ध्रुव गुप्त (लेखक पूर्व आईपीएस हैं)

भारतीय उपमहाद्वीप में आजादियों के जश्न शुरू हो गए हैं। चौदह अगस्त को पाकिस्तान की यौमे आज़ादी है और पंद्रह अगस्त को भारत का स्वतंत्रता दिवस। ये दोनों ही आज़ादियां धर्म के आधार पर देश के विभाजन, हिन्दुओं, मुसलमानों, सिखों की असंख्य लाशों और यातनाओं की बुनियाद पर खड़ी हुई थीं।

आज़ादी के इकहत्तर साल लंबे सफ़र में दोनों देशों ने जो कुछ हासिल किया है, वह है-भूख, महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, स्त्री-उत्पीड़न, सामाजिक-आर्थिक-लैंगिक असमानता, मज़हबी कट्टरता, अनगिनत दंगे, फिरकापरस्ती, हथियारों की अंधी दौड़, आतंक के कारखाने, युद्ध-लोलुपता और भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्थाएं। दोनों देशों में प्रगतिशीलता से रूढ़िवादिता की उल्टी यात्रा ज़ारी है।

उधर धर्म आधारित पाकिस्तान मज़हबी कट्टरता, आतंकवाद, भारत के प्रति जन्मजात नफ़रत और अपने अंतर्विरोधों की वज़ह से आज दुनिया का सबसे खतरनाक मुल्क बन चुका है। उसकी गृह नीति मुल्ले-मौलवी तय करते हैं, विदेश नीति सेना और अर्थनीति चीन और अमेरिका । इधर सर्वधर्मसमभाव और उदारता की गौरवशाली परंपरा वाला भारत भी धार्मिक कट्टरपंथियों और उनके पोषक चंद धार्मिक-राजनीतिक संगठनों की लगातार कोशिशों से पाकिस्तान के रास्ते चल निकला है। सहिष्णुता की परंपरा नष्टप्राय है।

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धर्मों और जातियों के बीच नफ़रत और अविश्वास इतना बढ़ा है कि भौगोलिक तौर पर न सही, भावनात्मक तौर पर यह राष्ट्र कई भागों में विभाजित हो चुका है।

इक्कीसवी सदी के इस वैज्ञानिक युग में भी हम भारतीय धर्म, धर्मांतरण, जाति, हिज़ाब, तीन तलाक, मंदिर-मस्जिद, संघ की शाखाओं, उन्मादी गोरक्षकों, दाढ़ी-टोपी, तिलक-जनेऊ, मुल्ले-मौलवियों, साधुओं-साध्वियों, गाय-गोबर-गोमूत्र में अपना भविष्य खोज रहे हैं। दंभ, मूर्खताओं और रूढ़िवादिताओं की गलाकाट प्रतियोगिता में एक दूसरे को पीछे छोड़ने की अथक कोशिशों में लगे देशों को उनकी यौमे आज़ादी की अग्रिम शुभकामनाएं, एक शेर के साथ !

वहां से आप जहां निकले, जहां हम आए
धूप ही धूप थी, कोई शज़र नहीं था कहीं !

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