कौन सी फ़िल्म बनेगी और उसमें कौन एक्टिंग करेगा इसका फैसला डायरेक्टर और प्रोड्यूसर नहीं बल्कि आजकल सियासत तय करने लगी है और फ़िल्मों का स्क्रिप्ट भी लुटियन दिल्ली से लिखकर जाता है। शुद्ध रूप से भारतीय सिनेमा को इस वक़्त सियासी एजेंडा सेट करने के लिए, समाज में विद्वेष फैलाने एवं नफ़रत का व्यापार बढ़ाने के लिए किया जा रहा है। ऐसा नहीं है ये सब अभी होना शुरू हुआ है बल्कि एक रणनीति के तहत पिछले दो-तीन दशकों से किया जा रहा है।

ऐसा कैसे हो सकता है कि पिछले बीस-पच्चीस सालों से सिनेमा का एक ही टॉपिक रहा हो। पाकिस्तान, कश्मीर और विलेन के रूप में मुसलमान। बीस सालों में तो एक पीढ़ी पैदा होकर जवान हो जाती है, अब इस नई पीढ़ी को भारतीय सिनेमा ने नफ़रत के सिवा और क्या दिया है? क्या सिनेमा जगत का यही उद्देश्य था?

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कभी आपने सोचा है कि आख़िर चाईना डोकलाम तक घुस जाती है, अरुणाचल प्रदेश में क़ब्ज़ा करके बैठ जाती पर उसपर कभी फ़िल्म क्यों नहीं बनती है? नोटबंदी नामक सर्जिकल स्ट्राइक जिसके ज़रिए सैकड़ों लोग मार दिए गए, करोड़ों प्रभावित हुए। उसपर फ़िल्म क्यों नहीं बनाता कोई?

ये भारतीय सिनेमा के गौरवशाली इतिहास का सबसे शर्मनाक दौर है जहाँ नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी जैसे लोग पहले मंटो फ़िल्म में सआदत हसन ‘मंटो’ का किरदार अदा करके समाज की असल हक़ीक़त को बताने कोशिश करते हैं तो वहीं दूसरी तरफ बाल ठाकरे फ़िल्म में “उठाओ लुंगी बजाओ पुंगी” जैसे घटिया डायलाग बोलकर अपने ही देश के दक्षिण भारतीयों को अपमानित करने का काम करते हैं और ये सब हमारे आपके सामने हो रहा है।

कला एवं सिनेमा का काम तो मोहब्बत बाँटना हुआ करता था पर ये आजकल खुलकर नफ़रत बाँटने का काम कर रही है। अंधराष्ट्रवाद के नशे में लोगों को पागल बनाने का हथियार बन चुका है। समाज को हिंसक एवं दंगाई बनाने में बॉलीवुड का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

प्रोफेसर मजीद मजाज की कलम से….

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