Tuesday, September 21, 2021

 

 

 

भारत में पत्रकारिता किसी अबोध बच्चे के हाथों की जूजी है: Dilip C Mandal

- Advertisement -
- Advertisement -

दैनिक भास्कर ने 17 दिसंबर की डेटलाइन से एक फड़कती हुई, सनसनीख़ेज़ खबर छापी। राजस्थान के दौसा शहर में एक घर की छत पर पाकिस्तानी झंडा। पत्रकार ने इस बारे में पुलिस कप्तान को बताया तो उन्होंने कह दिया गंभीर मामला है। बस बन गई खबर।

अब आप तस्वीर देखिए। इस इस्लामी धार्मिक झंडे को देश में कौन नहीं जानता? हर धार्मिक मौक़े पर दुनिया भर के मुसलमान इसे घरों और धार्मिक स्थलों पर लगाते हैं। किसी को कभी दिक़्क़त नहीं हुई।

लेकिन पत्रकार नाम का अबोध बच्चा उत्तेजित हो गया।

पत्रकार अगर अबोध बच्चा है, तो घर के मालिक से पूछ सकता था। चाहता तो मोबाइल से फोटो खींचकर पुलिस को दिखा सकता था। Google पर पाकिस्तानी झंडे की तस्वीर से मिला कर देख सकता था। लेकिन इतनी मशक़्क़त कौन करे? अपनी अक़्ल के हिसाब से पत्रकार तो सर्वज्ञानी होता है। यही उसकी ट्रेनिंग है। रिपोर्टर ने खबर दी, डेस्क ने ले ली और संपादक ने छाप दी। किसी को कुछ भी नहीं खटका।

भोलापन कहिए या शरारत कि खबर के साथ मोहल्ले का नाम और घर के मालिक का नाम भी छाप दिया। यानी अपनी तरफ़ से आग लगाने का पूरा इंतज़ाम। लेकिन ख़ैरियत है कि दादरी इस देश का अपवाद है और दौसा मुख्यधारा है। इस खबर के बावजूद शहर में अमन चैन है और यह खबर स्टेटस लिखे जाते समय भी भास्कर की वेब साइट पर मौजूद है।

1990 के दौर में ऐसी आग लगाऊ खबरों की वजह से दंगे हो जाते थे और लोग मारे जाते थे। संपादकों ने उस दौर में खूब ख़ून बहाया।

Facebook समेत सोशल मीडिया ने इस मामले में पत्रकारों की दंगाई ताक़त को अब कम कर दिया है। दौसा को लेकर भी सोशल मीडिया ने शानदार भूमिका निभाई। बधाई।

अबोध पत्रकारों और बाल संपादकों के लिए मैं नई दिल्ली के पाकिस्तानी हाई कमीशन में लगा पाकिस्तान का झंडा लगा रहा हूँ। देख लो, ऐसा होता है।

पेशे की संवेदनशीलता को देखते हुए आवश्यक हो गया है कि हर संपादक और पत्रकार अपने जीवन में कम से कम एक बार ही सही, लेकिन प्रेस कौंसिल की उस गाइडलाइन को पढ़े, जो सांप्रदायिकता से जुड़ी खबरों के बारे में जारी की गई है और प्रेस कौंसिल की वेब साइट पर मौजूद है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot Topics

Related Articles