Thursday, December 9, 2021

रवीश कुमार: अब हिन्दी के अखबार पोंछा लगाने के लिए ही रह गए

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 रवीश कुमार

सेंटर फार मोनिटरिंग इंडियन इकोनोमी(CMIE) केंद्र और राज्य सरकारों के प्रोजेक्ट पर नज़र रखती है। इस संस्था ने 962 प्रोजेक्ट का अध्ययन किया है। ये सभी 150 करोड़ से ऊपर के प्रोजेक्ट हैं। इनमें से 36 प्रोजेक्ट 20 साल से ज़्यादा की देरी से चल रहे हैं। 67 प्रोजेक्ट 10 से 20 साल की देरी से चल रहे हैं। ज़्यादातर प्रोजेक्ट पानी और सिंचाई से संबंधित हैं। CMIE के अनुसार ये प्रोजेक्ट 32.7 लाख करोड़ के हैं। 20 साल पहले 11 नई रेल लाइनेंऔर चार आमान परिवर्तन का प्रोजेक्ट बना था, जो आज तक पूरा नहीं हुआ है।

सांख्यिकी मंत्रालय 351 इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर नज़र रखता है। ये सभी 1000 करोड़ से ऊपर के प्रोजेक्ट हैं। 127 प्रोजेक्ट में देरी हो चुकी है। 115 प्रोजेक्ट की लागत बढ़ चुकी है और 51 प्रोजेक्ट देरी भी हो चुके हैं और लागत भी बढ़ चुकी है। फरवरी 2017 तक का आंकड़ा है।

मार्च में सांख्यिकी मंत्रालय ने आंकड़ा पेश किया है। इसके अनुसार 9 प्रोजेक्ट समय से पहले पूरे होने वाले हैं। 324 प्रोजेक्ट समय पर चल रहे हैं। 327 प्रोजेक्ट में देरी हो चुकी है। इनमें से 322 प्रोजेक्ट की लागत बढ़ चुकी है। इन सभी 1,231 प्रोजेक्ट की लागत 15.59 लाख करोड़ है जिसमें देरी के कारण 1.71 लाख करोड़ लागत बढ़ गई है।

2016 के अंत तक के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 29.8 प्रतिशत प्रोजेक्ट देरी से चल रहे हैं। मार्च 2014 से पहले यह प्रतिशत 45.74 था। काफी सुधार है। इसके कारण लागत में भी कभी आई है यानी जितने का प्रोजेक्ट था, उतने में पूरा हो रहा है, बिजली पेट्रोलियम कोयला, स्टील और खनन क्षेत्र के बड़े प्रोजेक्ट में देरी है। कोई एक साल की देरी से चल रहा है तो कोई दो से तीन साल की देरी से। 119 प्रोजेक्ट 25 से 60 महीने की देरी से चल रहे हैं।

पुराने प्रोजेक्ट जो 20 साल की देरी से चल रहे हैं, यह स्पष्ट नहीं है कि क्यों देरी से चल रहे हैं। क्या सरकारों ने उन्हें पूरा करना ज़रूरी नहीं समझा? उनकी ज़रूरत समय के साथ समाप्त हो गई या नई सरकार के साथ प्राथमिकता बदल गई? बहुत से कारण होंगे।

लेकिन बिजनेस स्टैंडर्ड की टीम को बधाई। शाइने जेकब, मेघा मनचंदा और राजेश भयानी की रिपोर्ट का हिन्दी अनुवाद पेश किया गया है। ताकि ख़बरों को देखने का नज़रिया बदलता रहे। इसीलिए इतनी मेहनत की। हिन्दी के अख़बार पोछा लगाने के लिए ही रह गए हैं। दो चार अपवादों के अलावा कुछ होता नहीं है। इतने प्रतिभाशाली पत्रकारों के रहते हुए भी संपादक उनसे कूड़ा निकलवा रहे हैं।

क्या किया जा सकता है। कोई मुकाबला नहीं है कि हिन्दी के पत्रकारों की प्रतिभा का लेकिन उनसे कोई काम ही नहीं लेगा तो क्या कर सकते हैं। हिन्दी के अख़बारों में सरकार के काम की गंभीर विश्लेषण की क्षमता ही नहीं है। इसलिए हिन्दी के अख़बार बाढ़ सुखाड़ या मानवीय स्टोरी तक ही सीमित रह गए हैं जहां सरकार या किसी नेता से टकराने की नौबत नहीं आती है। वो भी बाढ़ की ख़बरों में सरकार को बचाने का प्रयास दिखता है। वैसे अंग्रेज़ी के अख़बारों की भी यही हालत है। सौ ख़बरें चाटुकारिता की, एकाध पत्रकारिता के स्तर की। बस हो गया काम। ज़्यादा बोल गया मगर ग़ौर से देखेंगे तो पता चलेगा, उतना भी ज़्यादा नहीं बोला।

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