तारिक अनवर चंपारणी

तुर्की द्वारा बनायी गयी सीरियल दिरिलिस अरतगल पर कार्ल मार्क्स के उर्दुनामधारी अनुयायियों को बहुत तकलीफ हो रही है। दिन-रात इंक़लाब-इंक़लाब चिल्लाने वाले यह लोग एक छोटे से काई क़बीला को एक साम्राज्य में बदल जाने को इंक़लाब नहीं समझकर खू’न-खराबा बता रहे है। मुझें नहीं पता कि चेगेवेरा की टोपी और टीशर्ट पहने लोगों को उनके द्वारा फैलायी गयी हिंसा क्यों नहीं याद रहती है?

बेशक क्यूबा में कास्त्रों और चे ने मिलकर सोशलिस्ट सरकार की स्थापना किया मगर इस दौरान गुरिल्ला यु’द्ध मे मारे गये जवान और लाखों नागरिक को क्यों भूल जाते है। यह चे ग्वेरा ही थे जिन्होंने रूस से अनुरोध किया था कि अमेरिका पर एटम ब’म गिराकर न्यूयॉर्क को दुनिया के निशाने से मिटा दिया जाये। रूस ने जहाज़ पर एटम ब’म लेकर अमेरिका की तरफ जाना भी शुरू कर दिया था लेकिन रास्ते मे अमेरिकी सेना ने पकड़ लिया।

यह लोग जिस माओत्से तुंग को चीन के इंक़लाब के लिए अपना आदर्श मानते है। यह लोग क्यों भूल जाते है कि माओत्से तुंग के इस इंक़लाब ने भी लगभग पाँच करोड़ चीनियों को मौ’त का नींद सुलाया है। जिस लॉन्ग मार्च के लिए माओत्से को दुनिया जानती है उस लॉन्ग मार्च के शुरुआत में लगभग 84 हजार लोग शामिल हुए थे और ख़त्म होने तक केवल 8 हज़ार लोग बचे थे। इस बीच मे लोग भूख, प्यास और विरोधियों से लड़ते हुए लोग म’र गये।

दुनिया में फांसीवाद को स्थापित करने वाला मुसोलिनी था। क्या यह सच नहीं है कि मुसोलिनी मार्क्स से इतना अधिक प्रभावित था की जब वह इटली से स्विट्जरलैंड काम ढूंढ़ने गया तब उसके पॉकेट में एक फ़ुटटी कौड़ी नहीं थी मग़र मार्क्स की तस्वीर जरूर थी। उसकी पूरी पॉलिटिकल ट्रेनिंग ट्रेड यूनियन में हुई और कई कम्युनिस्ट अख़बार का एडिटर रहा था। यानी मार्क्स के एक अनुयायी मुसोलिनी ने सत्ता प्राप्ति को लेकर इटली में जो लाखों लोगों का क़’त्ल किया उसे इतिहास से नहीं मिटाया जा सकता है।

स्टालिन का नाम कौन भूल सकता है? वह अपनी नीतियों के कारण रूस में लगभग 2 करोड़ किसानों, मजदूरों और आम नागरिकों का क़ा’तिल था। बल्कि उसके शासक बनने के बाद भी विश्वयुद्ध में शामिल होने के कारण अकेले 2 करोड़ से भी अधिक रूसी नागरिकों को ज़िंदगी गँवानी पड़ी थी। लेनिन के बोल्शेविक आंदोलन के कारण जो क’त्लेआम हुआ उसकी तो गिनती असम्भव है। इसलिए कॉमरेड लोग अरतगल सीरियल पर खू’न-खराबा का भौंडा आरोप लगाने से पहले खून-खराबा का अपना इतिहास जरूर पढ़ ले।

अकेले चीन की क्रांति में जितने लोग मा’रे गये होंगे उसका आधा भी 650 वर्षों के ऑटोमन एम्पायर में नहीं मा’रे होंगे। अरतगल गाज़ी का संघर्ष हमारे लिए एक इंक़लाब है। इंक़लाब इसलिए है कि एक छोटे से आदिवासी(काई) क़बीला से निकलर एशिया, अफ्रीका और यूरोप के एक बड़े हिस्सा पर इंसाफ़ के साथ हुक़ूमत किया है।

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