Thursday, October 21, 2021

 

 

 

हिंदुस्तान हम सब का है – मुददस्सीर अहमद क़ासमी

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इस दुनिया के सभी बुद्धिमान लोगों का निर्णय है कि धर्म मनुष्य की जरूरत है, क्योंकि मनुष्य शरीर और आत्मा का एक संयोजन है। जिस तरह से शरीर को भोजन की जरूरत होती है  उसी तरह आत्मा को भी भोजन की ज़रूरत होती है, और यह स्पष्ट है कि आत्मा की आवश्यकता धर्म द्वारा ही पूरी की जा सकती है। यही कारण है कि हर युग मैं और प्रत्येक क्षेत्र में लोग किसी न किसी धर्म की खोज मैं रहे हैं और किसी एक धर्म को अपनाया है। अगरचे किसी धर्म का सही होना या न होना ये एक चर्चा का विषय है लेकिन इस बात मैं किसी को भी आपत्ति नहीं है की किसी भी भूमि पर बसने वाला कोइए भी धर्म अपना सकता है, यह प्रत्येक व्यक्ति का निजी मामला है।

इस से उस सिद्धांत की अस्वीकृति सामने आती है कि एक विशेष धर्म के लोग एक देश में रहेंगे और बाकी लोग उस देश मैं चले जाएंगे जहाँ उनके धर्म को मानने वाले रहते हैं या अगर यहाँ रहना चाहते हैं तो द्वितीय श्रेणी के नागरिक बन कर रहेंगे। तथ्य यह है कि यह सिद्धांत अक़्ली और ऐतिहासिक दोनों हिसाब से ग़लत है क्योंकि जब हम ऐतिहासिक रूप से देखते हैं तो हम पाते हैं कि एक धर्म के अधिकांश आबादी वाले देशों में, अन्य धर्मों के अल्पसंख्यक हमेशा से शांति में रह रहे हैं, और उन्हें सभी अधिकार हासिल हैं। उसका उदाहरण अरब देशों में ईसाइयों की बड़ी संख्या मैं होना है और तरक़्क़ी करना है। यदि अगर दो भाइयों में से एक अपना धर्म छोड़ता है और दूसरे धर्म को अपनाता है, तो उससे यह नहीं कहा जाएगा कि आप अब इस देश के नागरिक नहीं हैं या आप एक दूसरे दर्जे के नागरिक बन गए हैं क्योंकि उसने केवल अपना धर्म ही बदला है उसके सभी नींव अभी भी वही हैं जो पहले थे।

इस संदर्भ में जब हम अपने प्रिय देश भारत की समीक्षा करते हैं तो हम अक्सर एक अजीब स्थिति का सामना करते हैं। जैसा की पिछले दिनों आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत के प्रत्येक नागरिक पहले हिंदू हैं, मोहन भागवत के बयान के बाद, शिव सेना ने भी जोर दिया है कि भारत पहले हिन्दुओं का  है और उसके बाद दूसरे धर्म के मानने वालों का। शिव सेना ने अपने दैनिक समाचार पत्र “समाना” में लिखा था कि भारत पहले हिंदुओं का है और फिर किसी और का क्योंकि मुसलमानों के पास पचास से अधिक देश हैं। समाना ने अपने संपादक में लिखा है कि ईसाइयों के पास अमेरिका और यूरोप जैसे देश हैं। बुधिस्ट्स के पास चीन जापान, श्रीलंका और म्यांमार है। हिन्दुओं के पास भारत के अलावा कोई और देश नहीं है।

आखिर ऐसी बातों का उद्देश्य क्या है? क्या वे चाहते हैं कि देश के अन्य अल्पसंख्यक अपने धार्म वाले  देशों में चले जाएं या यहां रहें तो दूसरे दर्जे का नागरिक बन कर रहें? जैसा कि हम ऊपर स्पष्ट कर चुके हैं, ऐसी कोई विचारधारा न तो अक़्ली हिसाब से सही है और न ही ऐतिहासिक हिसाब से सटीक है। उत्साही बात यह है कि देश के इंसाफ पसंद बुद्धिजीवियों ने भी इस विचार को सिरे से ख़ारिज कर दिया है और ऐसी किसी भी संभावना को अनावश्यक बताया है।

 न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर ने अपने हालिया स्टेटमेंट में कहा है की: “भारत में हिंदू राज्ज्य  का अनुभव कभी सफल नहीं हो सकता। भारत विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों और धर्मों का देश है। इस तरह के देश में जहाँ हिंदुओं के सभी पंथों और समुदायों का प्रतिनिधित्व करने की कोई क्षमता नहीं है, वहां हिन्दू राष्ट्र का सपना देश की अखंडता और एकता के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। उन्होंने कहा की इन परिस्थितियों में, राजनीतिक दलों, गैर-सरकारी संगठनों और अन्य लोगों को जो देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान पर विश्वास करते हैं और भरोसा करते हैं, एकजुट हो  कर मुक़ाबला करना हो गा।

जहां तक मुस्लिम शासकों दुवारा  हिन्दुओं  को ज़बरदस्ती मुस्लमान बनाने की बात है तो यह पूरी तरह गलत है। इसलिए, “तारीख-ए हिंद” के लेखक राम प्रसाद खोसला लिखते हैं: “औरंगजेब ने कभी रोजगार के लिए इस्लाम की शर्त  नहीं रखी। राजा को इस्लाम का रक्षक ज़रूर माना जाता था, लेकिन बाबर से औरंगजेब तक गैर मुसलमानों पर कोई दबाव नहीं था, मुगल का इतिहास पूरी तरह से तंगनज़री और सांप्रदायिकता से पाक है।” इस ऐतिहासिक संदर्भ में, यह स्पष्ट है कि मुस्लिम शासकों ने धार्मिक सहिष्णुता पर सख्ती से अमल किया है। तथ्य यह है कि धर्म में बदलाव अचानक नहीं होता, आदमी पहले  सोचता है और समझता है और फिर अपना लाभ देखकर फैसला करता है। और एक इतिहासिक तथ्य यह है कि  भारत मैं  विजय प्राप्त करने वाले मुस्लिम शासकों का मक़सद किसी को मुस्लमान बनाना था ही नहीं ,उनकी जीत केवल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए थी।

यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल है की आखिर कुछ हिन्दू भायों के दिल और मन में मुसलमानों के खिलाफ नफरत का कारण क्या है? इसका उत्तर भी हमें इतिहास को पढ़ने से मिल जाता है। जी हां, जब हम इतिहास के पृष्ठों को उलटते हैं तो हम स्पष्ट रूप से ये पाते हैं कि जब अंग्रेजों ने “फूट डालो और शासन करो” के नज़रिए से भारत का इतिहास लिखवाना शरू किया तो उसमें एक और मुस्लिम शासकों को ज़ालिम, पक्षपात होने और धार्मिक असहिष्णुता का इलज़ाम दिया, तो दूसरी और शिवाजी जैसे  शासकों को मुस्लिम दुश्मन घोषित करदिया। इस तरह की साजिश आपको एलिफिस्टन, एलिट एंड डावूस और ऍम.ऐ. टाइट्स की पुस्तकों में और खास तोर पर हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया और ऑक्सफ़ोर्ड हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया मैं मिल जाएगी।

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मुददस्सीर अहमद क़ासमी

सभी तथ्यों के सामने आने के बाद, अब हमारे सामने एक बड़ी चुनौती ये  है कि उन्हें जमीनी स्तर पर आम करने का प्रयास करैं। और इसके लिए इस देश में बसने वाले सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक मंच बनाएं, जहां से केवल सत्य का प्रचार हो, गलतफहमी दूर करने की कोशिश हो और देश के विकास की बात हो। हम इस प्रक्रिया में सेक्युलरिज़्म विरोधियों को भी शामिल करके उनके मन को साफ करने का काम ज़रूर करें। इससे हमारा ये मुल्क शांतिपूर्ण होजाएगा और प्रगति के मार्ग पर चल पड़े गा।

(लेखक मरकज़ुल मआरिफ़ एजुकेशन एंड रिसर्च सेण्टर मुम्बई मैं लेक्चरर और ‘ईस्टर्न क्रिसेंट’ मैगज़ीन के असिस्टेंट एडिटर हैं)

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