Sunday, September 19, 2021

 

 

 

ध्रुव गुप्त: दोज़ख से बदतर एक जन्नत

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कश्मीर की समस्या अब नियंत्रण से बाहर है। हम कितना भी शोर करें कि कश्मीर देश का अटूट हिस्सा है, सच्चाई यह है कि हम नैतिक और भावनात्मक रूप से कश्मीर को खो चुके हैं। हमारी सेना अब वहां जमीन के एक टुकड़े भर के लिए लड़ रही है। घाटी को इस हालत में पहुंचाने की ज़िम्मेदारी देश और प्रदेश की अदूरदर्शी राजनीति की ही रही है।

भारत में कश्मीर के विलय के बाद हमने कश्मीरियों को देश की मुख्यधारा, संवेदनाओं और आकांक्षाओं से जोड़ने की कभी कोशिश ही नहीं की। कश्मीर हमारे लिए एक खूबसूरत सैरगाह ही बना रहा। शेष भारत से कश्मीर की इस संवादहीनता का लाभ पाकिस्तान और उसके टुकड़ों पर पल रहे आतंकियों ने उठाया और पूरी घाटी को आतंकिस्तान में तब्दील कर दिया। प्रदेश को अब सियासत नहीं, सेना चला रही है। आज कश्मीरी युवा हाथों में बंदूक और पत्थर लेकर देश के खिलाफ लड़ रहे हैं।

कश्मीरी युवा अगर यह सोचते हैं कि वे पाक की मदद से घाटी को एक स्वतंत्र इस्लामी देश बना लेंगे तो यह उनकी मृगतृष्णा है। भारत कश्मीर को किसी कीमत पर नहीं खोएगा। कुछ हजार या लाख लोग पाक की मदद से भारत की विराट सेना का मुकाबला नहीं कर सकते। दूसरी तरफ अगर देश की सरकार यह सोचती है कि कश्मीरियों को मारकर वह कश्मीर को हासिल कर लेगी तो यह मूर्खता के सिवा कुछ नहीं। आप एक को मारेंगे तो दस आतंकी और पत्थरबाज पैदा होंगे। वैसे अगर कश्मीरी ही न होंगे तो कश्मीर लेकर भी क्या करेंगे आप ?

अब कश्मीर के मसले से भी ज्यादा खतरनाक यह है कि इस मुद्दे पर देश की अवाम दो हिस्सों में बंट चुकी है। ज्यादातर हिन्दू सेना के हाथों हर कश्मीरी की मौत का जश्न मनाते हैं और ज्यादातर मुस्लिम मातम। इस विवाद में देश की सेना को विवादास्पद बनाने की कोशिशें भी हो रही हैं जिसे एक ऐसे काम पर लगाया गया है जो काम उसका नहीं, सियासत का है। देश में ऐसा नेतृत्व नहीं है जो कश्मीर के अलगाववादियों को वार्ता के टेबुल पर लाए और संविधान के दायरे में उनकी जायज़ मांगें मान लें। खुद कश्मीरियों के बीच भी कोई ऐसा नेतृत्व नहीं जो वहां के युवाओं को हिंसा का रास्ता छोड़कर शांतिपूर्ण तरीके से अधिकारों के लिए लड़ना सिखाए।

इस समस्या का समाधान न कश्मीरियों को मारने में है और न सैनिकों की हत्या में। समाधान मिलेगा तो अंततः संवाद से ही मिलेगा। देखना इतना भर है कि और कितनी-कितनी लाशों से गुजरने के बाद संवाद का यह रास्ता खुलता है।

ध्रुव गुप्त की कलम से…

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