Thursday, December 9, 2021

बिहार के पहले मुस्लिम सीएम अब्दुल गफ़ूर, जो कर दिए गए गुमनाम

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मुहम्मद उमर अशरफ़

आज़ादी के बाद से बिहार में कई मुख्यमंत्री बने। लेकिन आपको जानकर हैरत होगी कि आजादी के बाद से अब तक बिहार में सिर्फ एक ही मुस्लिम सीएम बने हैं। जिन्हे हम लोग अब्दुल गफ़ुर के नाम से जानते हैं। इनके बाद से कोई भी मुस्लिम समाज का नेता सीएम पद तक नहीं पहुंचा है, जबकि बिहार में मुस्लिम समुदाय का जनाधार काफ़ी है जो के बिहार का सबसे बड़ा वोटर समुह भी है।

हालांकि, अब्दुल गफ़ुर भले ही सीएम बन गए, लेकिन उन्हें भी मुख्यमंत्री की कुर्सी 2 साल के लिए ही नसीब हुई थी। वह 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975 तक बिहार के सीएम रहे। 1975 में तत्कालीन प्राधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें साज़िश के तहत मुख्यमंत्री पद से हटा दिया और जगन्नाथ मिश्र को सीएम बना दिया गया।

केदार पाण्डे और जगन्नाथ मिश्र के बीच अब्दुल गफ़ुर पिस कर रह गए पर उन्होने हार नही माना. 1984 मे कांग्रेस के टिकट पर सिवान से जीत कर सांसद बने और वे 1984 के राजीव गांधी सरकार मे नगर विकास विभाग मंत्री भी रहे और फिर 1996 मे गोपालगंज से समता पार्टी के टिकट पर जीत कर संसद पहुचे.

अब्दुल गफ़ुर पहली बार 1952 मे बिहार विधान चुनाव मे जीत कर विधायक बने और वे बिहार विधान परिषद् के अध्यछ भी रहे हैं 1918 मे बिहार के गोपालगंज ज़िला के सराए अख़तेयार के एक इज़्ज़तदार ख़ानदान मे पैदा हुए अब्दुल गफ़ुर बचपन से ही मुल्क के लिए कुछ करना चाहते थे.

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गोपालगंज से ही इबतदाई तालीम हासिल की फिर आगे पढ़ने के लिए पटना चले आए, पढने मे तेज़ तो थे ही इसलिए घर वालों ने अलिगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी भेज दिया जहां से आपका सियासी सफ़र शुरु हुआ.

हिन्दुस्तान को आज़ाद कराने का जज़्बा लिए जंगे आज़ादी मे कुद पड़े जिस वजह कर सालो जेल मे रहना पड़ा. अब्दुल गफ़ुर ने जिन्ना की टु नेशन थेयोरी को ठुकरा दिया और अखंड भारत री वकालत की, फिर देश आज़ाद हुआ तो 1952 मे बिहार विधान चुनाव मे जीत कर विधायक बने फिर 2 जुलाई 1973 से 11 अप्रैल 1975 तक बिहार के सीएम रहे। केंद्र मे मंत्री भी बने फिर आखि़रकार लम्बी बिमारी से लड़ते हुए 10 जुलाई 2004 को पटना मे इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया. अब्दुल ग़फ़ुर को उनके गांव सराए अख़तेयार मे दफ़नाया गया।

पटना मे अब्दुल ग़फ़ुर के नाम पर ना कोई कालेज दिखता है और ना ही कोई स्कुल , यहाँ तक के एक सडक भी नही अब्दुल ग़फ़ुर के नाम पर जो ये बताने के लिए काफ़ी है की किस तरह मुस्लिम समुदाय के नामवर को किस तरह नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.

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