जीतेंद्र दीक्षित

ये पोस्ट मैं अपने सहकर्मी Kunwar Mrityunjay Singh की फेसबुक पर लिखी लाइन “कश्मीर हमारा है तो गर्व से कहो कश्मीरी भी हमारे हैं” और वरिष्ठ पत्रकार Ajit Anjum की लाइन “अपनी गली में शेर मत बनो” का समर्थन करते हुए और इन विचारों को आगे बढ़ाते हुए लिख रहा हूँ।

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1) मुझे जम्मू से श्रीनगर सड़क के रास्ते सफर करना था लेकिन जम्मू एयरपोर्ट पर से कोई गाड़ीवाला श्रीनगर जाने को तैयार नही था। कारण था कि एक दिन पहले जम्मू में श्रीनगर के रेजिस्ट्रेशन नंबर वाली गाड़ियों को जला दिया गया था। बदले में श्रीनगर में जम्मू की गाड़ियों को नुकसान पहुंचाया गया। जिन्हें मुद्दा नही पता उन्हें बता दूं कि मामला सीधे सीधे हिन्दू-मुस्लिम वाला था। जम्मू हिन्दू बहुल है और श्रीनगर मुस्लिम वहुल। जम्मू का एक टैक्सीवाला मोटी रकम लेकर आधे रास्ते में बनिहाल तक छोड़ने को तैयार हुआ। बनिहाल में फिर श्रींनगर की रजिस्ट्रेशन वाली गाड़ी लेकर सहकर्मी आदर्श सिंह आये और उनके साथ श्रीनगर तक का सफर पूरा किया। मुझे बीच रास्ते में गाड़ी इसलिए बदलनी पड़ी क्योंकि जैसा अजीत अंजुमजी ने कहा “हर कोई अपनी गली में शेर बन रहा था”।

2) श्रींनगर में जिस होटल में मैं ठहरा था वहां सहकर्मी आदर्श सिंह दिल्ली से 2 दिनों पहले से आये हुए थे। आदर्श ने बताया कि वहां का खाना अच्छा नही है। कश्मीर में बंद का ऐलान किया गया था। सारे रेस्टोरेंट, ढ़ाबे वगैरह भी बंद थे। हमने फिर भी ये सोचकर चांस लेना तय किया कि शायद रात के वक्त कुछ ढाबे वाले शुरू करें। ड्राइवर उस दिन का काम खत्म करके अपने घर जा चुका था। ऑटो-टैक्सी चल नही रहे थे।लिहाजा, हमने करीब 4 से 5 किलोमीटर पैदल घूमकर ढाबा खोजा लेकिन कोई ढाबा खुला नही मिला। डल झील के पास एक मेडिकल स्टोर खुला दिखा, जिसमे एक 45-50 की उम्र का कश्मीरी मौजूद था। हमने उससे पूछा कि क्या कहीं खाना मिल पायेगा?उसने कहा कि वैसे तो हर तरफ बंद है लेकिन पास ही में शायद एक जगह ढाबा खुला मिल जाए। वो हमे वहां तक पहुंचने का रास्ता बताने लगा फिर कुछ सोचकर कहा- चलो मैं ही आपको वहां तक ले चलता हूँ। आप कहीं भटक न जाओ। नजदीक ही है। अपनी दुकान ऐसे ही खुली छोड़कर वो हमारे साथ उस ढाबे तक आया जो करीब वहां से 200 मीटर के फासले पर था। रास्ते में बातचीत के दौरान हमने उसे बताया की हम लोग दिल्ली और मुम्बई से आये हुए हैं।

जब हम उस ढाबे तक पहुंचे तो पता चला की वो भी बंद है।मेडिकल स्टोर से साथ आये उस शख्स को इस बात का अफसोस हुआ कि वो हमे खाना नही उपलब्ध करा सका। उसने बड़े अपराधबोध के साथ कहा- जनाब सॉरी। अगर मेरा घर नजदीक होता तो मैं आप चारों को अपने घर खाने पर ले चलता। उसकी आवाज़ में अफसोस साफ झलक रहा था। वो शख्स एक आम कश्मीरी था जो देश के दूसरे हिस्से से आये लोगों की मदद न कर पाने के कारण दुखी हो रहा था। मैं रिपोर्टिंग के सिलसिले में या घूमने फिरने कई बार कश्मीर जा चुका हूँ और आम कश्मीरियों को मैंने इस जैसा ही पाया है।

आज एयरपोर्ट पहुंचते वक्त कश्मीरी ड्राइवर मंजूर से बात हो रही थी। पुलवामा हमले के बाद जिस तरह से कश्मीरियों के साथ बदसलूकी हो रही थी उससे वो दुखी था। “साब जिन कश्मीरियों का militancy से कोई लेना देना नही उन्हें क्यों मारा जा रहा है? आम कश्मीरी इस militancy से परेशान हो चुका है। वो कश्मीर से बाहर जाकर पढ़ना चाहता है, काम करना चाहता है…लेकिन वहां से भी लोग उन्हें भगा रहे हैं। अगर भारत एक है तो क्यों अपने ही देश के कश्मीरियों के साथ वो सलूक किया जा रहा है जो पाकिस्तान में मुहाजिरों के साथ होता है? अगर आप अपने एक हाथ से दूसरे हाथ को तोड़ोगे तो नुकसान आपके शरीर का ही होगा। जब लोगों को कश्मीर में काम नही मिलता तो वो दूसरे राज्यों में जाते हैं। जब वहां से भी भगाए जाने पर वापस आते हैं तो ऐसे युवाओं के दिल में नफरत का बीज बोना militants के लिए आसान हो जाता है।

मेरा अपना मानना है कि कश्मीरियों के साथ दुर्व्यवहार और उनसे भेदभाव बंद होना चाहिए। कश्मीर को देश का अंग बनाये रखने की जंग में कई पेचीदगियां हैं जिसके लिए आम कश्मीरियों का साथ ज़रूरी है।

(ये लेखक के निजी विचार है। जो उनकी फेसबुक टाइमलाइन से लिए गए है।)

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