मनुष्य जीवन बिताने के लिए विभिन्न स्रोतों और कामों को अपनाता है, जो अगर शरई और नैतिक सीमा में हो तो निश्चित रूप से प्रशंसनीय है लेकिन अगर डगर से हटकर हो तो यही काम और सूत्र अपराध बन जाते हैं, उदाहरण के तोर पर इस्लामी सिच्छा के हिसाब से व्यापार एक सुन्नत प्रक्रिया है, अगर पैग़म्बर (ﷺ) के तरीकों पर चल कर उसे किया जाए तो न केवल यह कि इससे व्यापार और माल बढ़ता है बल्कि इससे विकास भी होता है। इसके विपरीत अगर व्यापारी बे राह रवि का शिकार हो जाए तो अंततः इस व्यापार का इसके जान के लिए बवाल बनना तय है। व्यापार के जहां बहुत सारे इस्लामी शिष्टाचार हैं, वहीं उनमें से एक शिष्टाचार तय समय में राशि का भुगतान है।

लेकिन अफसोस आज व्यापार की दुनिया में वादा खिलाफी और धोखा एक सामान्य बात है, जिसकी वजह से बेबरकती और रिश्तों में गिरावट की शिकायत आम है। एक तरफ अगर हम ने किसी से निश्चितकालीन समय में कर्ज भुगतान का वादा कर रखा है तो हमारे लिए वादा निभाना असंभव नहीं तो मुश्किल ज़रूर होता है, वहीं दूसरी ओर अगर हमसे किसी ने हम से निश्चितकालीन समय में राशि भुगतान का वादा कर रखा है तो हम इसमें जरा सी भी देरी को अपने लिए पीड़ा का कारण समझते हैं और सामने वाले के साथ जो व्यवहार हम अपनाते हैं उसका नैतिकता के अध्याय से दूर का भी वास्ता नहीं होता। हम मुहम्मद मुस्तफा (ﷺ) की नैतिक शिक्षाओं से कितने दूर हैं उसका एहसास हमें निम्नलिखित कहानी से हो जाएगा.

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”अब्दुल्लाह इब्ने अबी अल-हमसाय बयान करते हैं कि मैं ने एक बार मुहम्मद मुस्तफा  (ﷺ) के साथ एक मामला किया  उनको पैग़म्बरी मिलने से पहले, मेरे ज़िम्मे कुछ भुगतान करना बाकी रह गया। मैं ने आप (ﷺ) से निवेदन किया कि मैं अभी लेकर आता हूँ, संयोग से घर जाने के बाद अपना वादा भूल गया तीन दिनों के बाद याद आया (कि में आप से वापसी का वादा करके आया था)। (याद आते ही) तुरंत वादा की जगह पर पहुंचा तो आपको उसी स्थान पर (प्रतीक्षा करता) पाया। आप (ﷺ) ने (केवल इतना) कहा कि युवा! आप ने मुझे परेशान किया। तीन दिन से इसी जगह तुम्हारा प्रतीक्षा कर रहा हूं।”

गौर करें कि आप (ﷺ) ने तीन दिन तक धैर्य के साथ एक क़र्ज़दार का इंतजार किया और मामूली वाक्यांश पर अपनी बात समाप्त कर दी कि ” आप ने मुझे परेशान किया, तीन दिन से इसी जगह पर तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।” आज अगर कोई एक घंटा इंतजार कर लेता है तो झगड़े का बाजार गर्म हो जाता है और बात संबंध खराब होने तक पहुंच जाती है।

इन जैसे हालात में हमारे लिए दो बातों का ध्यान रखना बेहद उपयोगी और संबंधों को दुरुस्त रखने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

(1) जहां तक हो सके हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि हम तय समय में वादा निभाएँ,  इस का निर्देश भी हमें पैग़म्बर (ﷺ) की शिक्षाओं में जगह जगह मिलता है।

(2) अगर हम से किसी ने निश्चित समय पर राशि देने का वादा कर रखा है और वह किसी वजह से समय पर भुगतान करने में असमर्थ रहता है तो हमें आपे से बाहर नहीं होना चाहिए जैसा की मोहम्मद (ﷺ) ने हमें व्यावहारिक रूप से यह करके दिखला दिया है। वास्तव मैं मध्यम रास्ता हमारी चौतरफा विकास और सफलता की गारंटी है।

इस वाकिये को ध्यान में रखते हुए मोहम्मद (ﷺ) को गाली देने वालों और बुरा भला कहने वालों को खुद पता चल जाएगा कि वे इस महान व्यक्तित्व पर उंगली उठा करके कितना घिनौना  अपराध कर रहे हैं। और मुसलमानों को खुद का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए कि वह आप (ﷺ) की शिक्षाओं के कितने करीब हैं! मैं शांति के अग्रदूतों से ये कहूँगा कि वे कहां भटक रहे हैं,    आईं और आप (ﷺ) की इस जैसी शिक्षाओं से शांति के सिद्धांत सेट करें।

(लेखक मरकज़ुल मआरिफ़ एजुकेशन एंड रिसर्च सेण्टर मुम्बई मैं लेक्चरर और ‘ईस्टर्न क्रिसेंट’ मैगज़ीन के असिस्टेंट एडिटर हैं।)

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