डॉ फर्रुख़ ख़ान, एडवोकेट

काफी अरसे से इस मुद्दे पर लिखने की सोच कहा था लेकिन हर तरफ से विरोध के डर से रुक जाता था। आख़िरकार हिम्मत जुटाकर मैंने इस मुद्दे पर साफ-साफ लिखने का फैसला किया।

मुझे कहने में झिझक नहीं है कि हमारे समुदाय या क़ौम को एक्टिविस्म सिंड्रोम है जो सोशल मीडिया पर उनकी तमाम पोस्ट से ज़ाहिर होता है। हम इस साहसिक कार्य में इतनी ज़्यादा महारत हासिल कर गए हैं कि हमने इसकी कला और विज्ञान सब सीख लिए हैं। भले ही हमारी कमर दीवार से टिकी हुई हो लेकिन हम हमलावर रहते हैं। मेरी समझ में ये नहीं आता है कि हम इस तरह के नफरत के कारोबार में क्यों लगे हुए हैं जबकि हम जानते हैं कि हमारा सबसे बेहतरीन तर्क भी उन लोगों का मन नहीं बदल सकता जो नफरत से भरी सामग्री पोस्ट कर रहे हैं।

हालांकि मैं पूरी तरह सही नहीं भी हो सकता हूं लेकिन मैंने नफरते फैलाने वाले तमाम पोस्ट का पैटर्न यानि उनके स्वरुप का अच्छे से अध्यन किया है। उदाहरण के लिए हम कपिल मिश्रा नाम के राजनीतिज्ञ से अपनी बात शुरु करते हैं।आप उनके बीजेपी में शामिल होने से पहले के वीडियो या ट्वीट गूगल करके खोजिए और फिर आप समझ जाएंगे कि मैं क्या कहना चाह रहा हूं। अपनी बात संक्षिप्त रखने के लिए मैं इसका बार बार ज़िक्र नहीं करुंगा। कपिल मिश्रा का दिल्ली विधानसभा में भाषण रिकॉर्ड पर है जिसमें उन्होंने मौजूदा प्रधानमंत्री पर गंभीर आरोप लगाए थे। ये 2014 के चुनाव से कुछ ही दिन पहले की बात है। इसके कुछ साल बाद वो पाला बदल कर बीजेपी में शामिल हो गए। नई पार्टी में उनके सामने न सिर्फ पहचान का संकट था बल्कि उनके पहले के बयान कई बड़ी परेशानियां पैदा कर सकते थे। अपने पुराने कलंक धोने के लिए उन्होंनेनपे तुले अंदाज़ में नफरत फैलाकर नए सिरे से अपनी ब्रांडिंग शुरु की और ये तरकीब कामयाब रही।

इसके बाद कपिल मिश्रा न सिर्फ बीजेपी से विधान सभा चुनाव में टिकट हासिल करने में कामयाब रहे बल्कि हार के बावजूद तमाम तरह की चर्चा में बने रहे। ये काल्पनिक कथा नहीं है। इस दौर में महज़ एक बटन की क्लिक पर सके बाद वो अपनी छवि ऐसी बनाएंगे मानो अपने गुनाहों की तौबा करना चाहते हैं। यक़ीन नहीं होता तो संजय निरुपम को देख लीजिए।

समझने की कोशिश कीजिए। बढ़ती बेरोज़गारी की वजह से बहुत से युवा राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश करते हैं। इशके लिए अगर लंबी क़तार से बचना है तो कुछ ऐसा होना चाहिए जो तेज़ी से आगे ले जाए। इसके लिए वो नफरत भरी सामग्री का सहारा लेते हैं और ऐसे में हम लोग बिना हालात को समझे या बिना वजह जाने, किसी प्रधानाचार्य की तरह उन्हें समझाने निकल पड़ते हैं। इस दौरान हममें से कई ख़ुद भी संयम की बारीक रेखा लांघकर नफरत फैलाने में लग जाते हैं। यहीं वो लोग सफल हो जाते हैं।

क्यों? एक सेकेंड के लिए ठहरिए। राजनीति में प्रतीक्षा लंबी लाइनों को लांघ कर अपने नेता की नज़र में चढ़ने के लिए उन्हें आपकी मदद की ज़रुरत है। क्या आपको लगता है कि महात्मा गांधी पर खिलौना बंदूक़ से गोली चलाना या किसी मंत्री का गौडसे को राष्ट्रवादी बताना कोई आकस्मिक घटना है?नहीं,ये उसी रणनीति का हिस्सा है जिसकी हम बात कर रहे हैं।

तो हमें क्या करना चाहिए? क्या हम इसे नज़रअंदाज़ कर दें? क्या ख़ामोशी इसका हल है? नहीं, क़ानून को अपना काम करने दीजिए। अगर आप कुछ करना चाहते हैं तो ख़ामोशी से ऐसी तमाम पोस्ट की शिकायत दर्ज कराइए। इनपर कमेंट करके इनकी पहुंच मत बढ़ाइए। या फिर आराम से इनको अनफ्रेंड या ब्लॉक करके निकल लीजिए। यक़ीन मानिए भारत में अभी भी बहुत सारे लोग सेक्युलर हैं। वो शांति से रहना चाहते हैं लेकिन वो भी इन नफरत फैलाने वालों से डरते हैं। उनका डर या उनकी चिंताएं बेवजह नहीं हैं।

हमें सभी मामलों में टिप्पणी करने से बचना चहिए चाहे उनका मतलब हमसे हो या नहीं। हाल ही में मैंने सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट की बाढ़ देखी जो शराब की दुकानें खुलने पर बतौर तंज़ की गई थीं। क्या ऐसे मुद्दे पर पर भी हमें अपनी राय रखने की ज़रुरत है? मैं जानता हूं कुछ नेक लोग कहेंगे कि ग़लत को ग़लत कहना भी क्या ग़लत है? जी आप बिल्कुल ठीक हैं, लेकिन हमेशा नहीं। याद कीजिए नोटबंदी को किस तरह हमारे अपने बड़बोले लोगों ने साम्प्रदायिक मुद्दा बना दिया था। अचानक ही घात लगाए मौक़े की तलाश में बैठी ख़ून की प्यासी मीडिया को मुद्दा हाथ लग गया। वाह! आप मुझसे अलग राय रख सकते हैं लेकिन मैं साफ कर देना चाहता हूं कि साम्प्रदायिकता अल्पसंख्यकों के बीच भी जगह बना रही है। आप कह सकते हैं कि ये क्रिया की प्रतिक्रिया है लेकिन समाज न्यूटन के सिद्धांत से नहीं चलता है। क्या हम अकबरुद्दीन ओवैसी जैसे लोगों के भाषण की उसी तरह निंदा कर सकते हैं जिस तरह दूसरे वर्ग के नेताओँ की करते हैं? शायद नहीं।

नफरत फैलाने वालों से जितनी बहस करेंगे उतनी उन्हें ऊर्जा मिलेगी। उन्हें वो मिलेगा जो वो चाहते हैं। यक़ीन मानिए, ये सब टीआरपी का खेल है, चाहे वो टीवी पर हो चाहे सोशल मीडिया के ऐसे किसी प्लेटफॉर्म पर। यहां तक कि बार बार थाने जाने या फिर अदालत में जाकर शिकायत करने से भी मक़सद हल होने वाला नहीं है। बहुत से लोग सोचते हैं कि थाने जाकर शिकायत करने से उनका काम पूरा हो गया। फिर इसे लेकर वो सोशल मीडिया पर बड़बोलापन भी दिखाएंगे। बतौर वकील मैं आपको बता दूं कि थाने में की गई हर शिकायत एफआईआर में तब्दील नहीं होती है। एफआईआर दर्ज हुए बिना किसी मामले में जांच तक नहीं होती है। लेकिन रुकिए। हमारे स्वघोषित योद्धा समझते हैं कि उनके शिकायत करने भर से काम हो गया। लेकिन अब पुलिस की मर्ज़ी है वो चाहे कुछ करे या न करे। लेकिन सोशल मीडिया के योद्धा ऐसी बातों पर ऐसे जश्न मनाते हैं मानो बहुत बड़ी जंग जीत ली और उनके फौलोअर उनकी हां में हां मिलाते हैं। लेकिन नतीजा क्या निकलता है? कुल जमा सिफर। मैंने ख़ुद ऐसे कई सोशल मीडिया योद्धाओँ की टाइमलाइन को मुआयना किया है। आप जानते हैं वो ख़ुद क्या करते हैं? थोड़ा वक़्त निकाल कर उनकी टाइमलाइन घूम आइए। आप पाएंगे वहां जो गंदगी है उसकी यहां चर्चा भी नहीं की जा सकती।

अब आप सोच रहे होंगे तो फिर इस सबका हल क्या है? यक़ीनन हल हैं लेकिन हर बात का एकदम पक्का हल निकलना ज़रूरी नहीं है। पहली बात तो ऐसी तमाम पोस्ट पर उलझना छोड़िए चाहे वो किसी कथित पत्रकार की ही क्यों न हो। उन्हें नज़रअंदाज़ कीजिए, विरोध मत कीजिए, ट्रेंड मत कराइए। अगर आप उसपर विरोध भी कर रहे हैं तो आप उसको फैलने में ही मदद कर रहे हैं। इस तरह की नफरती पोस्ट को उसकी स्वभाविक मौत मर जाने दीजिए। वो पोस्ट इसीलिए लिखी गई है कि आप उसपर प्रतिक्रिया दें। जैसे ही आपने रिएक्ट किया समझो उसका मक़सद पूरा हो गया। उसपर किसी भी हाल में कमेंट मत कीजिए, शेयर या रिट्वीट करना तो काफी बड़ी बात है। उन्हें अपने मैदान में अकेले खेलने दीजिए।

इसमें मज़ा नहीं आएगा? सोच कर देखिए। वरना किसी वकील से सलाह लेकर देखिए। वकील से मतलब प्रैक्टिस कर रहे अच्छे वकील से है, डिग्री लिए घूम रहे वकील से नहीं जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में एक भी केस नहीं लड़ा है। एक अच्छा वकील कीजए जो ऐसे मामलों में क़ानून की समझ रखता है। सभी मामलों में शिकायत करने के लिए मत दौड़ पड़िए। कम से कम ऐसे मामले नज़रअंदाज़ कीजिए जो किसी राह चलते ट्रॉल के या पहचान के संकट से जूझ रहे टटपूंजिए से जुड़े हों। ऐसे लोग जिनकी समाज में कोई जगह या पहचान है उनके मामले में शिकायत दर्ज कराइए। क़ानून की मदद लेते वक़्त चयनात्मक मत बन जाइए बल्कि हर एक की, जो भी नफरत फैला रहा है उसकी, समान रुप से शिकायत कीजिए। औऱ हां, कम से कम उन लोगों पर नज़र रखिए जो कुकुरमुत्तों की तरह आपके मसीहा कहलाने वालों की भीड़ बन रहे हैं। ऐसे लोग आपको आक्रामक सोशल मीडिय पोस्ट से उकसाएंगे लेकिन अगर आप उनकी वजह से कहीं फंस जाएंगे तो वो अपना अकाउंट बंद करके चुपचाप निकल लेंगे।

कुछ आसान नुस्ख़े हैं जो ज़िंदगी आसान करने, सही नींद आने और तनाव कम करने के लिए ज़रूरी हैं। क़ानून को अपना काम करने दीजिए। हालांकि ये मुश्किल लग सकता है लेकिन धैर्य के साथ अगर आगे बढ़ा जाए तो नतीजा ज़रुर आता है। और हांस याद रखिए। इतिहास नफरत फैलाने वालों के साथ बहुत बुरा बर्ताव करता है। आज उन्हें भले ही संरक्षण मिल रहा है लेकिन इतिहास उन्हें माफ नहीं करेगा। हम सबको अपने अधिकारों के लिए एकजुट होना होगा और संविधान के दायरे में रहकर मज़बूत लड़ाई लड़नी होगी। देश में लोकतंत्र की जड़ें इतनी कमज़ोर नहीं हैं कि इस तरह के नफरत फैलाने वाले उन्हें उखाड़ सकें। संविधान में अपना विश्वास बनाए रखिए और संविधान के तहत मिले अधिकारों का इस्तेमाल कीजिए। इस तरह के हालात से बिल्कुल मत डरिए। हमारे लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हैं और ये दिन भी गुज़र जाएंगे।

डा. फर्रूख़ ख़ान, सुप्रीम कोर्ट में वकील हैं और क़ानून के अलावा राजनीतिक और सामाजिक मामलों पर पकड़ रखते हैं। टीवी पर विश्षेज्ञ पैनलिस्ट के अलावा वो कई प्रतिष्ठित पत्र और पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं।

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