Sunday, January 23, 2022

रवीश कुमार: क्या युवा अपने माता-पिता को व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी से निकाल सकते हैं ?

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कभी प्रकाशक के यहाँ नहीं जाना चाहिए। बहुत सारी किताबें आपको अधूरेपन के भय से भर देती हैं। लगता है कितना कम वक्त है और कितना सारा पढ़ना है। कुछ के कवर खींचते हैं तो कुछ के नाम। इसी बीच एक और ज्ञान प्राप्त हुआ। इन किताबों को देखते रहना भी जानना है। इनकी सूचियाँ बताती हैं कि कितने अलग-अलग विषयों को लोगों ने जानने का प्रयास किया है। ज्ञान-संसार की रूपरेखा का अहसास होता है। किताबों के कवर को उनके भीतर की सामग्री से देखना भी अच्छा है। आप एक या अनेक कलाकारों को जानने लगते हैं।

कई बार अधूरापन अच्छा होता है। पता चलता है कि आपके भीतर कुछ नया भरने की जगह है। और सबसे अच्छी बात। प्रकाशक का दफ़्तर कभी पुराना नहीं लगता। कोई न कोई नई किताब आ रही होती है या आ चुकी होती है। पुरानी किताब भी अचानक नई और ज़रूरी लगने लगती है। इसलिए प्रकाशक के यहाँ हमेशा जाना चाहिए।

राजकमल प्रकाशन गया था। श्वेत श्याम होते जा रहे अपने संपादक प्रिय को मनाना था। रंगीन फूलों की तस्वीरें लेते लेते अचानक वे रात के अंधेरे में टार्च बार कर फ़ोटो लेने लगे थे। ये मुझे अच्छा लगते हुए भी अच्छा नहीं लग रहा था। देर रात घर लौटने वाला कहाँ से अंधेरे में लाल गुलाब के फ़ोटो लेगा।अपने क्रोध को कलात्मक रूप देने के लिए जलती आग के फ़ोटो लेने लगे। मैं तभी समझ गया कि यह कला नहीं बला है।

राजकमल प्रकाशक में गर्दन उचका उचका कर किताबें देखता रहा। एक किनारे नए कवर में दिनकर की सारी किताबें रखी थीं। मुझे नहीं पता था कि दिनकर ने लोकदेव नेहरू के नाम से किताब लिखी है। यही नहीं उनकी एक और किताब पर पहली बार नज़र पड़ी। विवाह की मुसीबतें।

वहीं पर पहली बार वंदना राग से मुलाक़ात हुई। उनकी एक नई रचना आ रही है। बिसात पर जुगनू। फिर अशोक कुमार पांडेय आ गए जिनकी किताब कश्मीरनामा का यहाँ कई बार ज़िक्र किया है। इस बार कश्मीरी पंडितों पर किताब आ रही है। कश्मीर और कश्मीरी पंडित (बसने और बिखरने के 1500 साल)

पुस्तक मेले की तैयारियों के बीच संपादक और उनके सहयोगियों का वक्त बर्बाद कर बहुत संतोष हुआ। इससे उन्हें आराम हुआ। उनका लंच भी खा लिया। इससे मेरा मोटापा बढ़ाने। पर कोई बात नहीं। यह सब चलता है। मुझे कौन सा राजेश खन्ना बनना है।

जिन मित्रों में से किसी ने पिछले तीन चार साल या दस साल से कोई किताब नहीं पढ़ी है उनसे यही कहूँगा कि कुछ पढ़िए। आप को बहुत कुछ छूटा हुआ मिलने लगेगा। आप बदलने लगेंगे। कुछ भी पढ़ सकते हैं और अपनी विषय सूची बना सकते हैं कि क्या पढ़ना चाहिए।

मेरे पेज पर जो नौजवान हैं वो अपने माता पिता की कॉपी चेक करें। उनसे पूछें कि आपको कभी तो कश्मीर पर एक किताब पढ़ते नहीं देखा! पूछिए तो सही। टीवी सीरीयल और घटिया चैनल देखकर वे आप नौजवानों पर फ़ालतू रौब गाँठते रहते हैं। अपने माँ बाप को व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी से निकालना भी एक नागरिक का कर्तव्य है। होता यह है कि दहेज में स्कूटर और सैलरी मिलने के बाद असंख्य पिता पढ़ना बंद कर देते हैं और अपने आधे अधूरे बकवासों से लोकतंत्र में गंध फैलाते रहते हैं। इनको बदल दीजिए देश बदलने लगेगा। युवा खुद भी व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी से निकलें।

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