कश्मीरियों का जितना खून बहेगा हिंदी पट्टी में भाजपा का वोट बैंक उतना ही मजबूत होगा… मोदी सरकार ने शान्त हो रही घाटी को नब्बे के दशक में धकेल दिया…

एक ऐसे समय में जब खून के दरिया में गोते लगा रहे कश्मीर में शांति स्थापित करने के राजनैतिक प्रक्रिया शुरू करने की सबसे ज्यादा ज़रूरत थी भाजपा और मोदी सरकार ने वहां अपनी हिमायत और साझे में चल रही महबूबा मुफ़्ती की सरकार को गिरा कर भले ही अपना सियासी हित साध लिया हो लेकिन कश्मीर की जनता को जो पैगाम दिया है वह बहुत ही खतरनाक है और इसके दूरगामी दुष्परिणामों सहज ही अंदाजा किया जा सकता है।

लगभग सभी सियासी विश्लेषक वरिष्ट पत्रकार और बुद्धजीवी वर्ग का इस बात पर मतैक्य है कि मोदी सरकार ने अचानक इतना बड़ा फैसला 2019 के लोक सभा चुनाव के दौरान उग्र हिंदुत्व की मुहिम को और धारदार बनाने के लिए किया हैI गुजरात और कर्नाटक विधान सभा के चुनावों के बाद लोक सभा विधान सभा और स्थानीय निकाय के चुनावों में भाजपा को ज़बरदस्त हार का सामना करना पडा है जिससे आगामी लोक सभा चुनावों के लिए अवाम के मूड का पता चलता है।

राजस्थान मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधान सभा के आगामी चुनावों में भी भाजपा को सफलता की कोई ख़ास उम्मीद नहीं दिखाई पड़ रही है उत्तर प्रदेश और बिहार में महागठबंधन ने उसकी रातों की नींद उड़ा रखी है। एक तरफ उसके खिलाफ विपक्ष लामबंद हो रहा दूसरी ओर उसके अपने गठबंधन के साथी अब उसे आँखें दिखाने लगे हैं। शिव सेना और तेलुगू देशम पार्टी ने तो अकेले चुनाव लड़ने का एलान ही कर दिया है। बिहार में नितीश कुमार ही नहीं उपेन्द्र कुशवाहा और राम विलास पासवान भी आँखें दिखाने लगे हैं।

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आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा के मुद्दों पर भाजपा बुरी तरह बैकफुट पर है, ऐसे में उग्र हिंदुत्व और आक्रामक राष्ट्रवाद के अलावा और कोई रास्ता उसे 2019 की वैतरणी पार करने के लिए नहीं दिखाई दे रहा है, मगर जम्मू कश्मीर में महबूबा मुफ़्ती की पीडीपी के साथ मिल कर उसका सरकार चलाना उसको नुकसान दे दिखाई दे रहा था। इस लिए जिस राष्ट्रहित के नाम पर उसने लगभग साढ़े तीन साल पहले जो सरकार बनाई थी उसी राष्ट्रवाद के नाम पर अब उसने वही सकरार गिरा दीI इस फैसले से केवल दो दिन पहले ही गृह मंत्री राजनाथ सिंह जम्मू कश्मीर के दौरे पर गए थे और वहां उन्होंने शांति बहाली और राजनैतिक प्रक्रिया शुरू करने जैसी मनमोहक बातें की थीं। एक ओर वह श्रीनगर में मीठी-मीठी बातें कर रहे थे दूसरी और दिल्ली में कोई दूसरी ही खिचड़ी पाक रही थी।

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राजनाथ सिंह को भी नहीं पता था मोदी-शाह-डोभाल तिकड़ी का फैसला

कहा जाता है कि कश्मीर में सरकार गिराने औए वहां राष्ट्रपति शासन लागू करने ला फैसला प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित दोवल के बीच हुए सलाह मशविरे से हुआ जिससे गृह मंत्री राजनाथ सिंह तक को शामिल नहीं किया गया था।

यह भी कहा जाता है कि रमजान के महीने में जो सीजफायर का फैसला हुआ था, महबूबा मुफ़्ती उसे ईद बाद भी जारी रखना चाहती थीं, लेकिन उन्ही के मंत्रीमंडल के भाजपाई सदस्य और खुद केंद्र सरकार इसके लिए राज़ी नहीं हुई तो महबूबा मुफ़्ती को यह भाजपा से पिंड छुडाने का बढ़िया मौक़ा लगा और वह त्यागपत्र देने की सोच ही रही थीं, जिसकी भनक भाजपा को लग गई और उसने तेज़ी से क़दम उठाते हुए महबूबा मुफ़्ती का खेल बिगाड़ दियाI

एक दूसरे पर विश्वास नहीं था पीडीपी और भाजपा को

कारण कोई भी रहा हो यह तो साफ़ है कि सत्ता पर काबिज़ दोनों पार्टियों पीडीपी और भाजपा को एक दूसरे पर कोई विश्वास नहीं था। दोनों केवल सत्ता के लिए साथ थीं। इसका प्रभाव सरकार चलाने पर बुरी तरह पड़ रहा था, प्रशासन अपंग हो चुका था, हर कोई अपनी मनमानी कर रहा था। इतने संवेदनशील राज्य में इस तरह की नीरो जैसी हालत का जो परिणाम होना चाहिए था वह सामने था। इसका राजनैतिक अंजाम यह भी था कि घाटी में महबूबा मुफ़्ती की पीडीपी और जम्मू में भाजपा अपनी लोकप्रियता तेज़ी से खो रही थीं इसलिए दोनों एक दूसरे से छुटकारा हासिल करना चाहती थीं जिसमें भाजपा बाज़ी मार ले गई।

केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद से ही कश्मीर और पाकिस्तान को ले कर केंद्र की एक ढुलमुल पॉलिसी रही है जिसके कारण वहाँ के हालात बद से बदतर होते हुए अंतत: बेकाबू हो चुके हैंI भाजपा की नजर हिंदी बेल्ट में अपने वोट बैंक पर रहती है, अतः इन दोनों मोर्चों पर वह राष्ट्र के व्यापक हित के बजाय अपने राजनैतिक हित को मद्देनज़र रख कर काम करती है। इसी कारण वह कश्मीर में ईंट का जवाब पत्थर नहीं बल्कि गोली से देने की पॉलिसी पर अमल कर रही है, जबकि अटल जी और डॉ मनमोहन सिंह ने जख्मों पर मरहम रखने की पॉलिसी अपनाई थी। मोदी जी ने इस पॉलिसी को जय राम जी की बोल दिया, जिससे हिंसा और प्रतिहिंसा का दौर शुरू हुआ, जिसका फायदा सरहद के उस पार बैठे भारत के दुश्मनों ने उठाया उन्हें कश्मीरी नवजवानों को बरगलाने का मौक़ा मिल गया।

मोदी सरकार ने शान्त हो रही घाटी को नब्बे के दशक में धकेल दिया

मोदी सरकार बनने से पहले घाटी लगभग शान्ति हो गई थी जिंदगी ढर्रे पर वापस आ रही थी, सैलानियों की आमद बढ़ गई थी जिससे रोजगार के मौके बढ़े थे, फिल्म इंडस्ट्री फिर से शूटिंग के लिए अपनी सबसे पसंदीदा जगह वापस आने की तैयारी कर रही थी। सबसे बड़ी बात आतंकवादी घटनाएँ बहुत कम हो गई थीं, जो सरकारी रिकॉर्ड द्वारा कोई भी पता लगा सकता है। यहाँ तक कि तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने शहरों से सेना हटाने तक की मांग रख दी थी, लेकिन देखते ही देखते सब कुछ बदल गया और घाटी फिर नब्बे की दशक वाली हालात में पहुँच गई है। पूरी घाटी इस समय विरोध का पर्याय बनी हुई है। सुरक्षा बलों की सख्ती भी चरम पर है और पत्थरबाजों की दीदादिलेरी भी ऐसा लगता है कश्मीरी अवाम के दिलों से मौत का तांडव देखते देखते मौत का खौफ निकल चुका है।

एक कथित पत्थर बाज़ को फ़ौज की जीप के बोनट पर बाँध कर उसे तीस पैंतीस किलोमीटर घुमाया जाता है, एक और को फौजी जीप से कुचल कर मार दिया जाता एक और को सुरक्षा बलों के कुछ बहादुर जवान कहीं घर में पकड़ कर उसे बाल खींच-खींच कर पीटते हैं और उस से पाकिस्तान मुर्दाबाद और हिंदुस्तान जिंदाबाद का नारा लगाने को कहते हैं। ऐसी तस्वीरें जब सोशल मीडिया पर वायरल होती है और भारतीय टीवी चैनलों पर जब उन पर घोर साम्प्रदायिक और मूर्खतापूर्ण बहस होती है, तो भाजपा का हिन्दुत्ववादी वोट बैंक भले मज़बूत होता हो, लेकिन घाटी के लोग भारत से भावनात्मक रूप से और दूर हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि भारत की सरकार ही नहीं बल्कि शायद आम भारतीय भी कश्मीर की सरज़मीन को तो अपना समझते हैं, लेकिन कश्मीर के अवाम को नहीं, जबकि उनको एक ऐसे कंधे की हमेशा से तलाश रही है जिस पर सर रख के वह रो सकें, और मौत का तांडव देखते-देखते जिस अवसाद से वह गुज़र रहे हैं वह कुछ हल्का हो। यह कंधा अटल जी ने पेश किया था। यही कारण है कि आम कश्मीरी के दिल में अब भी अटल जी का बड़ा मान सम्मान है और हुर्रियत के नेता तक कहते हैं कि अटल जी ने जहां से सिलसिला शुरू किया था वहीँ से फिर शुरू किया जाय।

मनमोहन सिंह ने अटलजी के सिलसिले को आगे बढ़ाया

दरअसल मनमोहन सिंह ने उसी सिलसिले को आगे बढ़ाया था। पहले सर्वदलीय संसदीय दल भेजा गया, जिसने वहां समाज के सभी वर्गों से मुलाक़ात की, बातचीत की, उनकी सुनी, अपनी कही। उसकी रिपोर्ट की बुनियाद पर फिर एक तीन सदस्यीय कमिटी बनी जिसने कई महीने तक घाटी में रह कर वहाँ की ज़मीनी सच्चाई को समझा और अपनी रिपोर्ट सरकार को पेश की। लेकिन तब तक डॉ मनमोहन सिंह की सरकार का इकबाल धूल में मिल चुका था। वह विपक्ष ख़ास कर भाजपा और भारतीय मीडिया ख़ास कर कुछ चैनलों के दबाव में आ चुकी थी। अतः वह इस रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई न कर सकी।

तब से अब तक वह रिपोर्ट गृह मंत्रालय के दफ्तर की फ़ाइलों में दबी पड़ी है। उस रिपोर्ट को फाइलों से निकाल कर उस पर गौर और विचार विमर्श करने के बजाय मोदी सरकार ने एक और रिटायर्ड अफसर को उसी काम के लिए तैनात किया, जिन्होंने भी अपनी प्रारम्भिक रिपोर्ट में ही वहाँ राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने की सिफारिश की, जिसका आगाज़ मोदी सरकार ने वहां की चुनी हुई उस सरकार को गिरा कर किया जिसमें वह खुद बराबर की साझीदार थी।

कश्मीरियों का जितना खून बहेगा हिंदी पट्टी में भाजपा का वोट बैंक उतना ही मजबूत होगा

चुनी हुई सरकार गिराने और गवर्नर शासन लग जाने के बाद अब सरकार ने सुरक्षा बलों को खुली छूट देने का एलान किया है। ज़ाहिर है आंम लोगों के बीच छुपे कथित आतंकी को मारने के लिए गेहूं के साथ घुन पिसने वाली मिसाल की तरह आम बेगुनाह कश्मीरी भी मारे जा सकते हैं, जिसका प्रतिरोध हिंसा और जवाबी हिंसा की शक्ल में सामने आयेगा। मगर वहां जितना खून बहेगा हिंदी पट्टी में भाजपा का वोट बैंक उतना ही मजबूत होगा इसलिए भाजपा को यही बहुत फायदे का सौदा लग रहा हैI वह उग्र राष्ट्रवाद के नाम पर अपनी सियासी रोटी सेंकती रहती है। आज हालत यह है कि सरकार की किसी भी पॉलिसी का विरोध देश का विरोध समझा जाता है। विरोध की हर आवाज़ को राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के नाम पर खामोश करने की खतरनाक हिकमत अमली अपना ली गई है।

लेकिन आवाज़ उठानी पड़ेगी कि कश्मीर की समस्या का समाधान अब हर हाल में ढूंढना ही पडेगा और समस्या का समाधान दुनिया में कभी भी कहीं भी बंदूक की गोली से नहीं हुआ। कश्मीर में बातचीत और राजनैतिक प्रक्रिया जल्द से जल्द बहाल होनी चाहिए। भारत सरकार को आपनी कठोर मुद्रा वाली पॉलिसी त्याग कर कश्मीरी समाज के हर वर्ग से बात करनी होगी। पाकिस्तान ही इस समस्या का मूल कारण है उस से भी बातचीत का सिलसिला शुरू करना चाहिए। शान्ति के लिए यदि शैतान से भी बात करना पड़े तो भी भारत सरकार को गुरेज़ नहीं करना चाहिएI इस लड़ाई में जहां भी जो भी मरता है वह क्रूर सियासत का शिकार होता है। सियासत की इस क्रूरता को खत्म करने का समय आ गया हैI

(वरिष्ठ पत्रकार, उबैद उल्लाह नासिर)

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