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हफीज किदवई

मोहर्रम के दस रोज़ हो सके तो करीब से देखिएगा। इन दस दिनों के इतिहास को झाँक कर देखिये,बहुत कुछ मिलेगा।ज़िन्दगी का पूरा फ़लसफ़ा इसी में गुँथा हुआ है। छः महीने के बच्चे से ज़ईफ़ तक की शहादत में इस्तेमाल हुई राजनीति और कूटनीति कितना कुछ समेटे है। मीर,दबीर,इस्मत,राही सब तो इन दस दिनों को लिख चुके हैं जिन्हें सुन सुन कर हर हस्सास दिल रो दे मगर मेरा मकसद तो यह है की इन दस दिनों को अपनी ज़िन्दगी का सबक बना लिया जाए ।

सच के लिए क़ुर्बानी इतिहास में भरी पड़ी हैं मगर कहीं कोई पन्ना नही मिलता जहाँ ईश्वर के सत्यमार्ग में पूरा का पूरा परिवार लड़ जाए और उस लड़ाई में सबसे ज़्यादा शहादत के बावजूद तारीख़ में हमेशा हमेशा के लिए ज़िंदा हो जाए।

मैं इन मोहर्रम को नही कहता की तुम मुसलमानो की नज़र से देखो। मैं हरगिज़ नही कहता की कर्बला को शिया सुन्नी की नज़र से देखो।इसे बहुत दूर से अपने खुद के दिल पर अपना काबू पाकर देखो की कैसे सिर्फ़ 72 लोग हज़ारों के लश्कर पर भारी पड़ गए।यह सब शहीद हुए मगर दूर कर्बला के रेगिस्तान से इनकी शहादत कैसे हमारे हरे भरे बागो, मैदानों, पहाड़ों तक जा पहुँची। कैसे कर्बला के बाद कर्बला की दास्ताने हज़ारों मील दूर, बीसों पीढ़ियों तक नीचे पहुँचती चली गई ।

सच पूछो तो यह एक आंदोलन था।इमाम हुसैन का आंदोलन, सत्य के लिए असत्य के विरुद्ध एक आंदोलन। अपने घर की तमाम शहादतों के बाद जब बीबी ज़ैनब नेज़ो पर टँगे अपने भाई भतीजो के सर को देखती हैं, तब उनकी कैफ़ियत को देखना,जिसने अपने हर एक को रेगिस्तान में शहीद होते देखा हो, उसके दिल को महसूस करना।इस सबके बावजूद जब उनके सर से दुपट्टा खींच, नँगे सर उन नेज़ों में अपने शहीद रिश्तों के साथ कर्बला से ले जाया जाता है, उनके उस वक़्त के तारीख़ी काम को समझना। मुझे पता है की कर्बला रुलाती है, ज़ार ज़ार रुलाती है मगर कर्बला सबक भी देती है।

कर्बला दुनिया का वह पहला आंदोलन था जिसे एक औरत ने सम्भाला था । रेत में सने अपने रिश्तों के ख़ून को देखकर लौटते वक़्त वह बीबी ज़ैनब ही तो थीं जिन्होंने मदीना पहुँचते पहुचँते सारी अवाम के दिल में हुसैन की शहादत की आग दहका दी थी । दूर रेगिस्तान में जो बेइंसाफी हुई थीं, बच्चों को प्यासे गले तीरों से छलनी किये गए थे, वह बीबी ज़ैनब ही तो थीं जो पूरी अवाम के सामने ले आइन । उस दर्द को हर दर्दमंद तक पहुँचा दिया ।एक बार उनके ग़ैर मामूली तरीके को देखना।

कर्बला और यह मोहर्रम हमे हमेशा याद दिलाएगा की ज़ुल्मी चाहे जितना बड़ा हो,चाहे जितना खूँखार हो और हम चाहे जितने कम हों, अगर ईमानदारी से उसके खिलाफ हैं तो उसका नेस्तनाबूद होना तय है। मोहर्रम के इन दस दिनों को दिल की तमाम गांठो से इतर देखिये,आपको एक रास्ता दिखाएगा। मैं बहुत नही लिखूंगा, वह नही लिखूंगा जो पहले लिखा जा चुका है, उसे नही बताऊंगा जो वहाँ हुआ था, आपको रुलाउंगा भी नही बस इतना कहूँगा जब सच के लिए झूठ के आगे झुकने की मजबूरी आन पड़े तो कर्बला को देखना, सर कटकर भी बहुत बार सच को ज़िंदा रखता है।

बस यह तय कर लेना की सच ज़्यादा ज़रूरी है या आप। जिस दिन यह फैसला कर लेंगे उस दिन कर्बला का ताबीज़ पा जाएँगे।

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