Monday, August 2, 2021

 

 

 

जाओ, मैंने तुम्हें माफ किया, पर अल्लाह कब माफ करेगा, मुझे मालूम नहीं….

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मुझे पुरानी चीजें इकट्ठी करने का बहुत शौक है। आज भी मैंने मेरी पुरानी किताबें, कलम, सिक्के और डायरियां बहुत संभालकर रखी हैं। मुझे यह शौक मेरे नाना स्व. श्री भगवानाराम शर्मा से मिला। वे बहुत प्यारे इन्सान थे जिन्हें मैं रोज याद करता हूं। उनके पास पुरानी मालाएं, पूजा के आसन, पंचांग और किताबों का संग्रह हुआ करता था।

एक बार मैं गर्मियों की छुट्टी में ननिहाल गया तो उनकी अलमारी में कुछ पुरानी धार्मिक पत्रिकाएं मिलीं। नानाजी की अलमारी में रखी हर चीज हम बेखौफ होकर ले सकते थे, क्योंकि वे कभी हम पर गुस्सा नहीं करते थे। मैंने एक पुरानी-सी पत्रिका ली और पढ़ने लगा। पन्ने पलटते हुए मेरी नजर एक खास लेख पर गई। उसमें विधवाओं के कर्तव्य बताए गए थे। लेखक कोई बाबाजी महाराज थे।

उन्होंने विधवाओं के कर्तव्य कुछ इस प्रकार बताए थे- जो महिला विधवा हो जाए उसे यही नियति मानकर विधवा के रूप में जिंदगी बितानी चाहिए। हमेशा सफेद कपड़े पहने। भूख से बहुत कम खाए। शरीर को ज्यादा से ज्यादा कष्ट दे क्योंकि इसी से उसकी शुद्धि होगी। बिस्तर पर न सोए, संभव हो तो भूमि पर या चटाई आदि बिछाकर सोए।

कभी किसी किस्म का कोई शृंगार न करे। दूसरे विवाह के बारे में सोचे भी नहीं। घर से बाहर न जाए। किसी भी शुभ कार्य में भाग न ले। सुबह-सुबह लोगों को अपनी शक्ल न दिखाए वगैरह-वगैरह।

पूरा लेख पढ़ने के बाद मेरे दिलो-दिमाग में कई खयाल आने लगे। एक बार मन हुआ कि नानाजी से ही इस बारे में पूछ लूं, लेकिन फिर हिम्मत नहीं हुई। सोचा, ये बुजुर्ग हैं और मैं मामूली छोकरा! इस विषय पर इनसे बात करना ठीक नहीं होगा, इसलिए मैंने कुछ नहीं पूछा।

आज जब मैं उन लेखक महाशय की ये पंक्तियां याद करता हूं तो हंसी आती है और गुस्सा भी। अगर वे मेरे सामने आ जाएं तो ऐसे-ऐसे सवाल करूं कि हुजूर रोने ही लग जाएं। खैर … मुझे यह बात समझनी चाहिए कि जब उन्होंने वह लेख लिखा था तो वह जमाना चाहे सौ साल पुराना रहा हो लेकिन उनकी मान्यताएं हजारों साल पुरानी थीं। अब बीती बातों पर क्या लड़ना! जाओ बाबा जाओ, हमने आपको माफ किया। पर भगवान कब माफ करेगा, मुझे मालूम नहीं।

आज (1 मार्च 2017) सुबह जब मैं गूगल पर हिंदी खबरें पढ़ रहा था तो एक खबर ऐसी मिली जिसे पढ़कर मैं इस घटना का जिक्र करने को मजबूर हो गया। वह खबर कोहराम डॉट कॉम नामक वेबसाइट पर थी।

बात कुछ यूं है कि मणिपुर में विधानसभा चुनाव का महौल है। हर उम्मीदवार अपनी जीत के लिए प्रचार में जुटा है। इन्हीं उम्मीदवारों में से एक हैं- नाजिमा बीबी। वे इरोम शर्मिला की पार्टी से चुनाव लड़ रही हैं। दसवीं तक पढ़ी हैं और पांच बच्चों की मां हैं। यही नहीं, मीडिया के मुताबिक वे मणिपुर में विधानसभा चुनाव लड़ने वाली पहली मुस्लिम महिला हैं।

लेकिन बात सिर्फ इतनी-सी नहीं है। उनके इलाके में कुछ मौलवियों को यह कदम अच्छा नहीं लगा, लिहाजा नाजिमा के खिलाफ फतवा आ गया है कि अगर चुनाव लड़ा तो कब्र के लिए भी जगह नसीब नहीं होगी। बहरहाल नाजिमा एक मजबूत चट्टान की तरह अपने फैसले पर अडिग हैं। मैं दिल से उन्हें मुबारकबाद देता हूं। आगे हार-जीत उनकी किस्मत।

मैं कल्पना कर रहा हूं कि सौ साल बाद जब कोई बच्चा इस खबर को पढ़ेगा तो इन मौलवियों के बारे में क्या सोचेगा! यह तो तय है कि मैं उस जमाने में मौजूद नहीं रहूंगा लेकिन उस दौर में कोई लेखक इस घटना का जिक्र ऐसे करेगा-

हम भारतीयों के पुरखे बहुत अजीब हुआ करते थे। उन्हें औरत दो ही जगहों पर अच्छी लगती थी, या तो रसोई में ताकि वह उनके लिए लजीज खाना पकाए या उनकी बांहों में ताकि वे उनसे मीठी-मीठी बातें करें। जब वह सियासत में जाती थी तो मर्दों का खून खौलने लगता था। एक बार कुछ मौलवी साहेबान ने इस वजह से औरत पर फतवा जारी करवा दिया क्योंकि वह चुनाव लड़ना चाहती थी।

उन्होंने ऐलान किया कि इस औरत को मौत के बाद दो गज जमीन भी नहीं देंगे। इतने छोटे दिल के लोग थे। हुजूर, आप कौन होते हैं मौत और कब्र का फैसला करने वाले? न तो आपने मौत बनाई है और न धरती।

अगर आज वे मेरे सामने आ जाएं तो ऐसे-ऐसे सवाल करूं कि उलटे पांव भाग जाएं। अच्छा हुआ जो उनसे जान छूटी। खुदा का शुक्र है कि ये 2017 नहीं बल्कि 2117 का साल है। अगर वे लोग हमारे जमाने में आ जाएं तो पूरी दुनिया को सर्कस ही बना डालें। जाइए मौलवी साहेबान, जाइए! हमने आपको माफ किया। पर अल्लाह कब माफ करेगा, मुझे मालूम नहीं।

– राजीव शर्मा (कोलसिया) –

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