ध्रुव गुप्त

अभी कुछ ही दशक पहले की बात है कि गांव-मुहल्लों में पुलिस के सिपाही को भी देखकर लोग रास्ता बदल लेते थे या घरों में छुप जाते थे। बच्चों में तो भगदड़ ही मच जाती थी जिन्हें होश संभालने के पहले से ही पुलिस से डरना सिखाया जाता था। ‘भागो, पुलिस आई’ उस दौर का मुहाबरा था। यह देश के मानस में अंग्रेजों की सामंती पुलिस की स्मृतियों का अवशेष था। अभी का मुहाबरा है – ‘मारो, पुलिस आई !’ पुलिस के प्रति अविश्वास और गुस्सा आज इतना गहरा हो चला है कि गालियां तो आम बात है, उसकी छोटी-छोटी गलतियों पर लोग पत्थर उठा लेते हैं। गलतियां न भी हो तो गैरकानूनी हरकतें रोकने के दौरान भी पुलिस को मार ही खानी पड़ती है। पिछले कुछ सालों में पुलिस और पुलिस प्रतिष्ठानों पर हमले बेतहाशा बढे हैं। पुलिस का दुर्भाग्य है कि देश की आज़ादी के बाद उसे इन्हीं दो अतियों के बीच काम करना पड़ा है। पुलिस का ही क्यों, यह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी दुर्भाग्य की बात है कि लोकतंत्र में पुलिस की त्राता, मित्र और सहयोगी की जो छवि बननी चाहिए थी, वह कभी बन ही नहीं पाई। पुलिस और नागरिकों के बीच का यह फासला और अविश्वास भारतीय समाज में उद्दंडता और अराजकता बढ़ने की प्रमुख वजहों में एक है।

हमारी पुलिस पर सबसे बड़े आरोप भ्रष्टाचार और संवेदनहीनता के हैं। पुलिस में भ्रष्टाचार तो है और उसकी जड़ें भी बहुत गहरी फैली हुई हैं। लेकिन भ्रष्टाचार सिर्फ पुलिस की समस्या नहीं है। देश की लगभग हर संस्था आज भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है। जब देश की राजनीतिक व्यवस्था ही भ्रष्टाचार से संचालित हो तो उसकी शाखाओं और संस्थाओं से ईमानदारी की उम्मीद करना फ़िज़ूल है। यह छुपी हुई बात नहीं है कि पुलिस में बड़े पदों पर राजनीति से प्रेरित पदस्थापनाएं होती हैं। जो राजनेताओं को जितना खुश कर सके उसको उतना ही प्रमुख और मलाईदार पद। कुछ प्रदेशों में तो पुलिस जिलों की नीलामी तक होती है। इसका असर पुलिस के अधीनस्थ पदों पर पड़ना स्वाभाविक है। चंद अपवादों को छोड़ दें तो विधि-व्यवस्था की सबसे बुनियादी संस्था थानों के प्रभारी अधिकारियों के पद राजनीतिक पैरवी और पैसों के बल पर बांटे जाते है। ऐसे पुलिस अधिकारियों की जनपक्षधरता कैसी और कितनी होगी, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। जबतक राजनीतिक व्यवस्था की ईमानदारी, जनपक्षधरता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता स्थापित नहीं होगी, पुलिस तो क्या किसी भी संस्था से ईमानदारी की अपेक्षा दिवास्वप्न ही साबित होगी। जिले का पुलिस नेतृत्व अगर ईमानदार है, आमलोगों से उसका सीधा संवाद है और जनता का भरोसा उसके प्रति बना हुआ है तो स्थिति में थोड़ा-बहुत तात्कालिक सुधार ही लाया जा सकता है।

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पुलिस की छवि बिगाड़ने में जिस चीज का सबसे बड़ा योगदान है, वह है उसकी संवेदनहीनता। कुछ हद तक अमानवीयता भी। आम तौर पर हालत यह है कि अपनी फ़रियाद लेकर आम लोग थानों में जाने से डरते हैं। रसूखदार और संपन्न लोगों को वहां कोई कठिनाई नहीं होती। उन्हें सम्मान भी मिलता है और उनकी बात भी सुनी जाती है। अपवादों को छोड़ दें तो आम लोगों के पास अगर राजनीतिक पैरवी और गांठ में पैसे न हो तो उन्हें कोई सुनता नहीं। केस दर्ज भी हो गया तो कार्रवाई नहीं होती। स्त्रियां रात में तो क्या, दिन के उजाले में भी थाने का दरवाजा खटखटाने का साहस आज भी कम जुटा पाती हैं। केसों की तफ्तीश में लापरवाही और मनमर्जी, संदेह के आधार पर या बिना आरोप साबित हुए मनमानी गिरफ्तारी, गिरफ्तारियों में पहुंच और पैसों का अंतहीन खेल, पुलिस कस्टडी में महिलाओं से दुर्व्यवहार, आरोपियों की निर्मम पिटाई और पिटाई से मौत, अपराधी बताकर लोगों की नकली मुठभेड़ में हत्या, राजनीतिक पक्षपात, उद्दंडता और जनता से दुर्व्यवहार ऐसी आम शिकायतें हैं जो लोगों को पुलिस से लगातार दूर कर रही है। इसका असर विधि-व्यवस्था पर ही नहीं, पुलिस की कार्यक्षमता पर भी पड़ा है। आम लोगों से सौहार्द्रपूर्ण संबंध के अभाव में उसे अपराध और अपराधियों के बारे में अपेक्षित सूचनाएं नहीं मिलतीं। उग्र प्रदर्शनों, सड़क जाम और दंगों की स्थिति में उसे लोगों का सहयोग नहीं मिलता। जनसहयोग से जो समस्याएं बातचीत से हल हो सकती हैं, जनसहयोग के अभाव में शान्ति की बहाली के लिए बल-प्रयोग और कभी-कभी पुलिस फायरिंग का भी सहारा लेना पड़ता है। लब्बोलुबाब यह कि पुलिस की विश्वसनीयता के अभाव में स्थिति दिन-ब-दिन बदतर होती जा रही है और राजनीतिक नेतृत्व इन बुरे हालात से आंखें चुराए बैठा है।

आखिर हमारी पुलिस इस कदर संवेदनहीन क्यों हैं ? सरकार के सभी अंग संवेदनहीन और भ्रष्ट हो जाएं तो देश चल जाएगा, लेकिन पुलिस अगर संवेदनहीन और भ्रष्ट हो जाय तो देश नहीं चल सकता। पुलिस के कंधे पर भ्रष्टाचार और अराजकता से लड़ने और और जनता में व्यवस्था के प्रति भरोसा पैदा करने की महती ज़िम्मेदारी है। भारत की पुलिस अपने गठन से लेकर अबतक जनता की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं पर कभी खरी नहीं उतरी है। ऐसा नहीं है कि पुलिस की छवि सुधारने और उसकी कार्यप्रणाली को लोगों की अपेक्षाओं के अनुरूप बनाने के लिए कोशिशें नहीं हुई है। पुलिस आयोगों के गठन से लेकर उनके प्रशिक्षण का स्तर और उनकी सुविधाएं बेहतर करने के कई कदम उठाए गए हैं, मगर आधे-अधूरे मन से। देश के लगभग हर राज्य में पुलिस के वेतन-भत्ते बढ़े हैं, अपराधियों से लड़ने के लिए उन्हें इंटरनेट फ्रेंडली और डिजिटल बनाया गया है तथा आधुनिक हथियार भी उपलब्ध कराए गए हैं। इन उपायों से पुलिस के छानबीन के तरीकों में तब्दीली जरूर आई है और आपराधिक मामलों में उसकी सफलता का प्रतिशत भी बढ़ा है। अगर कुछ नहीं बदला है तो वह है पुलिस की संवेदनहीनता और अमानवीयता। यह समस्या पुलिस के उच्च अधिकारियों में कम, अधीनस्थ अधिकारियों और सिपाहियों में ज्यादा है। दुर्भाग्य से आम लोगों का पाला पुलिस के बड़े अधिकारियों से कम, निचले अधिकारियों और सिपाहियों से ही ज्यादा पड़ता है।

पुलिस की असंवेदनशीलता का एक कारण उसपर काम का जरूरत से ज्यादा बोझ, अवकाश की कमी और उनसे उपजा तनाव भी है जो कुछ परिस्थितियों में अवसाद का रूप भी ले लेता है। यह स्थिति तभी बदल सकती है जब चौबीसों घंटे उन्हें तनाव में रखने के बजाय पुलिस के काम के घंटे सीमित किये जायं। उप निरीक्षक और सहायक उप निरीक्षक स्तर तक के पुलिस के लगभग सभी अधिकारियों को अपने परिवार के साथ रहने की सुविधा हासिल है। बुरी हालत किसी भी थाने, पुलिस पोस्ट या पुलिस लाइन में नियुक्त सिपाहियों की होती हैं जो आम तौर पर एक ही कमरे में पशुओं की तरह रहने को विवश होते हैं। उन्हें परिवार के साथ रहने की इजाजत तो नहीं ही होती हैं। अधिकारियों द्वारा विधि-व्यवस्था की बढ़ती समस्याओं की तुलना में सिपाहियों की सीमित संख्या के कारण उनकी छुट्टियों में भी कंजूसी बरती जाती है। सभी सिपाहियों को घर देना तो संभव नहीं है, अपने परिवार के साथ समय बिताने के लिए उन्हें उदारता से छुट्टियां देकर उनके तनाव को बहुत हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। विधि-व्यवस्था संधारण के दौरान अपना दायित्व निभा रहे पुलिसकर्मियों के साथ भीड़ का दुर्व्यवहार भी उन्हें गुस्से से भर देता है। दुर्घटनाओं के बाद सड़क जाम की स्थिति में बिना दोष के भी पत्थर पुलिस को ही खाने पड़ते हैं। प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों को प्रतिबंधित या संवेदनशील क्षेत्रों में जाने से रोकना पुलिस का कानूनी दायित्व है। दुर्भाग्य से पुलिस को सबसे ज्यादा ईंट-पत्थर इन प्रदर्शनकारियों से ही खाने पड़ते हैं। इन परिस्थितियों में निचले स्तर के पुलिस वालों में गुस्सा और प्रतिशोध की भावना पैदा होती है जिसकी परिणति अक्सर बर्बर लाठीचार्ज और पुलिस फायरिंग में होती है। धीरे-धीरे यह गुस्सा पुलिसकर्मियों का स्वभाव बन जाता है।

गड़बड़ी की शुरुआत दरअसल निचले स्तर के पुलिस अधिकारियों और सिपाहियों की चयन-प्रक्रिया से ही हो जाती है। उनके चयन में मानसिक नहीं, शारीरिक बल और क्षमता को आधार बनाया गया है। शारीरिक स्वास्थ पुलिस की सेवा में एक आवश्यक तत्व है, लेकिन चयन में प्रत्याशियों के मानसिक और भावनात्मक स्तर की उपेक्षा के दुखद परिणाम सामने आये हैं। कुछ स्तरों पर लिखित परीक्षाएं भी ली जाती हैं, लेकिन उनसे प्रत्याशियों की रटंत क्षमता का ही पता चलता है, योग्यता और संवेदनाओं का नहीं। रही-सही कसर उनके प्रशिक्षण के दौरान पूरी हो जाती है। यहां तमाम जोर चुने गए पुलिसकर्मियों की शारीरिक क्षमता और परेड तकनीक के विकास और क़ानून की किताबों की पढ़ाई पर ही होता है। आधुनिक हथियारों और वैज्ञानिक अनुसंधान के इस दौर में पुलिस का पहलवान होना जरूरी नहीं है। होना यह चाहिए था कि इन चीजों के अलावा उनके भीतर की मानवीयता और संवेदना को जगाने के लिए उन्हें मानविकी, मसलन समाजशास्त्र, साहित्य, संगीत और कला जैसे विषयों की भी शिक्षा दी जाती। जिनके हाथ में आपने हथियार थमाए हैं, संवेदनाओं की सबसे ज्यादा ज़रुरत उनको ही है। यह न हो तो हथियार हमेशा गलत जगह पर ही चलेंगे। व्यवहारिक प्रशिक्षण के दौरान उन्हें थानों के हृदयहीन माहौल में बिठाने के अलावा पिछड़े क्षेत्र में गरीबों, दलितों और न्याय की आस लगाए लोगों की बस्तियों में भी कुछ वक्त बिताने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए ताकि आम लोगों की तकलीफों और संघर्षों से उनका निकट का परिचय रहे। उन्हें यह महसूस कराया जाय कि वे शासक नहीं सेवक हैं और अपने सेवा-काल में उनका पाला दुश्मनों से नहीं, अपने ही लोगों से पड़ना है।

सक्षम और मानवीय पुलिस-व्यवस्था लोकतंत्र की सबसे जरूरी शर्तों में एक है। यह लोकतंत्र के प्रति लोगों की आस्था को मजबूत करती है। अगर इसका अभाव है तो समाज में अशांति है। अशांति है तो कोई भी विकास संभव नहीं है। अंग्रेजों से विरासत में मिली पुलिस-व्यवस्था में सुधार कर उसे संवेदनशील और लोगों की लोकतांत्रिक अपेक्षाओं के अनुरूप बनाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए थी लेकिन दुर्भाग्य से यह कभी हमारी प्राथमिकता-सूची में भी शामिल नहीं रहा। पुलिस व्यवस्था में सुधार के लिए बनाये गए पुलिस आयोगों की अनुशंसाओं को आधा-अधूरा ही लागू किया गया। पुलिस को एक मानवीय संगठन बनाने की जगह उसे देह-हाथ से मजबूत संवेदनहीन और बर्बर लोगों का संगठन बनाकर रख दिया गया है। नतीजा यह हुआ कि आज पुलिस और जनता साथ-साथ नहीं, आमने-सामने खड़े हैं। यह स्थिति बदलनी चाहिए और जल्दी बदलनी चाहिए। पुलिस सुधार के लिए सरकार को तत्काल कदम तो उठाने ही होंगे। उससे भी बड़ी जरूरत इस बात की है कि पुलिस और आमजन के बीच के फासले कम करने के ईमानदार प्रयास किये जायं। यह दोतरफा प्रक्रिया है। इसके लिए पुलिस को जनता के प्रति अपना सामंती व्यवहार बदलना होगा। लाठियों और गालियों से तौबा कर अपने व्यवहार और संवेदनशीलता से लोगों का विश्वास अर्जित करना होगा। अपनी वर्तमान संरचना में यह काम पुलिस खुद-ब-खुद नहीं करेगी। राजनीतिक व्यवस्था अगर ईमानदार और इच्छाशक्ति से भरी है तो वह उसे ऐसा करने के लिए मजबूर कर सकती है। जनता तो एक बेहतर और मित्रतापूर्ण पुलिस व्यवस्था की आस ही लगाए बैठी है। जिस दिन उसकी उम्मीदें पूरी होती दिखेंगी, वह पुलिस को अपने सर-आंखों पर बिठा लेगी।

सौजन्य: अखबार ‘सुबह सवेरे’

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