Wasim Akram Tyagi 

हमने नरेन्दर दाभोलकर, कुलबर्गी, और पंसारे को मारा है, उन्होंने अमजद साबरी को मार गिराया हिसाब बराबर कट्टरवाद के मामले में हम पाकिस्तान से बिल्कुल अलग नहीं हैं। पाकिस्तान जैसा है उसके हालात से दुनिया वाकिफ है मगर हम पाकिस्तान नहीं बनना चाहते। पाकिस्तान में धर्मांधता के नाम पर खून बहा देना आम बात है, मगर हम वैसा नहीं बनना चाहते हम वही नानक और चिश्ती की जमीन वाले हैं।

मगर यहां भी दक्षिणपंथी समूह हैं जो बिल्कुल ‘पाकिस्तान’ बनना चाहते हैं। देश में बढ़ती बेरोजगारी से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। सूखे से झुलस रही अवाम हो या फिर खुदकशी करते हुऐ किसान ये उनके आकर्षण का केन्द्र कभी नहीं बनते हां गली गली में उगने वाली सेनाओं, अखाड़ों में उनकी देशभक्ती जरूर जागती है। खून भी खौलता है। दो खबरें हमारे सामने हैं, एक खबर पाकिस्तान से है जिसमें अमजद साबरी को नामालूम अफराद ने गोली मारकर हलाक कर दिया। दूसरी खबर हिन्दोस्तान से है, जिसमें एक आदीवासी ने रोटी के लिये अपने बेटे को एक हजार रूपये में बेच डाला। दोनों खबरें मानवता को शर्मशार कर रही हैं।

आप चाहें तो अमजद साबरी की हत्या के लिये पाकिस्तान पर भड़ास निकाल सकते हैं, इससे देशभक्ती पर भी शक नहीं होगा और आपकी अंतेषणा भी शान्त हो जायेगी। मगर उस आदीवासी बाप की मजबूरी को समझने के लिये अंतेषणा का जगाना जरूरी है, गुस्सा आना जरूरी है, हम विश्व की ताकत बनने की ओर अग्रसर हैं, सारी दुनिया हमारे पदचिन्हों पर चलकर हमसे योग सीख रही है। दुनिया के वे देश जो हमसे योग सीख रहे हैं क्या वे उस चेहरे को भी देखने के लिये तैयार हैं जो झारखंड के उस आदिवासी का है जिसने अपने बेटे को रोटी के लिये बेच डाला ? क्या उस बाप की मजबूरी को भी हम समझेंगे जिसको पास खाने के लिये रोटी नहीं थी।

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धर्म रक्षा के लिये हमारा खून नसों में बहुत तेजी से दौड़ने लगता है, राष्ट्र की अगर बात आ जाये तो हम दुश्मन की ईंट से ईंट बजाने की कसमें खाने लगते हैं, मगर क्या भूख से मर रहे नागरिकों को रोटी मुहैय्या कराना देश और धर्म दोनों की रक्षा नहीं है ? अभी चार दिन पहले झारखंड के ही एक प्राईमरी स्कूल में अमित कौड़ा नाम का छात्र मिड डे मील से अंडा चुराता हुआ पकड़ा गया था, पकड़े जाने पर उसने जो दास्तान सुनाईं वह आंखें नम कर देने वाली थी अमित ने बताया था कि उसकी मां टीबी की मरीज है जिसे डॉक्टरों ने प्रोटीन युक्त भोजन लेने की सलाह दी है।

अमित कौड़ा अपनी मां के प्रोटीन के लिये मिड डे मील में मिलने वाले अंडे को चुराकर अपनी मां को लाकर दे देता था। यह किसी दूसरे देश की दास्तानें नहीं हैं बल्कि अपने ही देश की दास्तानें उसी देश की जिस देश में धर्म रक्षा के नाम पर लाताद लाशें गिर चुकी है।क्या धर्म रक्षकों को भूख से बिलखते ये नागरिक नहीं दिखाई देते ?

लेखक मुस्लिम टूडे मैग्जीन के सहसंपादक हैं।