Tuesday, September 21, 2021

 

 

 

मजदूर की मौत और मीडिया की खामोशी

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लगभग दो सप्ताह पहले जी न्यूज ने यू ट्यूब पर पड़ा हुआ एक वीडियो उठाया और उसे मिर्च मसाला लगाकर परोस दिया गया। वीडियो में कुछ लोग एक मजदूर को बेरहमी से मार रहे थे, मार खाने वाला युवक बंग्लादेश का था जो सऊदी अरब में काम करता था, मगर चैनल बता रहा था कि पीड़ित युवक भारत का है जो रोजी रोटी के लिये सऊदी के अरब गया है। अव्वल तो वह वीडियो दो साल पहले से ही यू ट्यूब पर मौजूद था फिर उसमें एक्सकूलूसिव जैसा कुछ कैसा बचा रह गया ?

अगर वह भारत का था तो चैनल के चौतरफा फैले नेटवर्क ने उसके परिजनों को तलाशने की कोशिश क्यों नहीं की ? दरअस्ल चैनल ‘सनसनी’ फैलाकर नफरत बेचना जानते हैं, इनका छिपा एजेंडा होता है कि किसी भी इस्लामी मुल्क में होने वाले अपराध को इस तरह से प्रस्तुत किया जाये कि एसा लगने लगे कि इस अपराध की जड़ इस्लाम है। खैर, उस वक्त मैंने लिखा था कि मजदूर के साथ ज्यादती सिर्फ वहीं पर नहीं हुई है बल्कि इसी साल बिहार का मुन्नू तांती को थ्रेसर में केवल इसलिये डाल दिया गया था क्योंकि उसने अपनी चार दिन की मजदूरी मांगी थी।

उस पर शायद ही किसी चैनल ने एक्सक्लूसिव फुटेज चलाये हों, चिथड़ों में बिखरी मन्नू की लाश को देख पाने की हिम्मत में हर किसी में नहीं थी। ताजा मामला अमृतसर पंजाब का है, जिसमें एक प्रवासी मज़दूर की पीट-पीटकर हत्या किए जाने का सनसनीखेज वीडियो सामने आया है। वीडियो में एक मज़दूर एक फ़ैक्ट्री में जंज़ीरों से बंधा उल्टा लटका दिखा रहा है और लोग उसे पीट रहे हैं। उसके इर्द-गिर्द खड़े लोग हंसते हुए और गालियां देते हुए दिख रहे हैं। अमृतसर पुलिस ने घटना की पुष्टि करते हुए कहा है कि मामला दर्ज कर जांच की जा रही है। पुलिस के मुताबिक घटना 14 अक्टूबर को हुई। मारे गए मज़दूर का नाम राम सिंह है और वे खानकोट गांव में अपने परिवार के साथ रहते थे। सवाल यहीं से पैदा होता है सबसे बड़ा सवाल तो कानून से ऊपर उठ चुकी भीड़ का है क्या किसी भी अपराध का पैमाना भीड़ तय करेगी ? राम सिंह ने चोरी की थी या नहीं इसका फैसला न्यायपालिका करती या फिर फैक्ट्री के वे कर्मचारी जिन्होंने उसकी जान ली है ? उस वक्त हमारी संवेदनाऐं कहां चली जातीं हैं जब बिल्कुल हमारे जैसा ही इंसान हमारी ही आंखों के सामने हमारे हाथों बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया जाता है ?

राम सिंह की मौत का दुःख इसलिये भी ज्यादा है कि उसकी उसकी लाश को मीडिया ने ब्रांड नहीं बनाया, बिल्कुल उसी तरह जिस तरह दादरी के अखलाक की लाश ब्रांड थी मगर हिमाचल प्रदेश में उसी आरोप में मारे गये सहारनपुर के नौमान की लाश ब्रांड नहीं बन पाई। दो सप्ताह पहले टीवी चैनल सऊदी अरब का दो साल पुराना वीडियो ‘ब्रेकिंग न्यूज’ बनाकर दिखा रहे थे। दरअस्ल मीडिया सनसनी बेचता है ताकि टीआरपी मिले, इस्लामी राष्ट्रों में होने वाली मामूली सी घटना भी भारत के पंजाब में अमृतसर में मरने वाला राम सिंह, बिहार में मार दिये जाने वाले मुन्नू तांती पर भारी पड़ जाती हैं। नहीं तो क्या वजह है कि दो साल पहले का सऊदी अरब वाला वीडियो मीडिया के लिये ब्रेकिंग न्यूज है। मगर अमृतसर की घटना जिसमें राम सिंह को मार दिया गया उसके लिये कोई जगह ही नहीं है ?

जिस जन सरोकार का नारा मीडिया देता आया है क्या उस जन से मीडिया का वास्तव में कोई सरोकार है ? एक मजदूर मार दिया गया क्योंकि उस पर चौरी का आरोप था क्या प्राईम टाईम में इसको जगह मिल पाई ? अगर नहीं तो फिर किसलिये कहा जाता है कि मीडिया जनता की आवाज है, सच्चाई तो यह है कि मीडिया को जनता से कोई सरोकार ही नहीं है उसे सिर्फ मध्यम वर्ग की भावनाओं का ख्याल है। अगर एसा न होता पिछले महीने मध्यप्रदेश के झबुआ जिले के पेटलावद में कथित तौर से सिलेंडर फटने से मारे गये 92 आदीवासी लाशों को यूं ही चुपके से न दफनाया जाता। बल्कि सवाल उठाये जाते, घटना के मास्टर माइंड को तलाशा जाता, मगर मामला गरीब वर्ग से जुड़ा था इसलिये उसे ज्यादा कवरेज नहीं दी गई। आज वही हाल राम सिंह का है। राम सिंह इस देश के सबसे बड़े वर्ग ‘मजदूर वर्ग’ से संबंध रखता था मगर मजदूरों की आवाजों उठाने की इजाजत टीवी स्क्रीन नहीं देता।

वसीम अकरम त्यागी – लेखक मुस्लिम टुडे के सहायक संपादक है

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