गुरमेहर कौर

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की धूम आधी आबादी का जश्न बना है. और इसी वक्त लोकतंत्र के इस पर्व में आख़िरी दौर का मतदान हुआ. जिसमें आधी अबादी की बागीदारी क़ाबिले तारीफ़ रही. लेकिन आज की कथाकथित उदारवादी दुनिया महिलाओं को लेकर कितनी कुंठित और नेपत्थ्यवादी बन गई है. इसका भी नज़ारा इसी समाज में देखने को मिला. फिर भी महिलाओं के क़दम जिस तरह लोकतंत्र के महापथ पर आगे बढ़े हैं. ज़माने को इसकी क़द्र करनी चाहिए.

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर पूरी दुनिया में आधी आबादी का जश्न अपने ही अंदाज़ में मनाया गया. दुनिया के अलग अलग हिस्सों में माहौल की नज़ाक़त के मुताबिक महिलाओं की खुशी का पैमाना ऊपर और नीचे देखा गया. हमारे देश में भी नज़ारा बाक़ी दुनिया से बहुत ज़्यादा अलग नहीं है. यूपी समेत देश के पांच सूबे जिनमें लोकतंत्र का पर्व मनाया जा रहा है. यहां आधी आबादी की भूमिका काफी अलग और रफ्तार भरी देखी गई. जहां इंदिरा. सरोजिनी और बेग़म हज़र महल सरीखी महिलाओं के अक्स कुछ महिलाओं में देखने की कोशिश हुई. ये अलग बात है. कि प्रियंका, डिंपल, स्मृति और माया को इस दौर में सियासी चश्मे से देखने वाले ज़्यादा होंगे. लेकिन इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि हों कहीं भी लेकिन हैं तो ये भी महिलाएं ही जो पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर ज़माने को ख़िताब करती नज़र आयीं.

अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस पर राष्ट्रपति प्रणव मुख़र्जी ने सभी देशवासियों को महिला दिवस की शुभकामनाये दी. इसके अलावा गूगल ने अपने डूडल को महिला दिवस को समर्पित किया है. वाराणसी में गुलाबी मतदान केंद्र लोगों को लुभाता रहा. अंतर्राष्ट्रीय महिला एथलीट और स्वच्छ काशी की ब्रांड एंबेसडर नीलू मिश्रा ने इस आदर्श केंद्र को गोद लेकर जिला निर्वाचन टीम के साथ मिलकर ये थीम तैयार किया. जहां महिलाओं ने अपने मतदान के निशान के साथ सेल्फी पोस्ट करके आधी आबादी से होने का हक़ अदा किया.

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महिलाओं के बढ़ते इस आभामंडल के बीच कुछ दाग़ लगे भी और कुछ से ज़्यादा इस पुरुष प्रधान समाज ने लगाने की कोशिश भी की. और कहीं तो ऐसा हुआ कि अपनी ही परछाई को महिलाओं ने ही कलंकित करने की अपनी घृणित मंशा जागर कर दिया. मेनका गांधी ने एक टीवी इंटरव्यू के दौरान हॉस्टल में रहने वाली लडकियों के लिए लक्ष्मण रेखा खिंची जाने की बात कही. मेनका ने हॉस्टल में रहने वाली लडकियों के लिए कहा की जब आप 16-17 साल की उम्र में होते है तो हारमोंस काफी सक्रिय रहते हैं.  और ये अपना असर भी दिखाते हैं.  इन्ही हारमोंस के विस्फोट की वजह से होने वाली गलतियों से बचने के लिए कुछ लक्ष्मण रेखा खींचनी जरुरी है. लेकिन क्या यही हारमोन्स लड़कों में असर नहीं दिखाते. उनके लिए कोई लक्ष्मण रेखा आख़िर क्यों न हो.

आधी आबादी पर शिकंजा सिर्फ़ महिलाओं की तरफ़ से ही नहीं कसा गया. पुरुष आबादी में ये तेज़ी कुछ और ही देखी गई. गुरमेहर को एक पोस्ट के लिए गैंगरेप की धमकिया तक मिलीं. तो बालीवुड से लेकर सियासी गलियारों तक में पाकिस्तानी और अहसिष्णु होने के साथ ही देशद्रोही के ज़ुबानी लकब गूंज उठे. जिसमें न मंत्री पीचे रहे, न छात्र संगठन औऱ न ही अनुपम खेर जैसे विरले कलाकार. महिलाओं को लेकर घटिया सोच बॉलीविड में कितने अंदर तक घर कर गया है. इसका नमूना सेंसर बोर्ड ने भी दिखा दिया.

सेंसर बोर्ड सदस्य अशोक पंडित ने जेएनयू की शहला राशिद को आतंकियों के साथ सोने वाली बताया. जिसके बाद ट्विटर पर उन्हें मिला करारा जवाब भी. ये इशारा करने लगा कि बॉलीवुड और सेंसर बोर्ड में भी देश को बांटने वाली एक ख़ास सोच घर कर गई है. पंडित ने खुद के संघी होने को बेहतर बताया. दरअसल शहला राशिद ने महिलाओं पर आधारित किसी फिल्म को सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) द्वारा बैन करने का आरोप लगाया गया, जिसके बाद यह विवाद शुरू हुआ. लेकिन अशोक पंडित को उनकी बेटी ने ही सबसेपहले आईना दिखा दिया. उनकी बेटी शारिका पंडित ने ट्टीट किया गया है. उसने लिखा- अपने पिता द्वारा इस्तेमाल ऐसी गन्दी और अश्लील भाषा पर मुझे शर्म आ रही है. एक पिता होकर वे देश की बेटी को आतंकी के साथ सोने की बात कैसे कर सकते हैं.

आधी आबादी के अंदाज़े बयां की इस बेला में क्रिकेट जगत में भी रुख थोड़ा ही बदला नज़र आया. क्रिकेटर विराट कोहली ने अपनी मां, और उनकी कथित गर्लफ्रेंड अनुष्का शर्मा को इस दिन की शुभकामनाएं दी. इन सबके बीच आधी आबादी को लेकर पुरुष प्रधान समाज की सोच के कोख में किस तरह की घटिया सोच और ख़ौफ़ पल रही है. इसका भी नज़ारा देश के कई हिस्सों में कई कन्या भ्रूण मिलने से साफ़ हो गई. अब ऐसे में सवाल ये है. कि ये इंसान पूरी दुनिया और समाज को चलाने का ठेका खुद ही क्यों ले लेता है. क्यों खुद को संसार का पालनहार समझने की बड़ी भूल करके क्रूर से क्रूर कर्म करने से पहले और बाद ज़रा भी नहीं सोचता. क्या दुनिया को बनाने वाले ने इस तरह का कोई भेद अपने शाहकार में दिखाय़ा है.

शाहिद परवेज़, वरिष्ठ पत्रकार

आज न सिर्फ़ पुरुष को. बल्कि महिलाओं को भी ये बार बार सोचना होगा कि आधी आबादी के ख़िलाफ़ हर क़दम क्यों आग बनता जा रहा है. क्या हमारे ये कर्म सिर्फ़ महिला हानि करते हैं. क्या इसमें पुरुष प्रधान समाज का कोई नुकसान नहीं. अरे पहले ये देखो, हम इंसान हैं. जानवर नहीं. इससे बाहर निकलो. महिला के ख़िलाफ़ कोई कदम हो या पुरुष के ख़िलाफ़ कोई क़दम, जिससे भी किसी को हानि पहुंचती है. उसके वजूद पर ख़तरा आता है. वो सच मायने में दोनों पर ख़तरा है क्योंकि खुदा ने जिसे दुनिया के अलग अलग हिस्से में कोई गॉड तो कई ईश्वर कहता है. उस सर्वशक्तिमान सत्ता ने आदम-हव्वा को दुनिया को गुलज़ार करने के वास्ते बनाया था. ये अलग बात है. कि हव्वा आदम की ही बायीं पसली से बनीं थीं. लेकिन बाद में दोनों ही एक दूजे के वजूद के लिए ज़रूरी हो गए. क्या इससे पूरी इंसानियत इन्कार कर सकती है. क्या कोई इन्कार सकता है कि इंसान न रहा तो ये पूरी दुनिया भी नहीं रहेगी. क्योंकि इस आदम के लिए ही परवरदिगार ने पूरी क़ायनात बनाई है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं. ये जरुरी नहीं की कोहराम न्यूज़ उपरोक्त विचारों से सहमत हो)

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