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आज बात छिड़ ही गयी है तो इस मौके का फ़ायदा उठा कर मैं कुछ और भी कह ही देता हूँ पिछले साल अफ़्रीकी देश घाना के लोगों ने महात्मा गांधी की मूर्ति लगाने का विरोध किया था, उनका कहना था के गांधी जी नस्लवादी और जातिवादी सोच के आदमी थे इसलिए उनकी प्रतिमा नहीं लगनी चाहिए.

उस घटना में गांधी जी की अंतर्राष्ट्रीय नस्लवादी होने की जो छवि बनी तो गांधी जी के बचाव में और उनकी नस्लवादी छवि को तोड़ने के लिए एक मीडिया संसथान ने भी एक लेख प्रकाशित किया. अब एक दूसरी घटना देखिए उसी मीडिया संस्थान ने अभी कुछ दिन पहले सर सय्यद जयंती के मौके से एक लेख प्रकाशित किया जिसमे सर सय्यद को जातिवादी और ब्राह्मणवादी बताया गया है.

एक ही न्यूज़ संस्था है उसका दो अलग अलग बर्ताव – 

जब गांधी जी पर जातिवादी होने का इलज़ाम लगाया जाता है तो यही न्यूज़ संस्था गांधी जी के बचाव में खड़ा हो जाता है और जब सर सय्यद की बात आती है तो यही न्यूज़ संस्था खुद थाली में परोस कर लोगों को ये बताता है की सर सय्यद जातिवादी थे.

ये सिर्फ एक ही मीडिया संसथान की बात नहीं है बल्कि ये लगभग प्रत्येक सेकुलर सोर्स का स्टाइल है जिसको पकड़ना आसान नहीं होता है, सवाल उठता है की आखिर ऐसा रवैया क्यों है ?

ऐसा इसलिए क्योंकि किसी क़ौम पर जब हुकूमत करना होता है तो उसे एहसासे कमतरी में मुब्तला करना ज़रूरी होता है और ये रवैया उसी एहसासे कमतरी को पैदा करने वाले सेकुलर मॉडल का हिस्सा है. सर सय्यद को जातिवादी बताना, मौलाना आज़ाद को उनकी जयंती पर भूल जाना,  और इसके ठीक विपरीत जाकर गांधी, नेहरू और दूसरे सेकुलर लीडरों का महिमामंडन करना, उनपर लगे हर छोटे से छोटे आरोपों का बचाव करना.

मुस्लिम समुदाय के लीडरों को भुला देना या विवादित बना देने की कोशिश इसलिए की जाती है ताकि उनके अपने समुदाय के लोग उन लीडरों का नाम लेने और उन्हें याद करने में असहज हो जाएँ, उन पर लगे आरोपो के प्रोपगेंडे की वजह से खुलकर उनसे अपने आप को जोड़ने में शर्म महसूस करें और गांधी नेहरू पर लगे छोटे से छोटे आरोपों का बचाव इसलिए करते हैं, उनका महिमामंडन इसलिए करते हैं ताकि उन्हें सर्वमान्य बनाया जाए और मुस्लिम समुदाय भी उन्हें ही अपना मसीहा मानने लगे.

इन बातों का मनोवैज्ञानिक असर ऐसा होता है की मुसलमान के पास अपना कोई आइडियल नहीं बचता और वो आत्मविश्वास विहीन क़ौम बन जाता है और जब कोई क़ौम आत्मविश्वास विहीन बन जाए तो उसे ग़ुलामी की आदत हो जाती, उसपर हुकूमत करना आसान हो जाता, संसाधनों में से उनके जायज़ हिस्सों से वंचिय करना आसान हो जाता और यही मुसलमानो के साथ हुआ और हो रहा है.

बल्कि आज़ादी के बाद से अलग अलग तरीक़ों से यही हो रहा है मुसलमानो के इतिहास को खुरच खुरच कर मिटाया गया, उनकी पहचान को पॉपुलर कल्चर से निकाला गया, उनके आइकॉन को विवादित बनाया गया और फिर सेकुलर आइकॉन को उनकी जगह स्थापित किया गया.

आज़ादी के बाद से ही ज़बरदस्त प्रोपगेंडा करके मुसलमानो को बंटवारे का ज़िम्मेदार ठहराया गया और एक पूरी क़ौम को एहसासे कमतरी और गिल्ट में मुबतला किया गया ये सब एहसासे कमतरी के उसी सेकुलर मॉडल का हिस्सा है. एहसासे कमतरी के इस मॉडल का खड़ा करने का सारा काम सेकुलरों ने किया है और फिर इसके सहारे से मुसलमानो को अपना बंधुआ मज़दूर बनाया है.

मुसलमानो को एक बेहतर भविष्य पाने के लिए सेकुलरों द्वारा बनाए गए एहसासे कमतरी के इस मॉडल को ध्वस्त करना ही होगा.

जनाब मुहम्मद इकबाल की फेसबुक पोस्ट से

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