तनवीर आलम: ‘भाजपा की जीत अप्रत्याशित नहीं, शून्य से बाहर निकलिए’

6:11 pm Published by:-Hindi News

तनवीर आलम

17वीं लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रचंड बहुमत से सरकार बना चुकी है। सत्ताधारी पार्टी भाजपा और गठबंधन में जहां उत्साह है वहीं विपक्ष इसको अप्रत्याशित जीत मान कर हताश है। समाजवादी, गांधीवादी, वामपंथी और अम्बेडकरवादी लगभग शून्य की स्थिति में हैं। जमीन, जंगल, पहाड़ और पानी बचाने की लड़ाई लड़ने वाले भाजपा की जीत से अवाक है।

लेकिन क्या ये जीत वाक़ई अप्रत्याशित है? क्या इस प्रचंड जीत में EVM की भी कोई भूमिका है? क्या विपक्षी पार्टियां वाक़ई जनता के बीच अपना आधार खो चुकी हैं? क्या विपक्षी दल इस हार का सही समीक्षा करने में कोई रुचि भी रखती हैं या वो फिर अगले पांच वर्ष बैठकर अपनी बारी का इन्तज़ार करेंगी? आखिर इतनी बड़ी जीत के क्या कारण हैं? ऐसे बहुत सारे सवालों के बीच आम सेक्युलर विचारधारा के राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता फंसे हुए हैं।

ये बात तो तय है की न ये EVM की जीत है न कोई अप्रत्याशित घटना है। ये आरएसएस/भाजपा/हिन्दू महासभा/विश्व हिंदू परिषद और उनके हज़ारों संगठनों और उनके विचारों की लगभाग एक सदी की मेहनत है। आज़ादी के समय कांग्रेस ने हिंदुत्ववादी विचारों के कई नेताओं को अपने में समाहित किया। गांधी की हत्या के बाद दशकों तक हिंदुत्ववादी संगठन राजनीतिक रूप से कमज़ोर तो बने रहे लेकिन न ही इन्होंने अपनी हार मानी न हिन्दू राष्ट्र बनाने का अपने एजेंडे का का संकल्प छोड़ा। इंदिरा गांधी की नीतियों के विरोध में जी पी आंदोलन ने इनके लिए मृत संजीवनी का काम किया और देश की राजनीति में उसके बाद से ये स्थापित होते चले गए। कभी मंदिर-मस्जिद, कभी आतंकवाद, कभी भरष्टाचार तो कभी राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाकर वो अपने को हमेशा आगे बढ़ाते रहे।

मंडल के बाद से किस प्रकार समाजवादियों का नैरेटिव ही जातीय गोलबंदी और परिवारवाद में उलझ कर रह गया ये सर्वविदित है। कांग्रेस की अल्पसंख्यक दमनकारी नीतियां और आतंकवाद जैसे अति संवेदनशील मुद्दे पर मुस्लिम नौजवानों की फर्जी गिरफ्तारी, साम्प्रदायिक दंगों पर दोहरे मापदंड ने जहां देश के दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस की जड़ें खोद दी। समाजवाद और सामाजिक न्याय के नाम पर परिवादवाद और जातिवाद आधारित राजनीति के उदय और इनके द्वारा सवर्णो के प्रति बनाये जा रहे नफ़रत के माहौल, गैर यादव/गैर जाटव मतदाताओं की उपेक्षा ने भारतीय राजनीति में भाजपा के लिए एक जगह बनाई। 80 के दशक के बाद वाली सवर्णों की पीढ़ी ने अपनी प्रति नफ़रत देखी, कुछ जातियों को छोड़कर बाक़ी पिछड़ी जातियों ने अपनी उपेक्षा देखी और आम हिन्दू नौजवानों ने राम मंदिर का सपना देखा। इन नौजवानों को भारत की एक बड़ी आबादी अल्पसंख्यक समाज को आतंकवाद से जोड़कर दिखाया गया। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की लड़ाई मंदिर-मस्जिद की लड़ाई में बदल दी गयी। जो जातियां उपेक्षित थीं उनके मन में मुस्लिम तुष्टीकरण की बात डाली गई। भाजपा के लिए ये सब राजनीतिक हथियार साबित हो रहे थे और हिन्दू समाज की नई पीढ़ी की एक बड़ी संख्या इसी भ्रम, उकसावे और नाफ़रत के साथ परवरिश पा रही थी। सपा, राजद और बसपा जैसी पार्टियां जहां जातीय गोलबंदी का खेल खेल रहीं थी वहीं कांग्रेस मात्र सत्ता पाने के जुगत में लगी रही। इन सभी पार्टियों के पास भीड़ थी, संगठन नहीं था। संगठन सिर्फ और सिर्फ भाजपा के पास था। उनके पास किसान के बेटे का अध्यक्ष और चाय बेचनेवाले के बेटे का प्रधानसेवक के पद तक पहुंचने का उदाहरण था। आरएसएस और उसके हज़ारों साथी संगठन थे, लाखों की उन्मादी भीड़ थी, लाखों प्रशिक्षित और समर्पित कार्यकर्ता के साथ साथ देश के धनकुबेरों का साथ था। ब्यवस्था में हर जगह बैठे अधिकारी और कर्मचारी थे। देश के बड़े हिस्से पर राज्य स्तरीय सत्ता थी। फिर क्यों न जीतती भाजपा? ये जीत अप्रत्याशित नहीं है। इस जीत की पृष्ठभूमि के पीछे जहां भाजपा के सालों की रणनीति है वहीं लालू-मुलायम-माया-ममता सरीखे नेताओं का सत्ता और परिवार से मोह है। समाजवादियों, गांधीवादियों और अम्बेडकर वादियों का समाज की नई पीढ़ी से अलगाव है। नई पीढ़ी को नारा लगाने वाली भीड़ मात्र समझने वाली इन पार्टियों ने जो बोया अब वो कटने के समय है।

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नरेंद्र मोदी के उदय, लालू और मुलायम के पुत्र-परिवार मोह, लगातार साम्प्रदायिक दंगों से हो रहे मुसलमानों के जानमाल के नुकसान, मुस्लिम नौजवानों पर आतंकवाद के लगाए जा रहे फर्जी मुकदमें, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े बनाये जाने से आक्रोशित मुस्लिम नौजवानों के अंदर भी बड़ी तेजी के साथ मिल्ली क़यादत का जीवाणु घुसा है। आम मुसलमानों में ये बात फैलाई गई कि सेक्युकरिज़्म बचाने का ठेका क्या हमने ही लिया है? हमें हमारा प्रतिनिधि चाहिए। इन तर्कों के साथ वो इन सभी पार्टियों को खारिज करने की बात करते हैं। उन्हें मुस्लिम नाम वाली पार्टी में अपनी क़यादत दिखने लगी है। मुसलमानों को मुस्लिम राजनीति और मुस्लिम प्रतिनिधित्व का फ़र्क़ ही नहीं मालूम। उन्हें जब पूछा जाता है कि आपको सेक्युलिज़्म अगर नहीं चाहिए तो हिंदुओं को हिन्दू राष्ट्र से क्यों परहेज़ होना चाहिए? इसका जवाब उनके पास नहीं होता। सेक्युलरिज़्म पर मुसलमानों के बीच भ्रामक स्थिति पैदा की जा रही है। दक्षिण भारत के एक बेबाक और गैर-जिम्मेदार बयान देने वाले मुस्लिम बंधुओं की जोड़ी ने पिछले एक दशक में 70 साल में क्या हुआ? सेक्युलरिज़्म का ठेका क्या मुसलमानों ने लिया है? मुसलमानों का ये हाल कांग्रेस ने ही किया है? कांग्रेस खत्म हो जानी चाहिए वगैरह वगैरह जैसे सवाल मुसलमानों के अंदर खड़े किए। मतलब भाजपा को यहां से भी ऑक्सीजन मिलना शुरू हो चुका था। मुस्लिम युवाओं को जनमुद्दो से कोई सरोकार नहीं बस इन्हें भी मुस्लिम नाम के रूप में अपना लीडर चाहिए। आज अगर देश में जनमुद्दों पर सबसे कम किसी समाज की भागीदारी है तो वो मुस्लिम समाज की है। यहां तक कि खुद मुसलमानों के शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे बुनियादी सवालों पर मुस्लिम समाज की भागीदारी नाममात्र है। सवाल है कि मात्र मुस्लिम नाम वाले प्रतिनिधि सदन पहुंच जाने भर से क्या मुसलमानों की सभी समस्याऐं दूर हो जाएगी! क्या नीली नरसंहार, भागलपुर, हाशिमपुरा और मुज़फ्फरनगर जैसे दंगों के समय मुस्लिम प्रतिनिधि सदन में नहीं थे। मुसलमानों को आम जनमुद्दों की राजनीति में ही अपना प्रतिनिधित्व और अधिकार ढूंढना होगा। एक बात देश के मुसलमानों को साफ-साफ समझ लेना होगा कि ‘मुस्लिम पॉलिटिक्स’ के लिए इस भारत में कोई स्थान नहीं है। इसका प्रयास भी भाजपा के हिस्सा के रूप में ही देखा जाएगा।

देश के सामने 18-25 साल के नौजवानों के रूप में एक बहुत बड़ी भीड़ है जिसके पास न अपने भविष्य की कोई रूपरेखा है, न आशा है न मार्गदर्शन है। वो राजनीतिक चारा मात्र बनाकर रख दिये गए हैं। इन्हें आवश्यकतानुसार कभी सामाजिक न्याय के नाम पर, कभी भरष्टचार के नाम पर तो कभी राष्ट्रवाद के नाम पर इस्तेमाल किया जा रहा है। ये कभी राम नवमी, कभी ताज़िया, कभी बारह रबी अव्वल की भीड़ तो कभी राष्ट्रवाद और मिल्ली क़यादत के सोशल मीडिया योद्धा हैं। यही नए भारत का भविष्य है।

कुछ लोगों का मानना है ये जातिवाद और परिवारवाद की राजनीति की समाप्ती है तो कुछ कहते हैं फिर तमिलनाड में स्टालिन और उड़ीसा में नवीन पटनायक कैसे जीत गए। वो ये नहीं बताते की उड़ीसा और तमिलनाड की राजनीति मंदिर-मस्जिद, जातीय खेल और राष्ट्रवाद की आड़ में नफ़रत से प्रभावित न होकर विकास की राजनीति पर टिकी है। अतः अगर ऐसे लोग ये समझते हैं कि बिना अपनी हार की सही समीक्षा और अवलोकन के वापस उसी राजनीति को दुहरायेंगे तो भारत को रसातल में ले जाने का इतिहास ऐसे लोगों के सर ही जायेगा।

अब तय है कि जो पिछड़े, दलित और सवर्ण भाजपा में जा चुके हैं वो इन तथाकथित सेक्युलर और सामाजिक न्याय की इन पार्टियों पर इतनी आसानी से भरोसा नहीं करने वाली। न भाजपा और आरएसएस को दिन भर फिल्मी डायलॉग वाली धमकियों से अल्पसंख्यक इनके झांसे में आने वाला है। क्योंकि अल्पसंख्यक समाज में मुलायम, मायावती और तेजस्वी के बारे में खुली चर्चा है ये भाजपा से साठगाँठ करते रहे हैं या आगे करेंगे। ऐसी स्थिति में इनका दोबारा भरोसा जितना काफी मुश्किल दिखता है।

देश काफी कठिन दौर से गुज़र रहा है। पिछले पांच वर्षों में लगभग सभी विश्वसनीय संस्थान धराशायी किये जा चुके हैं। अगले पांच वर्ष भी इससे अलग होने की उम्मीद नहीं कि जा सकती। अब उम्मीद मात्र देश की आम जनता खुद है। उनके बीच से कुछ निकले तभी कुछ हो सकता है। भाजपा छोड़कर बाक़ी सभी पार्टियां देश का नब्ज़ न समझने का इतिहासिक भूल कर चुकी है। और इस पाप का प्रायश्चित करने का नैतिक बल भी उनके अंदर नहीं बचा है। भारत की राजनीति को वापस से समझने का समय है। उसके लिए वापस भारत के अंदर जाना होगा। विचारों की एक सीधी और साफ रेखा खींचकर संघर्ष करना होगा। देश की उसकी आत्मा को समझना होगा। इतने बड़े विशाल देश की आत्मा की रक्षा के लिए कौन अपनी क़ुरबानी देने आगे बढ़ेगा ये किसी को नहीं पता। एक शून्य है। इसको तोड़िये। शून्य से बाहर निकलिए।

(ये लेखक के निजी विचार है)

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