यूपी समेत कई राज्यों में बीजेपी ने शानदार जीत दर्ज की है. यूपी में ऐसी जीत सियासत के कई अंदाज़ पेश कर गया है. हालांकि इस बीच EVM में गड़बड़ी की बातें भी होने लगी हैं. लेकिन सभी दलों को सोचने का सबक भी मिल गया है. जो अखिलेश के लिए बेहद ख़ास है.

यूपी हारने के बाद अखिलेश के चेहरे पर एक अलग तरह का बदलाव है. जिसे कम लोग पढ़ पा रहे हैं. बातों में एक टीस झलकती. आवाज़ में एक दर्द छलकता है. और इन सबका सार निराशा बनकर टपकता है. सपा की हार किसी भी चाणक्य को हैरान कर देने वाली है. और बीजेपी की ऐसी जीत भी सबको भौंचक्का कर चुकी है. ऐसे में ज़रूरी हो जाता है. ये जानना कि इस जीत और सपा की हार के क्या कारण हो सकते हैं. क्यों कि हर चीज़ के पीछे कोई न कोई वजह ज़रूर होती है. तो सपा की हार के भी कई कारण हैं.

रार-तक़रार की सियासत का उल्टा असर

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चुनावों से कापी पहले ही समाजवादी पार्टी में मची कलह उपजी थी. पजाई गई थी. या सुनियोजित थी. इसमें से कुछ भी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. लेकिन जिस तेजी से सारा घटनाक्रम पेश आया. उससे जनता में कई तरह के ग़लत संदेश गए. जिसके नतीजे में जनता की सहानुभूति मिलने के बजाय. जनता के मन में ग़ुस्सा पनपने लगा. जिसे शांत करने की कोशिश नहीं की गई. कुछ ऐसा ही हाल पार्टी के कार्यकर्ताओं की रही. उनके बीच भी इस घटनाक्रम का ग़लत संदेश गया. लिहाज़ा गांव देहात में जिस कार्यकर्ता के ज़रिये घर घर तक सपा पहुंचती रही. वो पहुंच इस बार नहीं बन सकी.

सपा की बजाय अकेले अखिलेश मैदान में उतरने की भूल

रार तक़रार के बाद फ़ाइनली अखिलेश ने चाचा और पिता दोनों से रिश्ते तर्क करके अकेले मैदान में उतरने का फ़ैसला किया. शायद ये सोच के कि इस पूरे रार-तक़रार की कहानी के बाद अकेले जनता के बीच जाने पर जनता की सहानुभूति मिलेगी. जो मिला ही नहीं. जनता विरोधियों की बात पर गडौर करने लगी. कि जिस मुलायम ने सींच कर सपा को इतना बड़ा किया.आज उसी सपा और उली मुलायम का जो बेटा न हुआ. वो जनता का क्या होगा. इस तरह लोगों में अखिलेश के प्रति ग़ुस्सा पनप गया होगा.

अखिलेश को काम का था गुमान

अखिलेश ने बेशक यूपी में पहले के मुख्यमंत्रियों के मुक़ाबले बड़े और बेहतर काम किये. जनता के हित के कई काम किये. लेकिन इन कामों का प्रचार प्रसार करने में वो पीछे रह गए. ऐसा इसलिए भी हुआ. क्यों कि इस काम को जनता तक पहुंचाने का जो काम पहले कार्यकर्ता करते थे. वो सत्ता में आने के बाद उनसे काफी दूर हो गए थे. कार्यकर्ताओं से मिलने का कोई तय समय या बीच बीच में उनसे मिलकर संगठन और ज़िलों में पनप रही अंदरूनी राजनीति की ख़बर नहीं ले सके. जिसका नतीजा ये हुआ. कि कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करने लगे. और चुनावों में वो जुझारूपन नहीं दिखाया. जो पहले दिखाते रहे हैं. अखिलेश को अपने कार्यकर्ताओं को. औऱ ख़ास तौर से फ्रंटल संगठनों को अपना आंख-कान बनाना होगा. ताकि ज़िले में पार्टी की अंदरूनी सियासत के साथ ही ब्यूरोक्रेसी की सटीक ख़बर मिलती रहे. और उनको अपनी ताक़त समझने वाले ज़िले के हर हिस्से में मौजूद मिलें. इतना ही नहीं. अखिलेश ये मुग़ालता भी पाल बैठे थे. कि इन सबके बीच वो अपने काम के बूते जीत जाएंगे. वो भूल गए. कि जनता काम को कम देखती है. जाति बिरादरी. हवा हवाई मुद्दे. इन सारी चीज़ों पर फोकस ज़्यादा करती है. अगर ये जनता विकास देखकर ही वोट देती. तो आन्ध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू को भला कौन हरा पाता. शिवसेना महाराष्ट्र में कौन सा काम करा चुकी है. जो हर बार भारी बरकम सीटें जीतती रही. लालू ने बिहार में कितना काम कर दिया था. जो लंबे समय तक राज किया. वोट पाने के लिए कई तरह के हथकंडों का इस्तेमाल किया जाता है. इसकी सीख अखिलेश को लेनी होगी.

जातीय समीकरण साध नहीं सके

यूपी का चुनाव जातीय समीकतरणों के बूते ही जीते जाते हैं. इस बात को पूरी तरह अखिलेश ने नज़रअंदाज़ किया. बीजेपी शुरू से ही दलितों में ग़ैर जाटव औऱ पिछड़ों में ग़ैरम यादवों पर अपनी आंखें गड़ाए रखी थी. जिसकी उन्हें पूरी जानकारी भी थी. लेकिन इसके लिए कोई क़दम नहीं उठाया. 17 अन्य पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में मिलाने का प्रस्ताव भी काफी देर के बाद केन्द्र के पाले में भेजा. जिसका बीजेपी ने कई तरह से फ़ायदा लिया. ये दांव टाइमिंग की वजह से अखिलेश पर उल्टा पड़ गया. नतीजे में बीजेपी दलितों और ओबीसी को तोड़ने में और कामयाब हो गयी. यही वोट समाजवादी आंदोलन के बाद से सपा के पास मौजूद था. जिसकी कोई काट चुनावों में विरोधी तलाश नहीं पाते थे. क्यों कि ये मुसलमानों की तरह एकजुट और विज़िबिल नहीं था. लेकिन हमेसा रहा सपा के पास ही. सपा ने इसको खोकर सबकुछ खो दिया.

मुसलमानों की अनदेखी

अखिलेश यादव मुसलमानों में पनप रहे गुस्से और उपेक्षा की भावना को समझने में पूरी तरह नाकाम रहे. सपा ने पारंपरिक तौर पर मुसलमानों को मैदान में उतारा ज़रूर. लेकिन यादव बिरादरी में ये संदेश देना भूल गए. कि इसको जिताकर सपा को मज़बूत करेंगे. तभी तो मुसलमान उन सभी सीटों पर हार गए. जहां मुसलमान औऱ यादव समीकरण बिठाकर टिकट दिये गए थे. यहां यादव मतदाताओं ने अपनी अक्सरियत के बावजूद मुस्लिम चेहरे को विधायक चुनने के बजाय किसी बीजेपी वाले को वोट देना बेहतर समझा. जिसका नतीजा ये हुआ. कि ऐसी सभी सीटें बीजेपी हार गई. इस रवैय्ये का मलाल इस मुस्लिम समाज को घर भी करने लगा है. जो पहले की तुलना में इस बार ज़्यादा है. तो ये समझ लेना चाहिए. कि मुसलमानों की इस भावना को विरोधी बसपा और भाजपा आगे भी भुनाने की कोशिशें ज़रूर करेंगे. अगगर इतने पर भी सपा संभल गई. तो गृनीमत. वरना. M-Y का तानाबाना सदा सदा के लिए ख़त्म हो जाएगा. और ज़्यादा संभव है. कि कोई नई सियासी शक्ल नज़र आए.

मुख़्तार अंसारी की अनदेखी

दाग़ी और क्रिमिनल के नाम पर अखिलेश यादव ने बहुत बड़ी भूल की. वो ये कि क़ौमी एकता दल का पहले विलय. फिर उससे नाता तोड़ना. इस घटना क्रम ने इन्को कहीं का नहीं छोड़ा. जिस क्राइम के नाम पर मुख़्तार अंसारी परिवार से सियासी नाता तोड़ा. वो क्राइम किसी और नेता में क्यों नहीं देख सके. गायत्री प्रजापति से लेकर राजा भैय्या तक के मामने में अखिलेश बेनक़ाब हो गए. दो मुहांपन सामने आ गया. इसका नतीजा ये हुआ. कि लिबरल वोटर तो दूर हुआ ही. मुस्लिम और अन्य बिरादरी निनके लिए मुख़्तार अंसारी किसी देवता सेकम नहीं हैं. जो लोग मुख्तार अंसारी को पूर्वांचल का रॉबिनहुड मानते हैं. वो अखिलेश को अपना वोट देने से गुरेज़ करने लगे. जिसका सीधा फायदा बीजेपी और बीएसपी को मिला.

बीजेपी के माउथऐड का तोड़ नहीं

अखिलेस एकसूत्री कार्यक्रम की तरह स्टीरियो टाइप प्रचार करते रहे. जबकि विरोधी बीजेपी समय समय पर सर्वे के ज़रिये जनता की नब्ज़ टटोलकर अपने प्रचार का अंदाज़ बदलती रही. इस दरम्यान ध्रुवीकरण का अपना अजेंडा भी वो नहीं भूली. इसके उलट अखिलेश को कई क़दम उठाने चाहिए थे. जो वो नहीं कर सके. बीजेपी नेता मंच से राहुल-अखिलेश की जोड़ी को मौक़ापरस्त सियासत की एक जोड़ी क़रार देते रहे. ऐसे में इन दोनों को प्रदेश की जनता को विकास और समाज की एक नई तस्वीर पेश करनी चाहिए थी. कई उम्मीदें जगानी चाहिए थी. लेकिन अफ़सोस. ऐसा कुछ भी ये नहीं कर सके. लिहाज़ा जनता के बीच हार गए. इतान ही नहीं बीजेपी मंचों से अलग बूथ लेवल पर घर घर जाकर लोगों से मौखिक संवाद करते दिखे. इस दौरान मोदी को अवतारी बताकर कई तरह की भावनाएं तक जगाई गईं. लेकिन अखिलेश का ख़ेमा ऐसा कुछ भी नहीं कर सका. नतीजे में मोदी की बयार बहती ही गई. और कांग्रेस के पीके भी एन बातों से अंजान बने रहे. ऐसा कोई मैजिक बुलेट कम से कम अखिलेश को तो दागना चाहिए था. मगर ऐसा हुआ नहीं. नतीजे में इनको हारना ही था.

माया को दुश्मन नंबर दो समझते रहे

अखिलेश अपने भाषणों की दिशा और रणनीति तय नहीं कर सके थे. शायद उनके पास चुनाव संचालन के लिए अनुभवी रणनीतिकार नहीं था. जो ये बता सकता. कि कब माया को और कब मोदी को और किस हद तक निशाने पर लेना है. इसका नतीजा ये दिखा. कि अखिलेश ने हमेशा बीजेपी और मोदी को अपने निशाने पर रखा. और बीजेपी अखिलेश को निशाने पर लेकर आक्रामक अंदाज़ में हमले करती रही. जिससे सरकार विरोधी लहर पैदा भी हुई. और आख़िरी दौर तक तेज़ी से बहने भी लगी.

पिता का सियासी ट्रैक छोड़ना

अखिलेश और मुलायम की समाजवादी पीढ़ी के बीच समाजवादी मिज़ाज में जो बड़ा बदलाव देखने को मिला वो ये रहा. कि अखिलेश ने रिश्तों को तोड़ने में कभी देरी नहीं की. जबकि मुलायम सभी को साथ लेकर चलने के माहिर रहे. नको अंदाज़ा रहता था. कि कब किसका कितना इस्तेमाल किया जा सकता है. वो मौक़ापरस्ती के माहिर माने जाते हैं. जबकि इस मामने में अखिलेश नौसिखिये नेता से भी कमज़ोर साबित हुए. औऱ डिंपल यादव भी मंचों पर आकर इससे आगे का कोई संदेश नहीं दे सकीं. कि हम दो युवा जोड़ी हैं. अखिलेश भैय्या हैं. औऱ हम आपकी भाभी हैं. उनको रार-तक़रार के बाद भी शिवपाल-मुलायम और इनके जैसे तमाम नेताओं से तालमेल दिखाना चाहिए था. लेकिन वो ऐसा करने के बजाय सीधे सियासी मंच पर जा पहुंचीं. जिसका ग़लत संदेश गया. अगर मुलायम चुनाव प्रचार में उतरे होते. तो समाजवादी पार्टी का निष्ठावान वोटर और कार्यकर्ता दोनों चुनाव में खुलकर भाग लेते. और सपा की ऐसी दुर्गति न होती.

कांग्रेस से हाथ मिलाने की भूल

शाहिद परवेज

अखिलेश ने कांग्रेस से हाथ मिलाने की सबसे बडी भूल की. इसका ख़ामियाज़ा आगामी चुनावों में भी भुगतना पड़ सकता है. वो इसलिए. क्योकि सपा जिस मुस्लिम वोटबैंक को अपनी विरासत और थाती समझती आयी है. जिससे सियासी नाता जोड़ा वो कभी कांग्रेस का मूल वोटर हुआ करता था. जिस कांग्रेस के साथ अखिलेश और डिंपल ने गलबहियां करते खुद को इस क़ौम के सामने पेश किया. उसको दशकों पहले ही इस क़ौम ने सियासी धोखे की बुनियाद पर तलाक़ दे दिया था. और कुथ वैसी ही सोच मुस्लिम आरक्षण और अन्य सपाई वादों के पूरा न होने पर मन में पनप चुका था. जो कांग्रेस के साथ गलबहियां करते देखकर काफी हद तक ग़ुस्से में तब्दील हुआ. औऱ नतीजे में बीएसपी की मुस्लिम मिलाओ मुहिम को बल मिल गया. और ये मुस्लिम वोट बैंक सपा के पास बहुत ज़रा सा ही रह गया. जो आगे और भी कम हो जाएगा. इस बात का पूरा अंदाशा है. और संभव है. कि ये वोटबैंक ही समाजवादी पार्टी से तलाक़ का ऐलान भी कर दे. ये क़ौम ब ये भी जानने में ऐतिहासिक दिलचस्पी ले रही है. कि कांग्रेस ने मुसलमानों की जड़ें खोदने और रीढ़ काटने में परिसीमन. आरक्षण और दलितों के लिए मुस्लिम बाहुल्य सीटों को रिज़्रव करने समेत नौकरियों से बेदख़ल करने में कितने तरह की साज़िशें और कैसी कैसी साजिशें करती रही है. ऐसे में कांग्रेस के साथ जाकर सपा उसी दंगे फसाद की साज़िशों और मुसलमानों से दुश्मनी साधने का दोस्तान अंदाज़ और फॉर्मूला ही दिखा रही है. इसके विरोध में मुसलमान और तेज़ी से बीएसपी की ओर भागेगा. तब बीजेपी के लिए मुश्किलें थोड़ी ज़रूर बढ़ेंगी लेकिन पर्दे के पीछे से सियासत करने वाली कई सियासी पीढ़ियां बेनक़ाब हो जाएंगी. हो सकता है. कि तब ये चोट खाई क़ौम छुपे दुश्मनों से बेहतर बीजेपी को अपना दोस्त बनाने का ऐलान भी कर दे. किसी भी दल को ये नहीं भूलना चाहिए कि मुसलमान सदा से भावनाओं की बुनियाद पर वोट करता आया है. इसी कमी का फ़ायदा सियासतदान अबतक उठाते भी रहे हैं. वरना इन क़ौम में सियासी सोच पनपने में देर ही कितनी लगेगी.

(यह लेखक के निजी विचार हैं. जरुरी नहीं की कोहराम न्यूज़ उपरोक्त विचारों से सहमत हो)

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