदा हुए होते तो आज कुरुक्षेत्र में नहीं बल्कि किसी काॅलेज में जाकर नौजवानों को मेहनत से अपना मुकद्दर लिखने का हौसला देते। तब कोई संजय धृतराष्ट्र को रणभूमि का हाल नहीं सुनाता बल्कि कृष्ण का पैगाम फेसबुक, यूट्यूब जैसी वेबसाइट्स पर लाइव आता।
हम तो उन नबी (सल्ल.) को मानने वाले हैं जिन्होंने दीन सिखाया तो दुनिया में रहने का सलीका भी सिखाया। प्यारे नबी (सल्ल.) ही थे जो पहली बार कारोबार करने गए तो हजरत खदीजा (रजि.) को सबसे ज्यादा मुनाफे का हिसाब दिया। हमें तो आप (सल्ल.) से सीखना चाहिए कि कारोबार कैसे करें। अगर खुदा हजरत मुहम्मद (सल्ल.) को तब के बजाय इस जमाने में भेजता तो तेजी से बदलती दुनिया में आप कारोबार के ही नहीं डिजीटल क्रांति के भी महानायक होते।
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