तारिक अनवर चंपारणी
बीच मैदान में सज़दा कर रहे यह दोनों खिलाड़ी कोई पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी नहीं बल्कि फुटबॉल विश्वविजेता फ्राँस के खिलाड़ी है। महज यह एक तस्वीर नहीं बल्कि एक तस्वीर में तीन अलग-अलग मैसेज छुपा है।
एक, नस्लीय भेदभाव के शिकार ब्लैक अफ्रीकन लोगों ने फ्राँस की ईज़्ज़त को क़ायम रखा। दूसरा, रूस, जहाँ फुटबॉल विश्व कप खेला जा रहा था, यह वह देश था जिसने इस्लाम से सबसे अधिक नफ़रत किया है। कम्युनिस्ट युग मे लगभग 83% मस्जिदों पर ताला जड़ दिए गए थे और अल्लाह के सामने सज़दा करने से रोकने का प्रयास किया गया था।
आज उसी रूस के एतिहासिक मैदान में हज़ारों दर्शकों की मौजूदगी एवं करोड़ों फुटबॉल प्रेमियों के सामने मैदान के बीचों बीच नस्लीय भेद के शिकार अफ्रीकन मुसलमानों ने अल्लाह के सामने सज़दा किया और पहली बार इस सज़दे पर लोग गौरवान्वित महसूस कर रहे थे।
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तीसरा, फ्राँस, जो कि इस्लाम विरोधी देशों की श्रेणी में शामिल है, उसके ही खिलाड़ियों ने एहसास दिलाया कि उसकी जीत में उसके अक़ीदा, अल्लाह सबसे बड़ा है, का कितना अहम योगदान है। अल्लाह की लाठी में आवाज़ नहीं होती है।