Sunday, September 19, 2021

 

 

 

‘पहली बार उद्योगपतियों के बजाय राजनीति के केंद्र में किसान और गांव’

- Advertisement -
- Advertisement -

मुलायम मुख्यमंत्री थे जोड़-तोड़ की सरकार थी, कन्या विद्या धन योजना लेकर आये प्रत्येक बारहवीं पास छात्रा को बीस हज़ार बंटने लगा, उसके बाद कन्या चाहे उन रूपयों से शादी कर ले या फिर आगे पढ़ाई करे उसकी मर्जी । फिर उसके बाद बसपा पूर्ण बहुमत से आई थी दौलत की बेटी मायावती दोनों हाथों से खजाना लूट रही थी । मायावती ने आते ही सबसे पहले सपा सरकार की तमाम स्कीमों को तमाम प्रोजेक्ट्स को ठंडे बस्ते में डाल दिया जिनमें कन्या विद्या धन भी था उसे भी बंद कर दिया । 5 साल तक मायावती सत्ता में रही कभी हाथियों की मूर्ति बनाती रही, कभी अपनी, कभी अंबेडकर की ।

उसके बाद सत्ता में लौटने को आतुर सपा ने भी ख़ूब लोकलुभावन नारा दिया बेरोजगारी भत्ता का, सभी युवाओं को लैपटॉप बांटने का, मुसलमानों को 18% आरक्षण देने का, जेल में बंद तमाम मुस्लिम नौजवानों के ऊपर से आरोप वापस लेने का । जिसमें से लैपटॉप बांटने की योजना अखिलेश सरकार ने आगे बढ़ाई और यह योजना कामियाब भी रही, उसके साथ में अखिलेश यादव ने विकास के कुछ अच्छे कार्य भी किए जो इसके पहले उनके बाप मुलायम के या मायावती के या कल्याण सिंह तथा राजनाथ के कार्यकाल में नहीं हुई थी । मगर अखिलेश का यह विकास कार्य जनता को इतना पसंद नहीं आया जितना मुफ्त में पंद्रह लाख मिलने का वादा पसंद आया ।

लोकसभा चुनाव में मोदी ने प्रत्येक परिवार को पंद्रह लाख देने का वादा किया उनके कुछ बगल बच्चा लोगों और संगठनों ने डॉलर को ₹40, पेट्रोल को डीजल को ₹25 में उपलब्ध कराने के दावे किए । इसके अलावा राम मंदिर बनाने और मुसलमानों गैस चैंबर में डालने की उम्मीदें जनता ने ख़ुद ही पाल रखी थी । नतीजा यह रहा कि लोकसभा में सपा, बसपा, कांग्रेस का सूपड़ा यूपी से पूरी तरह साफ हो गया । उसके बाद जब यूपी में विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा ने भी किसानों की कर्ज माफी का नारा दिया जिसके दम पर भाजपा को पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ और उसके बाद कर्ज माफी का खूब ड्रामा भी किया गया, कुछ किसानों के कर्ज माफ भी हुए ।

कहने का तात्पर्य यह है कि कर्ज माफी का ड्रामा देश हित में हो या ना हो लेकिन राजनीतिक पार्टियों के हित में जरूर है । और आज कांग्रेस ने कर्ज माफी का जो दांव चला है वह कोई नया नहीं है इसकी शुरुआत भी हाल फिलहाल के वर्षों में यूपी में भाजपा ने ही की थी । हालांकि भाजपा से पहले भी यूपीए के पहले कार्यकाल में लगभग 70000 करोड़ के कर्ज माफ किया गया था । मगर उसके बावजूद मनमोहन ने काफी चतुराई से इकोनामी को संभाले रखा और जब दुनिया ग्लोबल मंदी से जूझ रही थी तब भी देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर चल रही थी । और वेसे भी अर्थव्यवस्था पटरी पर चले न चले परंतु जब उद्योग पतियों को हज़ारों करोड़ की टैक्स छूट जी जा सकती है, जब अनिल अंबानी जैसे बड़े कर्जदारों को दुबारा से कर्ज और काम दिया जा सकता है, डिफॉल्टरों का कर्ज माफ किया जा सकता है तो सबसे अधिक रोजगार पैदा करने वाले किसानों का कर्ज क्यूँ नहीं माफ हो सकता ?

छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश के किसानों की कर्ज माफी भले राजनैतिक चाल हो पर मैं इस कदम की सराहना करता हूँ । अगर यह राजनीति है तो मेरे ख़याल से इससे अच्छी राजनीति नहीं हो सकती जहाँ हासिए पर खड़े किसानों को सीधे फायदा मिले । क्यूँ कि जब से आर्थिक उदारीकरण का दौर आया है सरकारों का सारा ध्यान उद्योग पतियों, शहरों और चमक दमक तक ही सीमित रहा है । मेरी समझ के अनुसार ऐसा पहली बार हुआ है जब राजनीति के केंद्र में किसानों और गांवों को मौका मिला है । उम्मीद है यह ट्रेंड लोकसभा चुनावों में भी बरकरार रहेगा मगर डर है कि सत्ता पाने के लिए राजनैतिक दल सिर्फ वादे ही न करें बल्कि सत्ता में आने के बाद वादों को पूरा भी करें और वो भी सिर्फ काग़ज़ों पर नहीं बल्कि हक़ीकत में ।

नोट- ये पोस्ट वक़्त और हालात मुताबिक है इसलिए जुम्मन ये न समझें कि मैने कांग्रेस जॉइन कर लिया है । मेरा सवाल आज भी वही है कि क्या कांग्रेस उनपर कोई कार्यवाई करेगी जिनसे हमें डराती है, लकड़ी की चाभी से ताला खुलने वाली थ्योरी का पता लगायेगी, व्यापम का राज फास करेगी या नहीं ?

अबरार खान की कलम से निजी विचार….

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot Topics

Related Articles