Saturday, July 24, 2021

 

 

 

‘मैंने गीता-कुरआन को कभी लड़ते नहीं देखा, जो इनके लिए लड़ते हैं, उन्हें कभी पढ़ते नहीं देखा’

- Advertisement -
- Advertisement -

अक्सर सरहद पार से अच्छी खबरें नहीं आतीं। खासकर पाकिस्तान से। हमारे अखबारों में आए दिन एलओसी पर तनाव और बम धमाकों की खबरें ही सुर्खियां बनती हैं। शायद ऐसी ही खबरें उन पाकिस्तानियों के हिस्से में आती होंगी जो उस पार रहते हैं, लेकिन आज मुझे एक ऐसी खबर मिली जिसे पढ़कर सच में मेरा दिल बहुत खुश हो गया। मैं चाहूंगा कि आपको भी बताऊं।

अभी-अभी हमने होली मनाई है और इस त्योहार को खास शर्त के साथ विदा किया है। शर्त ये है कि अगले साल और ज्यादा खुशियां लेकर आए। भारत के अलावा दुनिया के कई देशों में होली मनाई गई। पाकिस्तान में होली मनाई गई और इस त्योहार में हिंदुओं के साथ उनके मुस्लिम दोस्त भी शरीक हुए।

ऐसे ही नौजवानों में से एक हैं- वाहिद खान। मैंने पहली बार उनका नाम सुना है और अब भी उनके बारे में ज्यादा नहीं जानता, पर यह अंदाजा लगा सकता हूं कि ऐसे नौजवान जिस भी मुल्क में होंगे, उसका भविष्य जरूर रोशन होगा। चाहे वह भारत हो या पाकिस्तान।

आज मैंने भारत की कुछ समाचार वेबसाइट्स पर उनके बारे में पढ़ा। उनमें वाहिद के जीवन की एक खास घटना का जिक्र है जो होली से जुड़ी है। वे लिखते हैं-

मैं होली का त्योहार मनाकर आ रहा था। मैंने फैसला किया कि सिटी बस से सफर करूंगा। हालांकि मेरे दोस्तों ने ऐसा करने से मना किया। उनका मानना था कि मुझे रिक्शा ले लेना चाहिए क्योंकि मैं पूरी तरह से रंग से सराबोर था। उन्हें डर था कि मुझे देखकर लोग कुछ गलत न कर दें। लेकिन मैं भी लोगों की प्रतिक्रिया ही देखना चाहता था। साथ ही मेरा एक मकसद ये भी था कि क्यों न विविधता को सार्वजनिक तौर पर मनाया जाए और आम लोग भी इसे समझें। इस सफर के दौरान मेरी कई लोगों से बात हुई और सभी ने यही सोचा कि मैं एक हिंदू हूं। उन्होंने मुझे ये भी बताया कि वे मेरे धर्म (हिंदू) के लोगों को कैसे पहचानते हैं। कई बातें हुईं लेकिन ये बातचीत मेरी पसंदीदा बन गई …

मैं एक अंकल के पास बैठा था।

अंकल: (सहानुभूति के साथ) इतनी कम उम्र में तुम काम क्यों कर रहे हो?

मैं: माफ कीजिए, आप क्या कहना चाहते हैं? मैं समझा नहीं।

अंकल: तुम रंग का काम करते हो ना?

मैं: (हंसते हुए) नहीं अंकल, मैं अभी-अभी होली खेल कर आ रहा हूं।

अंकल: अच्छा … हिंदू हो?

मैं: नहीं, मैं एक मुस्लिम परिवार से हूं।

अंकल: क्या? और फिर भी तुमने होली का त्योहार मनाया? तुम्हारे साथ कुछ और मुस्लिम नौजवानों ने भी ऐसा किया?

मैं: हां, हमारे कुछ हिंदू दोस्त भी हैं और हमने एक चर्च में होली मनाई।

अंकल: बेटा, तुम एक मुस्लिम हो और…

(तभी मेरे पीछे बैठे एक दूसरे अंकल ने बातचीत के बीच हमें टोका): ओ भाई, अगर ये रंग इन बच्चों को साथ लाते हैं और ये अल्पसंख्यक भाइयों के साथ मिलकर होली मना रहे हैं तो तुम धर्म को बीच में क्यों ला रहे हो? ये तो बहुत अच्छी बात है।

अंकल: हम तो यही सुनते हुए बड़े हुए हैं कि हिंदू और मुस्लिम कभी साथ-साथ नहीं रह सकते। (दूसरे अंकल इसे सुनते हुए अपना सिर हिलाते हैं)

मैं: यहीं तो हम सब गलती कर जाते हैं। (ये सुनकर अंकल हंसने लगते हैं)

सचमुच यह एक शानदार दिन रहा। मैं खुश हूं कि पाकिस्तान दूसरी संस्कृतियों और धर्मों को भी स्वीकार कर रहा है।

यदि आपने यह पढ़ा है तो आपको ईस्टर की मुबारकबाद।

मैं चाहता हूं कि यह घटना आप पढ़ें और दूसरों को भी पढ़ाएं। खासतौर से उन लोगों को जरूर पढ़ाएं जिन पर किसी गैर-हिंदू की छाया भी पड़ जाए तो उनका धर्म भ्रष्ट हो जाता है और उन लोगों को भी पढ़ाएं जिनके नजदीक कोई गैर-मुस्लिम बैठ भी जाए तो उनका ईमान खतरे में पड़ जाता है। भारत हो या पाकिस्तान, ऐसे लोगों का बस चले तो पूरी दुनिया को सर्कस ही बना डालें।

चलते-चलते

मैं जिस कमरे में पढ़ता-लिखता हूं, उसमें एक अलमारी है। वहां मैंने कई किताबें रखी हैं। उसके एक कोने में कुरआन है और उसी के पास गीता रखी है। एक दोस्त ने बाइबिल भेजी थी, वह भी उन्हीं के साथ रखी है। मैंने इन किताबों को कभी लड़ते-झगड़ते नहीं देखा। जो लोग इनके नाम पर लड़ते हैं, उन्हें कभी ये किताबें पढ़ते नहीं देखा। इन किताबों के नाम पर शिकायत करते कुछ लोगों की जिंदगी बीत गई। मैं कभी कुरआन सबसे ऊपर रख देता हूं, कभी बाइबिल तो कभी गीता, मगर न तो ये किताबें मुझसे शिकायत करती हैं और न मेरा खुदा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot Topics

Related Articles