तारिक अनवर चंपारणी: जाति देखकर होती है बीबीसी में पत्रकारों की नियुक्ति?

5:58 pm Published by:-Hindi News

बीबीसी हिंदी न्यूज़ सर्विस में दो लड़कियों की एक साथ बहाली होती है। एक लड़की जामिया मिल्लिया से हिंदी पत्रकारिता में बैचलर डिग्री, मास्टर डिग्री, बाद में एमफिल की डिग्री ले चुकी है। वह IIMC जैसे पत्रकारिता के संस्थान में भी पढ़ाई कर चुकी है। दूसरी लड़की दाँतों का ईलाज करने वाली पद्धति डेंटल की पढ़ाई की है और बाद में कही से पत्रकारिता की डिग्री लेती है। किसी जुगाड़ के दम पर एनडीटीवी में रविश कुमार के साथ काम करना शुरू कर देती है। सितंबर, 2017 में दोनों लड़कियों की बहाली बीबीसी में होती है। जुलाई, 2019 आते-आते दूसरी वाली लड़की यानी डेंटिस्ट का प्रोमोशन होजाता है। जब्कि पहली वाली लड़की को बिना किसी कारण के नौकरी से निकालने की  नोटिस थमा दी जाती है। बस फ़र्क़ यही है कि नौकरी से निकाले जाने वाली पहली लड़की राजस्थान के एक दूरस्थ गाँव की दलित है और उसके सर पर किसी बड़े पत्रकार का हाथ नहीं है जब्कि प्रोमोशन पाने वाली डेंटिस्ट लड़की हरियाणा की जाट है और सर पर रविश कुमार जैसे बड़े पत्रकारों का हाथ है। यह ब्राह्मण ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन(BBC), दिल्ली का जातिवादी चरित्र है।

ब्राह्मण ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन(BBC) में आठ पत्रकारों की बहाली एकसाथ होती है। उन आठ पत्रकारों में से एक दलित महिला भी है। बल्कि हिंदी विभाग में एकमात्र दलित महिला है। संभवतः पूरे हिंदी विभाग में पुरुष एवं महिला में अकेली दलित है। शेष के सात पत्रकारों को पर्मानेंट कर दिया जाता है और एक दलित महिला पत्रकार को कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्ति दी जाती है। नियुक्ति के बाद भी पद रिक्त होने के बाद पर्मानेंट करने के नाम पर उसके कॉन्ट्रैक्ट को एक वर्ष के लिए बढ़ाया जाता है। इसी बीच कुछ नये पत्रकारों की बहाली होती है और उन सभी लोगों को पर्मानेंट कर दिया जाता है। यहाँ तक कि ब्रॉडकास्ट जॉर्नलिस्ट के पद से कुछ लोगों को सीनियर ब्रॉडकास्ट जॉर्नलिस्ट में पदोन्नति कर दी जाती है और उस दलित महिला पत्रकार की नौकरी ख़त्म करने की नोटिस थमा दी जाती है। यह काम एक ऐसे संस्थान में होरहा है जिसे सामाजिक न्याय का एकमात्र प्रवक्ता होने का घमण्ड है। उसके बावजूद भी इतने बड़े संस्थान में एक दलित पत्रकार नहीं टिक सकती है। दलितों को भागीदारी देने के नाम पर सबसे अधिक बेचैनी यह पढ़े-लिखें लिबरल समाज को होती है।

जबसे बीबीसी का क्षेत्रीय कार्यालय लंदन से दिल्ली शिफ़्ट हुआ है तभी से यह ब्राह्मण ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन(BBC) बन गया है। पूरे हिंदी विभाग में एक दलित और एक अतिपिछड़ा पत्रकार था। जुलाई के बाद से एकमात्र दलित पत्रकार की छुट्टी कर दी जायेगी। जब्कि एकमात्र अतिपिछड़ा पत्रकार को भी नोटिस थमा दिया गया है। यानी के मनुस्मृति का पालन सिर्फ़ भाजपा और आरएसएस की विचारधारा के लोग ही नहीं करते है बल्कि यह बीबीसी जैसे संस्थानों के तथाकथित लिब्रल और प्रोग्रेसिव समाज के लोग भी करते है।

लोकसभा चुनाव के पूर्व पटना में बीबीसी का एक कॉन्क्लेव हुआ था। उस कॉन्क्लेव को चेयर करने के लिए ब्राह्मण ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन(BBC) में भारतीय भाषाओं की एडिटर रूपा झा स्वयं आयी थी। उसी कॉन्क्लेव में रूपा झा पब्लिकली स्वीकार क़री थी कि उन्हें उनकी जाति(ब्राह्मण) का अप्रत्यक्ष लाभ मिलता है। यूट्यूब पर वीडियो उपलब्ध है। अब जब ख़ुद बीबीसी की एडिटर रूपा झा अप्रत्यक्ष लाभ लेकर पहुँची है तब ज़ाहिर सी बात है कि वह भी बीबीसी में अपनी स्वजातीय अर्थात ब्राह्मणों को तावज़्ज़ो देती होंगी। लेकिन तवज़्ज़ो देने का यह बिल्कुल अर्थ नहीं होता कि 60 पत्रकारों में से लगभग 25 पत्रकार सिर्फ़ ब्राह्मण जाति से बहाल कर दी जाये। शेष के पदों पर सवर्ण समाज की अन्य जातियों से पत्रकार बहाल कर दी जाये। यानी के दिखावा के रूप में भी दलितों या अन्य पिछड़ी जातियों से एक भी पत्रकार को बहाल नहीं किया जाये। नागपुर वाले नारंगियों ने भी औपचारिकता के लिए ही सही मग़र सभी जातियों को जगह दिया है। मग़र यह लिबरल और प्रोग्रेसिव समाज के बीबीसी वाले तो बिल्कुल जातिवादी चरित्र के निकले। यानी ब्राह्मणवादी ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन अभी भी दलितों को अछूत समझ रखा है। क्या पूरे भारत मे एक भी दलित इस योग्य नहीं है कि वह बीबीसी में पत्रकारिता कर सके? बिना दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, पिछड़ी जातियों के भागीदारी के समतामूलक समाज बना पाना मुमकिन है?

नारीवाद का सारा चोला उतर जाता है जब सामने दलित नारी होती है। ब्राह्मण ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन(BBC) में एकलौती दलित पत्रकार की नौकरी ख़त्म कर दी जाती है। मग़र सामाजिक न्याय के मसीहा बने पत्रकारों के कानों तक जूं नहीं रेंगता है। उनको यह भी फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि एक संस्थान में केवल सवर्ण जाति के लोग उसमें से भी लगभग 25 ब्राह्मण पत्रकार कैसे हो सकता है? जब उस एकलौती दलित लड़की जो लगभग दो वर्षों से बीबीसी में नौकरी कर रही थी उसको निकाला जा रहा था तब सवर्ण नारीवादियों की संवेदना ब्राह्मणवाद के चादर में लिपट गयी थी। दलित होना और उसमें भी महिला होना डबल चैलेंज है।

योग्यता को मापने का अपना तरीक़ा होता है। योग्यता को मापने के लिए लिखित या मौखिक परीक्षा होती है। ब्राह्मण ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन(BBC) में एक दलित महिला पत्रकार की बहाली होती है। वह भारतीय भाषा विभाग बीबीसी की अकेली दलित पत्रकार है। वह दस पन्नों का लिखित परीक्षा देती है। फ़िर एक घण्टा तक मौखिक परीक्षा देती है। उसके बाद बीबीसी में उसकी बहाली होती है। एक वर्षों तक उसको कॉन्ट्रैक्ट पर रखा जाता है। फिर एक वर्ष के लिए उसका कॉन्ट्रैक्ट बढ़ा दिया जाता है। इन दो वर्षों से कम समय में भी वह 50 से अधिक स्टोरी करती है। लेकिन उसको पर्मानेंट नहीं किया जाता है। जब्कि उसके अन्य साथियों को पर्मानेंट कर दिया जाता है। बल्कि दलित महिला पत्रकार को उल्टा नौकरी से हटाकर ब्राह्मण ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन का शुद्धिकरण कर दिया जाता है। बीबीसी में कुछ ऐसे भी पत्रकार है जिसने नियुक्ति के बाद पिछले दो वर्षों से एक भी स्टोरी नहीं किया है। मग़र उनकी पर्मानेंट नौकरी हो चुकी है। मैं जल्द ही बीबीसी के उन पत्रकारों का नाम आपसे शेयर करूँगा जिसने अबतक एक भी स्टोरी नहीं किया है मगर मलाई चाप रहे है।

तारिक अनवर चंपारणी की कलम से निजी विचार…

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