जब का’बा करीम व मदीना मुनव्वरा पर हमला करने युरोप से आठ लाख का लश्कर रवाना हुआ। रोमन के किंग ओगस्टस् की अगुवाई में ब्रिटिश के प्रिन्स फिलीप्स और यूरोप की छोटी बड़ी रियासतो एक थी। जिसके लिए ईसाइयों के हर फिर्के के चर्च के पादरी और यहुदी जागीरदारो ने अपने खज़ाने खोल दिए।

युरोप की हर नसल के बहादुर जांबाज़ जंगजु लडाकु जवानो की भर्ती इस सेना की गई थी। हथियारों के लिए लोहा, तांबा, शीशा की बड़ी-बड़ी भट्टीयां सुलगाइ गई, तलवार भाले और तोपों के कारखाने बने। एक हाथ में आग दुसरे हाथ में क्रोस लेकर मरने तक लड़ने की क़सम खाने वाले नाइटस की अगुवाई रेनोल्डस कर रहे थे। इस नाइटस लश्कर की सिर्फ आंखें नज़र आती थी बाक़ी मुकम्मल बखतर से पेक लोहे का लिबास जिस पर तलवार, भाला और तीर के वार-बेकार होते।

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पहला टार्गेट मस्जिदुल अक्सा और फिर उसके बाद मदीना मुनव्वरा साथ ही मक्का मुकर्रम पर हमला करने की गेम प्लान था। इसके लिए दिलकश आवाज़ वाले मर्दो औरतें बहादुरी के तराने गुनगुनाते थे।  पादरी व पोप की तक़रीरे शहादत पर जन्नत की और जीत पर नस्लो की आज़ादी का डोज़ देते रहते।  

इधर मुसलमान बेखबर और गाफिल थे। मुसलमानों में नज़रीयाती फसादो इन्तेशार फैलाने में रेनोल्डस के जासूसो ने अपना काम कर लिया था। मुसलमान हूकमरान गवर्नरो के हरम में खुबसुरत नवजवान यूरोपी लड़कीयां सियासी कामों को बेडरुम से अपनी मरज़ी के कावीशे कर लेती। उलमा को फुरूही मसाइल की बहस में उलझाया गया। उलमा को अवाम के इस्लाह से बेपरवाह कर इल्मो तहक़ीक़ की अनानीयत में उलझा दिया।

जवानों को खेल तमाशे, रोमान्स व इश्क जैसे लहव कामों में लगा दिया। जुआ और मोशीक़ी  को ऐसे आम कर दिया कि जैसे यह कोई गुनाह नहीं। मुसलमानों के दिलों से जज़्बाए जिहाद ख़त्म करने के लिए पीर, सुफी, मशाइख़ व ख़ानकाहो को खरीदा गया। जो क़िस्से कहानी के ज़रीये समझ़ाते थे कि “इस्लाम अमन का दर्स देता है।” यह सुफी बाबा लोग मुसलमानों को दुर्वेश फकीर बनाकर पहाड़ की खो, गुफा और जंगल में जाकर इबादतो रियाज़त व चिल्लाकशी के लिए ज़हन बना रहे थे।

यह सुफी बाबा लोगों ने जज़्बाए जिहाद के साथ जज़्बाए रद्दे कुफ्र भी ख़त्म करने के मिशन में लगे हुए थे। जिसमें एक सुफी शयख-ए-हसीसैन जो बाक़ायदा चरस-गंजा-अफीम जैसे नशावर अशया को हलाल व सवाब बनाकर फैला रहा था।

आज 21वीं सदी में बयतुल मुक़द्दस पर यहुदीयों का क़ब्ज़ा है। फिलीस्तीन पर नाजाइज़ इसराइल देश बना कर भी हवस पुरी ना हुई जो रोज़ाना फिलीस्तीन की ज़मीन खा रहे है। ग्रेटर इसराइल के मिशन के साथ पड़ोस के 8 मुसलमानों के मुमालिक को सियासी कमजोर कर दिया। मरहूम सद्दाम हुसैन शहीद के बाद अब कोई मरदे मुस्लिम आज़ाद मस्जिदे अक़्शा का ख़्वाब भी नहीं देखता।

सऊदी अरब तो पहले से ही इसराइल दोस्त है जिसने मई 2018 में तबुक शहर की ज़मीन इसराइल को तोहफा दिया। सऊदी अरब के हाकिमो के नाम और लिबास मुसलमानों के है बाक़ी सब इख़तियार तो व्हाइट हाउस अमेरिका के कन्ट्रोल में है जो जब चाहे तब चहेरे बदल सकता है। जिस को सहाफी जमाल खशोग्गी ने एक्सपोज  किया और जान गवानी पड़ी।

मुसलमान नज़रीयाती जंग में घेराबंद है। एक हो जाओ के नारे लगते है लेकिन कोई UNIFORM CAUSE नहीं फिर एक कैसे हो? मज़हबी, समाजी, सियासी, फिक़ही,  मुल्की,  नसबी,  नसली व मआशी जैसे नज़रीयाती इख़तेलाफ के गहरे कुएँ में फंसा हुआ है मुसलमान।

मुसलमानों को अमली निकम्मा बनाने के लिए आज फिर जाली-सुफी मैदान में आ गए। क्या जाली-सुफीयो के खानदान में प्रोपर्टी के दावों पर कोर्ट में केस नहीं है? अलग अलग जगहो और सरकारी कोन्फरन्स में “आतंकवाद का इस्लाम कोई लेना देना नहीं” कहकर खुद को शक़ के दायरे में डाल रहे हैं। 

लाल, पीला, भगवा, काला व हरा रंग का युनिफोर्म बनाकर मुरीदो को इजमा उम्मत से अलग कर दिया। अब यह अपनी पहचान सनाख्त इस्लाम और मुसलमान से नहीं बल्कि जो तो ग्रूप से करते हैं। जाली-सुफी की बात सुनो तो नफ्स परस्ती और अनानीयत के सिवा कुछ नहीं। क़ौम को बुज़दिल और बेशऊर बना रहे हैं यह जाली-सूफी।

जाली-सुफी हुकूमतो के दरवाज़ो के शाही दरबारी भिकारी बने हुए नज़र आते हैं। कभी  ईरान में तो कभी व्हाइट हाउस की फैरवैल पार्टी में तो कभी मोदी के दरबार दुम हिलाते तो कभी जोर्डन के महल में मुजरा करते दिखाई देते हैं।

क्या सहाबा किराम से बढ़कर भी कोई मुसलमान हो सकता है? नहीं हरगिज़, नामुमकिन है तो क्या रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम के सहाबा किराम रिदवानुल्लाही अजमइन को नहीं पढ़ा???

एक नंबर मुसलमान तो सिर्फ सहाबा है। एक नंबर अवलिया तो सिर्फ सहाबा है । सहाबा किराम जैसी दीने इस्लाम की समझ किसी को भी नहीं। सहाबा किराम जैसा कोई आशिक़े रसूल  सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम नहीं सहाबा किराम ने दुनिया के तीन जज़ीरे एशिया, यूरोप और अफ्रीका में इस्लाम की फतह के झंडे गाड़ दिये।

सहाबाए किराम में दीन के साथ दुनिया के कमाल भी भरपूर थे उन्होंने मुअल्लीम, मुदर्रीस, मुसन्नीफ, मुफस्सीर,  मुफक्किर,  मुस्लेह,  मुबल्लीग़,  मूजाहिद,  मुनाज़िर,  मुक़र्रीर,  मुहक़ीक़, फक़ीह,  फाज़िल, आलिम,  क़ारी,  हाफिज़,  मुअर्रीख़,  फलसफी,  तबीब,  हकीम,  ताजिर, मुफस्सल, मुहनदीस, मूदीर, मुख़तत्, मरब, क़ाश्तकार, मवेशी,  सिनायी, रियादी, मुक़ाविल, हाकिम, क़िमीयागर, मुआमिरी, सौदागर व मुहतरिफ, जैसे फरीज़े अंजाम दिये।

तो फिर क्या शख्सियत परस्ती की बेड़ीयां तोड़कर अहकामे इलाही क़ुरान और सुन्नते रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलयहि वसल्लम को ताबे हो जाया जाए??!!!

‘तरीका ए मुस्तफा छोड़ना है वजहे बर्बादी, इसीलिए दुनिया में क़ौम हुई बेईक़तेदार अपनी’

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